यायावरी yayavaree

Thursday, 18 October 2018

कर्क रेखा : जहां साया भी साथ छोड़ दे




हम और आप देश के आठ राज्यों से होकर गुज़रने वाली कर्क रेखा (Tropic of Cancer) के ऊपर से कई बार गुज़रे होंगे मग़र हमें शायद की कभी इसका अहसास हुआ हो. क्योंकि यह एक काल्पनिक रेखा है इसलिए हम कब इस रेखा के ऊपर से गुज़र गए, इसका पता चलना मुश्किल है. मग़र मध्यप्रदेश के रायसेन में दीवानगंज गांव के पास सड़क पर मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग ने लकीर खींच दी है और सड़क के दोनों ओर छोटे-छोटे स्मारक बना दिए हैं. सो इस जगह ठहरे बिना रहा ही नहीं जा सकता. मध्यप्रदेश के अलावा कच्छ के रण और पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में सड़कों के किनारे छोटे-छोटे साइन बोर्ड इस रेखा के वहां से गुज़रने की गवाही दे रहे हैं. मग़र मुझे लगता है कि हमें ज्योग्राफ़ी के ऐसे दिलचस्प तथ्यों को सेलिब्रेट करना चाहिए ताकि बच्चे सिर्फ किताबों में कल्पनाओं के सहारे दिमाग में ये रेखाएं न खींचे बल्कि असल में ऐसे तथ्यों से रूबरू हो सकें. 

कुछ दिनों पहले भोपाल की यात्रा के दौरान मेरा सांची जाना हुआ. मुझे इस रेखा के बारे में पहले से पता था तो भोपाल से निकलते ही ड्राइवर को आगाह कर दिया था कि इस कर्क रेखा वाले स्‍मारक पर ज़रूर रुकना है. ये बात ड्राइवर से ही पता चली कि ये जगह असल में भोपाल-विदिशा हाईवे पर भोपाल से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर है. सड़क के दांई ओर दीवानगंज को जाने वाली सड़क निकल जाए तो सावधान हो जाएं. छोला नाम की छोटी सी जगह के निकलते ही ट्रोपिक ऑफ कैंसर का ये स्‍मारक नज़र आने लगता है. लेकिन यदि गाड़ी की रफ्तार तेज हुई तो इस जगह के चूकने में भी देर नहीं लगेगी. इसलिए जब भी इधर से गुज़रें तो दीवानगंज के निकलते ही सावधान हो जाएं.


चलिए अब ज़रा इस रेखा के महत्‍व और इससे जुड़े कुछ दिलचस्‍प तथ्‍यों को जानने की कोशिश करते हैं.

दरअसल भूमध्‍य रेखा के उत्‍तर में 23.5° पर स्थित कर्क रेखा खगोलीय और वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. यही वही रेखा है जिस पर 21 जून को सूरज की किरणें सीधी पड़ती हैं और यह वर्ष का सबसे बड़ा दिन (summer Solstice) हो जाता है. कुछ इसी तर्ज़ पर 21 दिसम्बर को कर्क रेखा पर सूरज की किरणें तिरछी पड़ती हैं सो यह वर्ष का सबसे छोटा दिन (Winter Solstice) बन जाता है. कहते हैं मुसीबत में अपना साया भी साथ छोड़ देता है. अब इस कहावत की शुरुआत कहाँ से हुई कहना मुश्किल है लेकिन मुझे लगता है कि हो न हो ये क़िस्सा 21 जून को कर्क रेखा के मंज़र से जुड़ा होगा. जहां दिन के 12 से 2 बजे के बीच हमारा साया हमारा साथ छोड़ देता है. बरसों पहले जब तक इस घटना के वैज्ञानिक कारण नहीं पता थे तो लोग इसे कोई बुरी घटना या दैवीय प्रकोप समझते थे मग़र इसकी असल वजह सूरज का ठीक हमारे सिर के ऊपर होना होता है. 

Source: ABC Science

क्या आप जानते हैं भारत वह कौन सी नदी है जो इसे दो बार पार करने की हिमाक़त करती है? ये है मध्यप्रदेश की माही नदी. यूं तो कर्क रेखा जिन आठ राज्यों गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम से गुज़रती है उनकी राजधानियां इस रेखा के आस-पास ही स्थित हैं मग़र उन सब में रांची इस रेखा के सबसे क़रीब है. और यदि कोई ये पूछे कि देश का कौन सा शहर इस रेखा के सबसे निकट है तो जवाब होगा त्रिपुरा का उदयपुर शहर. 
Source: Quora
ट्रोपिक ऑफ कैंसर से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य ये भी है कि फेडरेशन एयरोनॉटिक इंटरनेशनल के नियमों के मुताबिक किसी फ़्लाइट को राउंड द वर्ल्ड स्पीड के रिकॉर्ड के लिए कम से कम ट्रॉपिक ऑफ कैंसर की लम्बाई के बराबर, मतलब कुल 36,788 किलोमीटर की यात्रा करनी ही होगी. हाँ, एक दिलचस्प तथ्य और है कि ये रेखा लगातार अपनी जगह बदलते हुए हर साल लगभग 15 मीटर दक्षिण की ओर खिसक रही है. अलबत्ता इस तथ्य के बारे में मुझे सटीक जानकारी नहीं मिल पाई है. 

मोटे तौर पर अगर हम सोचें तो लगेगा कि भूमध्‍य रेखा के सूरज की किरणों की सीध में होने के कारण यहां तापमान सबसे ज्‍यादा रहता होगा और इस रेखा के पास मौजूद इलाके रेगिस्‍तान होते होंगे. मगर ऐसा नहीं है. दरअसल सूरज की तीखी किरणों से जो गरमी पैदा होती है उससे वाष्‍प बनता है और बादल बनकर बरसते हैं. मगर ऐसा दोनों ट्रोपिक्‍स यानि कि ट्रोपिक ऑफ कैंसर (कर्क रेखा) और ट्रोपिक ऑफ कैप्रिकोन (मकर रेखा) पर नहीं होता है. ये दुनिया के सबसे गरम इलाके हैं. इसीलिए दुनिया के सबसे बड़े रेगिस्‍तान इन्‍हीं ट्रोपिक्‍स के आस-पास पाए जाते हैं। मसलन, ट्रोपिक ऑफ कैंसर (कर्क रेखा) के पास सहारा मरुस्‍थल, ईरानी मरुस्‍थल, थार मरुस्‍थल और उत्‍तरी अमेरिका का मरुस्‍थल और ट्रोपिक ऑफ कैप्रिकोन (मकर रेखा) के पास नामिब, कालाहारी, अटाकामा और ऑस्‍ट्रेलियाई मरुस्‍थल.

अब आखिर में एक और दिलचस्‍प बात से अपनी बात को समाप्‍त करता हूं कि इस कर्क रेखा के उत्‍तर में रहने वाले लोगों के सिर पर कभी भी सूरज सीध में नहीं आएगा और दक्षिण में रहने वाले लोगों के सिर पर साल में दो बार. है न दिलचस्‍प ? इसका कारण आप खुद पता लगाइए और मुझे बताइए. ज़रा ताज़ा कीजिए अपने भूगोल के ज्ञान को. यक़ीन मानिए आपको मज़ा आएगा.


संभव है आप भी कभी न कभी इस रेखा से गुज़रे हों और आपने वहां तस्‍वीरें ली होंगी. यदि आप अपनी तस्‍वीरें भी इस ब्‍लॉग पोस्‍ट में शामिल करना चाहते हैं तो मुझे authorsaurabh@gmail.com पर भेज दें. मुझे बड़ी खुशी होगी उन्‍हें यहां पोस्‍ट करते हुए.  

#tropicofcancer #madhyapradesh 

Monday, 16 July 2018

A Road Trip to Cherapunjee

चेरापूंजी: एक सफ़र बादलों के घर तक

दूर तक अकेले चले गए खूबसूरत मनमौजी से रास्‍तों के दूसरे सिरों पर मौजूद मंजिलें भी कम दिलकश नहीं होती हैं. मगर मुझ पर इन हसीन रास्‍तों का जादू हमेशा से मंजिलों के तिलिस्‍म से ज्‍यादा सर चढ़ कर बोला है. ऐसे हसीन रास्‍तों पर एक लंबी रोड़ ट्रिप के आनंद को शब्‍दों में बयां नहीं किया जा सकता. देश के उत्‍तर-पूर्व में मेघालय एक ऐसा ही राज्‍य है जहां अमूमन हर बड़ी मंजिल ऐसे ही रेशमी रास्‍तों से बुनी हुई है. मेघालय की राजधानी शिलांग से किसी भी दिशा में चले जाइए हर ओर प्रकृति के नायाब नज़ारे या आश्‍चर्य हमारा इंतज़ार करते हैं. यूं तो पूरा मेघालय ही बादलों का घर है. मगर इस बादलों के घर में चेरापूंजी एक ऐसी जगह है जिस पर बादल खासकर मेहरबान रहे हैं और वहां तक पहुंचने के मखमली और सुपाड़ी से महकते हुए रास्‍ते बस दिल ही चुरा लेते हैं. अब शिलांग तक आएं और चेरापूंजी देखे बिना लौट जाएं ये संभव नहीं था. सो मेघालय की यात्रा में चेरापूंजी खुद-ब-खुद शामिल हो गया और जुलाई की एक सुबह हम शिलांग से चेरापूंजी की डगर निकल पड़े थे. मगर पिछली पोस्‍ट Mawlennong: Cleanest Village of Aisa में मैंने आपको बताया था कि चेरापूंजी के रास्‍ते पर बादलों की धमाचौकड़ी के बीच हम रास्‍ता भटक गए और बांग्‍लादेश की सीमा से सटे मायलेन्‍नोंग जा पहुंचे.
चेरापूंजी के हसीन रास्‍ते
रास्‍ते जो सीधे बादलों के घर जाते हैं

वो मोड़ जहां से हम रास्‍ता भटके 
अच्‍छा ही हुआ जो हम रास्‍ता भटक गए. इसके दो लाभ हुए. एक तो एशिया के सबसे सुंदर गांव को देखने का अवसर मिल गया और दूसरा दिन के समय चेरापूंजी में भयंकर बारिश में फंसने से बच गए. दरअसल जिस वक्‍़त हम गलती से मायलेन्‍नोंग के रास्‍ते पर बढ़ रहे थे उस वक्‍़त चेरापूंजी में भयकंर बारिश हो रही थी और बारिश में चेरापूंजी में आप कुछ नहीं देख सकते. ऐसा लगता है जैसे समंदर मे तूफान उठा हो और किसी तिलिस्‍मी जादू से हर चीज ढ़क दी गई हो. तमाम खूबसूरत वॉटर फॉल्‍स पल भर में धुंध और बादलों में गायब हो जाते हैं.
बादलों में गुम चेरापूंजी के खजाने 

उस रोज हमने जितना वक्‍़त मायलेन्‍नोंग में बिताया उतने समय चेरापूंजी में बादल जमकर बरसते रहे. यहां ढ़ाई-तीन घंटे गुज़ार कर हम फिर से चेरापूंजी की डगर पर थे. मायलेन्‍नोंग से चेरापूंजी का रास्‍ता उसी तिराहे से होकर जाता था जहां से हम रास्‍ता भटके थे. सो एक बार फिर 50 किलोमीटर वापिस आकर लैटलिंगकोट के उस मोड़ तक लौट कर आए और अब चेरापूंजी की ओर रथ मोड़ दिया. अब यहां से चेरापूंजी कुल 30 किलोमीटर दूर था. ये 30 किलोमीटर का सफ़र अब तक की सड़क यात्राओं में सबसे खूबसूरत सफ़र था. हल्‍की बारिश के पानी में नहा कर सड़क का रंग एकदम गहरा काला हो गया था. उधर सड़क के दोनों ओर दूर तक दिखाई देते घास के मैदान और खेत जैसे भीगी सी हरी चादर ओढ़ कर आराम फरमा रहे हों. पूरा रास्‍ता हसीन नज़ारों से भरा. मैंने ऐसे दिलफ़रेब रास्‍ते कभी नहीं देखे. हम शिलांग जैसे शहर की चहल-पहल से बहुत दूर निकल आए थे और पूरे रास्‍ते में कहीं-कहीं ही कुछ घर या छोटे-छोटे गांव नज़र आ रहे थे. अब तक बारिश ने हवा में मीठी ठंड घोल दी थी जो हड्डियों तक पहुंच कर भूख को जगाने लगी. मायलेन्‍नोंग से ये सोच कर जल्‍दी निकल थे कि चेरापूंजी के रास्‍ते में कहीं रुक कर चाय सुड़की जाएगी. मगर यहां तो दूर-दूर तक चाय का नामो-निशां ही नहीं था. कहीं कोई होटल नहीं, कोई ढ़ाबा नहीं. कई किलोमीटर चले आने के बाद सड़क पर दूर एक गांव का छोटा सा बाजार दिखने लगा तो चाय की आस से आंखों में चमक आ गई. मगर जैसे-जैसे गाड़ी उन दुकानों के नज़दीक आई तो उन दुकानों की हकीकत साफ़ होती गई. वहां कोई चाय की दुकानें नहीं थीं. यहां दुकानों के बाहर सुअर उल्‍टे लटके थे. यहां स्‍थानीय खासी समुदाय के लोग सब कुछ खाते हैं. एक-दो नहीं कोई दस दुकानें रही होंगी. पोर्क की गंध को शिलांग में भी बर्दाश्‍त नहीं हुई थी. घनघोर वेजिटेरियन आदमी के साथ ये सबसे बड़ी दिक्‍क्‍त है. बस यहां तो गाड़ी को ब्रेक लगाना भी मुनासिब नहीं था सो और तेज रफ्तार से आगे की ओर भाग चले.
ओरेंज रूट्स
साथ में चल रहे एक परिचित ने बताया कि वो कुछ साल पहले भी इस तरफ आए थे तो कहीं कुछ खाने को नहीं मिला था. वेजिटेरियन खाने की किल्‍लत तो शिलांग में भी कम नहीं थी. इसलिए इस दूर-दराज के इलाके में तो कल्‍पना की ही जा सकती है. कुछ लोगों ने पहले ही आगाह किया था कि चेरापूंजी में कुछ नहीं मिलेगा. मगर ये नहीं बताया था कि रास्‍ते में चाय भी नसीब नहीं होगी. मगर शायद हमारी किस्‍मत हम पर मेहरबान थी. किस्मत बुलंद हो तो जंगल में भी छप्पन भोग मिल सकते हैं. सो हमें भी मिल गए. सोहरा से तकरीबन 3 से 4 किलोमीटर पहले 'ऑरेन्ज रूट्स' नाम से एक वेजिटेरिअन रेस्तरां है. ये मेघालय पर्यटन विभाग और चेरापूंजी हॉलीडे रिजॉर्ट की पब्लिक प्राइवेट पार्ट‍नरशिप में चल रहा है. यहां टोकन काउंटर से लेकर किचिन, वेट्रेस और प्रबंधन में एकाध पुरुष को छोड़कर पूरा स्‍टाफ महिलाओं का है. जिस आदर और प्रेमभाव से यहां महिलाएं अपने पारंपरिक परिधान जिंकरसिया पहले हुए भोजन परोसती हैं और थोड़ा और खाने का आग्रह करती हैं...ऐसा कहीं नहीं देखा. तो आप नोट कर लीजिए, इस तरफ आएं तो ऑरेंज रूट्ससे बेहतर कोई विकल्‍प नहीं.
अभी और भी बहुत कुछ मिलेगा थाली में 
इससे पहले कि बातों में मैं भूल जाऊं, बताता चलूं कि अब चेरापूंजी असल नाम सोहराही था और ब्रिटिशर्स ने इसे छुराकहना शुरू किया और धीरे-धीरे ये चेरापूंजी हो गया. चेरापूंजी का मतलब है Land of Oranges. मगर अब इसका नाम फिर से सोहरा कर दिया गया है. 

तकरीबन डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद जब शाम 4 बजे हम चेरापूंजी पहुंचे तो बारिश एकदम चरम पर थी. बारिश का ये रौद्र रूप देख कर बड़ी निराशा हुई. हमारे साथ चल रहे लोगों ने बताया कि यहां ऐसा ही होता है और कई बार लोगों को बिना कुछ देखे ही खाली हाथ लौटना पड़ता है. शायद इसीलिए अब बहुत से टूरिस्‍ट यहां एक रात रुकने का प्रोग्राम बना कर ही आते हैं. ताकि 24 घंटे में कम से कम एक बार मौसम के साफ़ होते ही चेरापूंजी की खूबसूरती का आनंद ले सकें. मगर हमें शाम तक वापिस लौटना था. ले दे कर यही कोई तीन-चार घंटे हाथ में थे. इधर जोरों की भूख लगी थी और किस्‍मत से एक वेज रेस्‍तरां मिल गया तकरीबन एक घंटे बाद बारिश धीमी होने पर हमने आगे बढ़ने का फैसला किया. यहां से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्‍प्रेड ईगल फॉलतक पहुंचते-पहुंचते धुंध छंट चुकी थी और हल्‍की धूप कुछ इस तरह चमकी जैसे किसी ने ऊपर से आउट ऑफ द वे जाकर ये नज़ारा दिखाने का प्रबंध किया हो. सभी ने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया और सभी धड़ाधड़ उस खूबसूरत नज़ारे को कैमरे में कैद करने लगे. तभी ड्राइवर ने चेतावनी दी कि मौसम की ये मेहरबानी ज्‍यादा देर के लिए नहीं है. इसलिए जो करना है ज्‍यादा से ज्‍यादा एक घंटा है. हमने ड्राइवर से कहा कि सिंह साहब, अब चेरापूंजी आपके भरोसे है. बस फिर क्‍या था. उन ऊबड़-खाबड़ और सांप जैसे घुमावदार रास्‍तों पर दौड़ते हुए हमने रास्‍ते में पड़ने वाली हर साइट पर छापा सा डालते हुए आगे बढ़ना जारी रखा. और एक-डेढ़ घंटे में तमाम वाटर-फॉल्‍स और मौसमई गुफाओं को भी देखा डाला. तब जाकर बेचैन दिल को करार आया. 
सेवन सिस्‍टर्स फॉल 
यहां मौसमई गुफाओं से तकरीबन 1 किलोमीटर आगे बेहद खूबसूरत सेवन सिस्‍टर्स फॉल है जिसे स्‍थानीय लोग Nohsngithiang Falls  के नाम से जानते हैं. सेवन सिस्‍टर्स फॉल का नाम इसलिए पड़ा क्‍योंकि ये इसकी धाराएं सात हिस्‍सों में बटी हैं. ये झरना 315 मीटर (1033 फुट) की ऊंचाई से गिरता है और इसकी औसत चौड़ाई 70 मीटर है. इसी वजह से ये देश के सबसे लंबे वॉटरफॉल्‍स (One of the tallest Waterfalls in India) में से एक है. इसी तरह सोहरा में Nohkalikai Falls ऐसा ही एक खूबरसतर वॉटरफॉल है. इसे Tallest Plunge Water Fall in India के रूप में भी जाना जाता है. 

नोहकालिकाई फॉल           स्‍त्रोत: शटरस्‍टॉक
नोहकालिकाई फॉल के बारे में एक लोककथा बहुत दिलचस्‍प है. खासी में नोहकालिकाई का मतलब है का लिकाई का कूदना. इस कथा के अनुसार झरने से ऊपर रांगजाइरतेह (Rangjyrteh) गांव में लिका नाम की एक महिला को अपने पति की मृत्‍यु के बाद दूसरी शादी करनी पड़ी. अपनी नवजात बच्‍ची के साथ का लिकाई (खासी समुदाय में स्त्रियों के नाम के आगे का लगाया जाता है) बड़ी मुश्किल से अपनी जिंदगी काट रही थी. आखिरकार उसे सामान ढ़ाेेेने का काम करना पड़ा. अपने काम की वजह से उसे सारा दिन घर से बाहर रहना पड़ता और घर लौटने पर उसका ज्‍यादातर वक्‍़त अपनी बच्‍ची के साथ गुज़रता. इस सबके बीच का लिकाई अपने दूसरे पति को ज्‍यादा वक्‍़त नहीं दे पाती थी. बस इसी बात की जलन में एक दिन पति ने मासूम बच्‍ची को मार डाला और उसके मांस को पका कर हड्डियों को इधर-उधर फेंक दिया. का लिकाई काम से घर लौटी तो बच्‍ची को घर पर न पाकर उसे खूब ढूंढ़ा. दिन भर की थकान से निढ़ाल का लिकाई ने खाना खाकर फिर से बच्‍ची को ढूंढ़ने का फैसला किया. खाना खानेे के बाद का लिकाई सुपाड़ी खाती थी. उस दिन भी जब का लिकाई सुपाड़ी काटने बैठी तो वहां पड़ी एक छोटी सी उंगली को देख कर सारा माज़रा समझ गई कि उसकी गैर-मौजूदगी में उसके पति ने क्‍या किया था. का लिकाई के गुस्‍से और दुख की कोई इंतहा नहीं थी और हाथ में कुल्‍हाड़ी लेकर इधर-उधर दौड़ने लगी. दौड़ते-दौड़ते पठार पर पहुंच गई और इसी दुख में झरने से नीचे छलांग लगा दी. जहां से का लिकाई ने छलांग लगाई थी उसी जगह को आज नोहकालिकाई के नाम से जाना जाता है. आज भी वो झरना जैसे का लिकाई के दुख को बयां कर रहा है।   
अच्‍छा, एक दिलचस्‍प बात चेरापूंजी के बारे में ये है कि बचपन से किताबों में सबसे ज्‍यादा वर्षा वाले स्‍थान के रूप में पढ़ते-पढ़ते हमारे दिलो-दिमाग में चेरापूंजी की छवि ऐसी बन गई है मानो यहां हर समय बरसात ही होती रहती हो और बारह मासों ये इलाका पानी से लबालब रहता हो. मगर हैरतंगेज तथ्‍य ये है कि यहां सर्दियों में सूखा पड़ता है और पानी की भारी किल्‍लत हो जाती है. यहां तक कि लोगों को बहुत दूर-दूर से पानी लेकर आना पड़ता है. दरअसल सबसे ज्‍यादा बारिश का फलसफा ये है कि यहां बारिश लगातार न होकर भारी मात्रा में होती है. इसलिए कम समय में भी औसत वर्षा के रिकॉर्ड टूट जाते हैं. ऐसा असल में चेरापूंजी के खासी पहाडियों के दक्षिणी पठार पर होने की वजह से होता है. इसकी स्थिति कुछ इस तरह है कि बादल यहां पहाड़ों के बीच आकर फंस जाते हैं और जमकर बरसते हैं. इतनी तेज बारिश का एक नुकसान ये भी है कि यहां की मिट्टी पानी के तेज बहाव में बांग्‍लादेश के मैदानों की ओर बह जाती है और खेती संभव नहीं हो पाती है. अब इसे चेरापूंजी का दुर्भाग्‍य ही कहा जाएगा कि जिस बारिश के लिए पूरी दुनिया में लोग तरसते हैं वही बारिश यहां हालातों को नाजुक बना देती है.

बारिश के मामले में चेरापूंजी के कुछ अद्भुत रिकॉर्ड हैं। 450 इंच (11,430 मिलीमीटर) के विश्‍व के उच्‍चतम औसत वार्षिक वर्षा स्‍तर के अतिरिक्‍त विश्‍व में किसी भी स्‍थान पर किसी एक वर्ष में सबसे ज्‍यादा वर्षा का रिकॉर्ड भी चेरापूंजी के ही नाम है. यहां अगस्‍त 1860 से जुलाई, 1861 के दौरान 1,042 इंच (26,467 मिलीमीटर) की वर्षा दर्ज की गई थी। यहीं नहीं, जुलाई 1861 में किसी एक महीने में सबसे ज्‍यादा वर्षा का रिकॉर्ड (366 इंच – 9296 मिलीमीटर) भी चेरापूंजी ने ही बनाया. हालांकि अब पिछले कुछ वर्षों से सबसे ज्‍यादा वर्षा चेरापूंजी की बजाय यहां से 80 किलोमीटर दूर मॉसिनराम में होने लगी है. लेकिन अभी भी चेरापूंजी ही हमारी स्‍मृतियों में धरती पर सबसे ज्‍यादा वर्षा वाले स्‍थान के रूप में बस चुका है. यहां केवल सबसे ज्‍यादा बारिश ही नहीं बल्कि यहां के अद्भुत झरने बरसों से देश-दुनिया के पर्यटकों का मन मोहते रहे हैं.

यहां दर्जनों वॉटर फाल हैं जिन्‍हें जुलाई के बाद देखने का अपना आनंद है. एक रोड़ ट्रिप का असली मजा यही है कि गाड़ी से कुछ-कुछ किलोमीटर पर मौजूद स्‍थानों का भी तसल्‍ली से आनंद लिया जा सकता है. यदि ज्‍यादा वक्‍़त न हो तो चेरापूंजी के लिए आधा दिन भी बहुत है. हम आधे दिन में जितना देख सके उतना पहली यात्रा के लिए काफी था. चेरापूंजी की पहली यात्रा की स्‍मृतियां मेघालय की स्‍मृतियों के कोलाज में चटख रंगों के साथ हमेशा जीवंत रखेंगी.

चेरापूंजी कैसे पहुंचें: 
चेरापूंजी पहुंचने के लिए शिलांग पहुंचना होगा और शिलांग पहुंचने के लिए गुवाहाटी. गुवाहाटी सड़क, रेल और हवाई मार्ग तीनों से जुड़ा है. यूं तो शिलांग तक भी हवाई सेवा है मगर उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसलिए बेहतर होगा गुवाहाटी तक की फ्लाइट जी जाए. अब गुवाहाटी से शिलांग तीन-साढ़े तीन घंटे का सड़क का सफ़र है (रास्‍ता एकदम शानदार है). शिलांग से चेरापूंजी कुल 54 किलोमीटर दूर है.

कब आएं चेरापूंजी:
चेरापूंजी आने का सबसे बेेेेहतर समय सितंबर से अप्रैल तक का है.  


कुछ और तस्‍वीरें इस यादगार सफ़र से ...






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Wednesday, 4 July 2018

Mawlennong: Cleanest Village of Aisa


एशिया का क्‍लीनेस्‍ट विलेज: मायलेन्‍नोंग

ये जुलाई का बरसातों का मौसम था और बरसात की शुरूआती झडि़यों के बाद उत्‍तर से पूरब तक धरती का तन और मन दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। यही वह समय था जब पहले से हरी-भरी पूर्वोत्‍तर की दुनिया और भी ज्‍यादा मनमोहक लगने लगी थी।  मैं कुछ मित्रों के साथ गुवाहाटी, शिलांग और चेरापूंजी की यात्रा पर था। दो तीन दिन गुवाहाटी और शिलांग में गुजारने के बाद उस रोज हम शिलांग से निकले तो थे चेरापूंजी के लिए मगर सड़क पर बादलों और बारिश ने ऐसा घेरा कि कुछ नहीं दिखा और जहां लैटलिंगकोट नाम की जगह (शिलांग से लगभग 27 किलोमीटर) से चेरापूंजी के लिए कट लेना था वहां गलती से बाईं ओर कट ले लिया मायलेन्‍नोंग का। इस राह पर तकरीबन 10 किलोमीटर आगे आकर गूगल मैप ने बताया कि हम चेरापूंजी की बजाए मायलेन्‍नोंग की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। अब जब गलत राह पकड़ ही ली...तो यही सही। वैसे मेघालय यात्रा का जब प्रोग्राम बन रहा था तो मायलेन्‍नोंग (Mawlennong) को व्‍यस्‍त कार्यक्रम में शामिल करना लगभग असंभव दिख रहा था और मैं भी मन ही मन मान चुका था कि इस बार मायलेन्‍नोंग जाना नहीं हो पाएगा। पर शायद डेस्टिनी को वहीं भेजना मंजूर था। क्योंकि आप किस वक़्त कहां होंगे ये शायद पहले से तय है। या फिर वो कहते हैं न कि 'आप किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलवाने में जुट जाती है'। अब एक घुमक्‍कड़़ को और क्‍या चाहिए, मन की मुराद पूरी हो गई। मायलेन्‍नोंग को आज Asia’s Cleanest Village के नाम से जाना जाता है और इसे "गॉड्स ओन विलेज" भी कहा जाता है। बांग्लादेश बॉर्डर पर ये गज़ब का गांव है।
मायलेन्‍नोंग की ओर आखिरी डगर

हसीन रास्‍ते जो मंजिलों से भी ज्‍यादा खूबसूरत हैं 
शिलांग से मायलेन्नोंग का 80 किलोमीटर का पूरा रास्ता बादलों की अठखेलियों के बीच ठुमकता मचलता सा चला जाता है। उस रोज भी घनघोर काले बादल अचानक सड़क पर गाड़ी के आगे कूद कर सामने से ही धप्पा बोल रहे थे। गहरी धुंध, बरसात और काले बादलों के बीच से हम लगभग रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे। गाड़ी में चल रहा गीत जैसे ठीक इसी वक्‍़त के लिए लिखा गया था:

बादल झुके झुके से हैं
रस्ते रुके रुके से हैं

क्या तेरी मर्ज़ी है मेघा
घर हमको जाने न देगा
आगे है बरसात, पीछे है तूफ़ान
मौसम बेईमान, कहाँ चले हम तुम
चक दुम दुम...


अब तक इस रास्ते पर आगे बढ़ते हुए एक वक्त लगने लगा कि हम जिस रास्ते पर चल रहे हैं वो डगर कहीं जाती भी है या नहीं। दूर-दूर तक सुनसान रास्ते और जंगल। मायलेन्नोंग से तकरीबन 17 किलोमीटर पहले आखिर एक खूबसूरत से साइनबोर्ड पर नज़र पड़ती है जो बताता है कि गॉड्स ओन गार्डन मायलेन्‍नोंग वहां से दाईं ओर 17 किलोमीटर दूर है। आखिर ये सफर भी पूरा करके हम मायलेन्नोंग पहुंचते हैं। बांग्लांदेश बॉर्डर से सटा एक छोटा सा बेहद खूबसूरत गांव। गांव में खासी समुदाय के लगभग 95 परिवार हैं, और ज्या‍दा से ज्यादा 500 लोग। खासी समुदाय की परंपराओं के मुताबिक दुनिया का ये कोना पूरी तरह महिलाओं का किंगडम है। मतलब कि मातृसत्तात्मक व्यवस्था।

मायलेन्‍नोंग में एक चाय की दुकान...मगर दुकान की कमान
महिला के हाथ में है 
दुनिया की आधी आबादी पितृ सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के चक्रव्यूह को भेदने में दिन-रात खटते हुए जिस बेहतर स्थिति के यूटोपिया की कल्पना करती है वैसा मातृ सत्तात्मक समाज शिलांग के आस-पास के इलाकों और विशेषकर मायलेन्‍नोंग में खासी जनजातीय समाज की वास्तविकता है। यहां औरत जात की हुकूमत है। मेघालय की मैट्रीलीनियल सोसायटी दुनिया की इक्‍का–दुक्‍का शेष बची मातृसत्तात्मक व्यवस्थाओं में से एक है और समाजविज्ञानियों और सैलानियों के लिए आश्चर्य का विषय है। यहां महिला ही परिवार की मुखिया मानी जाती है। हां, बच्चों के मामा परिवार के फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, शादी के बाद दुल्हन पराये घर नहीं जाती बल्कि दूल्हा घर लाती है। कोई दहेज नहीं, कोई दुल्‍हन की प्रताड़ना नहीं। यहां तक कि बेटी शादी के बाद भी अपनी मां के सरनेम को ही अपने सरनेम के तौर पर प्रयोग करती है और परिवार की संपत्ति सबसे छोटी बेटी के नाम ट्रांसफर होती है। Khasi Custom of Lineage Act of 1997 के अनुसार यदि परिवार में कोई बेटी न हो तो भी संपत्ति परिवार के पुत्रों के नाम नहीं होगी। इसके लिए किसी अन्‍य परिवार से लड़की को गोद लिया जाएगा और वह उस संपत्ति की मालकिन बनेगी। इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इस इलाके में आमतौर पर पुरूषों के पास कोई संपत्ति नहीं है। दिलचस्‍प बात ये है कि इस व्‍यवस्‍था के चलते पुरूषों को काम-काज के लिए बैंक से लोन नहीं मिल पाते क्‍योंकि उनके पास गिरवी रखने के लिए कोई संपत्ति ही नहीं है। शायद इसी वजह से यहां का पुरुष समाज अब इस सदियों पुरानी परंपरा से असंतुष्‍ट नज़र आता है। मगर परंपराएं टूटना इतना आसान नहीं होता। यही वजह है कि तमाम प्रतिरोधों और विद्रोही स्‍वरों के बावजूद ये परंपरा आज भी बदस्‍तूर जारी है। शायद इसीलिए यहां बेटी को वंश चलाने वाला माना जाता है और बेटी के जन्म पर खुशियां मनाई जाती हैं और 'खोवाई' नाम से एक आयोजन होता है जिसमें मिलने-जुलने और जान-पहचान वालों को खाने पर बुलाया जाता है। मैट्रिलिनियल सोसाइटी का ये दस्तूर अमीर-गरीब सभी तबकों में समान रूप से देखा जा सकता है। काम-काज के अधिकांश क्षेत्रों में आपको महिलाएं ही नज़र आएंगी। मातृसत्तात्मक व्यवस्था का ये इकलौता केन्द्र आज दुनिया भर के लिए आश्चर्यमिश्रित हर्ष का विषय है और पूरी दुनिया को संदेश दे रहा है कि दुनिया कुछ इस तरह भी चलाई जा सकती है।

कचरे के लिए बांंस के कूड़ेदान
फिलहाल यहां मुद्दा क्लीनेस्ट विलेज का है। तो हुआ यूं कि 2003 में एक ट्रैवल मैग्जीन ने इस गांव को क्लीनेस्ट विलेज ऑफ एशिया घोषित किया। बस तभी दुनिया की नज़र इस गांव पर पड़ी और आज ये गांव मेघालय के टूरिस्ट मैप पर खास स्थान ले चुका है। हालांकि अभी भी इसके बारे में दूर-दराज के टूरिस्ट को ज्यादा जानकारी नहीं है। हां नई और खास जगहों की तलाश में भटकती आत्माएं ऐसी जगहों पर पहुंच ही जाती हैं। खैर, गांव वाकई साफ-सुथरा है। हर घर के बाहर बांस से बने डस्टबीन लगे हैं जिनके कचरे को हर रोज इकट्ठा करके एक बड़े गड्ढे में डाला जाता है जहां बाद में उसके खाद बनने पर उसे काम में लिया जाता है। इस गांव तक भी मनरेगा जैसी योजनाएं पहुंची हैं। यहां के ड्रेनेज सिस्टम का काम मनरेगा के अंतर्गत ही किया गया है। गांव में लोगों ने यहां आने वाले पर्यटकों के लिए छोटे-छोटे टी-स्टॉल और रेस्‍तरां खोल कर आजीविका के कुछ और साधन पैदा कर लिए हैं। गांव देखते देखते ज़रा सा अंदर ही बढ़ा होउंगा कि अचानक मोबाइल पर एक मैसेज आ टपका “Welcome to Bangladesh ! Tariff in Bangladesh on any network: Call to Bangladesh: Rs 70/min, to India/any other country: Rs140/min, incoming: Rs 70/min, SMS outgoing: Rs15, Data: Rs5/10 Kb” ये मैसेज देखते ही होश उड़ चुके थे...ज़ाहिर था कि मोबाइल नेटवर्क के हिसाब से मैं बांग्लादेश में था। मैंने ज़रा गौर किया तो कुछेक फर्लांग पर ही बांग्‍लादेश के खुले मैदान नज़र आ रहे थे। सबसे पहले तो मोबाइल का सेल्युलर डाटा ऑफ किया और वहीं से बांग्लादेश को अलविदा कह कर उल्टे पांव लौट लिया।

बांग्‍लादेश की सीमा से सटा गांव का इलाका  

लिविंग रूट ब्रिज
यहां से थोड़ी दूर पर ही प्रकृति का एक और बेजोड़ अजूबा लिंविंग रूट ब्रिज के रूप में देखने को मिलेगा। रबर के पेड़ की जड़ों से सालों-साल तक गुथ कर बना ये लिविंग रूट ब्रिज बहते धारे के ऊपर से दूसरी ओर पहुंचने के लिए बायोइंजीनियरिंग का एक खूबसूरत करिश्‍मा है। कुछ लोगों का मानना है कि इस रूट ब्रिज की उम्र तकरीबन एक हजार वर्ष है। गांव में ही कुछ और आकर्षण के केन्‍द्र हैं जिनमें सबसे खास है ट्री होम। ये बांस से पेड़ के ऊपर 80 से 90 फुट की ऊंचाई पर बनाया गया छोटा सा घर है जिसमें गांव के जीवन का आनंद लेने के इच्‍छुक पर्यटक रात को भी ठहर सकते हैं। गांव के लोग बड़े प्रेम और आतिथ्‍य भाव के साथ पर्यटकों का स्‍वागत करते हैं। इसी तरह के कुछ और बांस के स्‍काई वे (पेड़ पर चढ़ने के लिए बांस से बनी सीढि़यां) यहां पर्यटकों को प्रकृति के अद्भुत नज़ारों का लुत्‍फ देते हैं जहां से न केवल गांव की अनुपम छटा दिखती है बल्कि गांव के उस पार बांग्‍लादेश के लंबे चौड़े मैदान साफ दिखाई देते हैं।

छोटे. मगर खूबसूरत घर. हर घर का अलग शौचालय 
इस गांव में निर्मल गांव अभियान के तहत हर घर के लिए अलग शौचालय है। हर चार कदम पर आईडीएफसी बैंक के सौजन्य से सोलर स्ट्रीट लाइटिंग सिस्टम लगा है। जानकर आश्चर्य होगा मगर सच है कि गांव का लिट्रेसी रेट 100 परसेंट है। गांव में 3 स्कूल हैं और बच्चों को अभी से गांव को सुंदर बनाए रखने के सबक स्कूल में सिखाए जा रहे हैं। गांव के लोग हर रोज सुबह मिलकर पूरे गांव के सफाई करते हैं और गांव के बच्‍चे भी बड़ों की देखा-देखी साफ-सफाई के काम में उनका हाथ बंटाते हैं। गांव में कूड़ा-कर्कट फैलाने पर द लॉ ऑफ विलेज के अनुसार फाइन लगाया जाता है। कुल मिलाकर एक मुकम्मल आदर्श ग्राम। ये जगह तमाम बड़े-बड़े स्वच्‍छता अभियानों के नाटकों से दूर स्वच्छता की एक जीती जागती मिसाल है और साबित करती है कि यदि स्‍थानीय प्रशासन जिम्‍मेदार हो और नागरिक स्‍वच्‍छता में अपना योगदान दें तो कोई भी जगह सुंदर बन सकती है। कहना ही होगा कि मायलेन्‍नोंग दुनिया की उन चंद खूबसूरत जगहों में से एक है जिन्‍हें एक बार अवश्‍य देखा जाना चाहिए।

अगली पोस्‍ट में हम चेरापूंजी की ओर चलेंगे तब तक कुछ और तस्‍वीरें इस खूबसूरत गांव से... 
लिविंग रूट ब्रिज

हर तरफ सिर्फ एक ही रंग


काश मैं भी बच्‍चा बन जाऊं और इसी गांव में खूब खेलूं 

मुझे भी एक घर चाहिए यहां 


मनरेगा का जादू  

नोट: मेघालय की यह यात्रा जुलाई, 2015 में की गई थी। 

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Friday, 8 June 2018

सुबह-ए-चार मीनार: A morning with Char Minar-2


सुबह-ए-चार मीनार

दूसरी किस्‍त

दोस्‍तो पिछली किस्‍त में आपने सुबह चार मीनार की यात्रा पर निकलने, ऑपरेशन पोलो की बदौलत हैदराबाद के भारत का अभिन्‍न अंग बनने की कहानी,  हैदराबाद के भाग्‍यनगर से हैदराबाद बनने का किस्‍सा, चार मीनार के बनने की वजह, आसफ़़ जाही सल्‍तनत की सात पुश्‍तों की कहानी, चार मीनार इलाके की सुबह का आलम और लाड बाज़ार में चूडियों की रौनक के बारे में पढ़ा. अब आगे...

नीमराह बेकरी के बिस्‍कुट और चाय 
सुबह होटल से बिना कुछ खाए पिए निकल आने के बाद अब तक चाय की तलब हो उठी थी. सुबह की चाय के अनुभव को और ज्‍यादा यादगार बनाने के लिए मेरी मेजबान मित्र ने इसका ठिकाना पहले से सोच रखा था. कुछ ही देर में हम चार मीनार से चंद कदम के फ़ासले पर नीमराह बेकरी में थे. यहां बेकरी के ताजा बिस्‍कुटों के साथ ईरानी चाय का अपना अलग मज़ा है. चाय की चु‍स्कियों के साथ बेकरी के मालिक अहमद से थोड़ी गुफ्तगू हुई तो उन्‍होंने बताया कि उनके पुरखे ईरान से यहां आए थे और ये दुकान बहुत पुरानी है. अहमद ने हमें दर्जनों तरह के बिस्‍कुट दिखाए जिनमें से कोई सात-आठ किस्‍म के बिस्‍कुटों को हमने चखा. इनमें चांद बिस्‍कुट, उस्‍मानिया बिस्‍कुट, चोको बार, पिस्‍ता, काजू, स्‍टार काजू, ड्राई फ्रूट, ओट्स, डायमंड, रस्‍क केक शुमार थे. यहां बेहतरीन ब्रेड, बन और केक भी चखे जा सकते हैं. चाय के भी अपने किस्‍से हैं. यहां एक चाय है पौना’. है न दिलचस्‍प नाम? जहां आम चाय 12 रुपए की है वहीं पौना 15 रुपए की. वैसे मामला सिर्फ इतना सा है कि इस चाय में दूध ज्‍यादा होता है. ये ज्‍यादा दूध वाली चाय के भी देश में अलग अलग नाम हैं. मैं जब लुधियाना में पोस्‍टेड था तो दफ़्तर में एक तो होती थी चाय और एक होती थी मिल्‍क टी. निखालिस खड़े दूध की चाय. अब एक चाय से मेरा क्‍या काम बनता...सो एक कप और पी गई. मैं यहां से घर के लिए कुछ लिए बिना ही निकल आया. मगर ये अफ़सोस शाम तक दूर हो गया. एयरपोर्ट के लिए निकलते वक्‍़त कराची बेकरी मिल गई. अब कराची बेकरी की तारीफ़ में क्‍या शब्‍दों को जाया करना. एक से एक बेहतरीन बिस्‍कुट और कुकीज यहां मौजूद हैं. मुझे यहां का फ्रूट बिस्‍कुट बेहद पसंद है. आपको कहीं दिख जाए तो चूकिएगा मत. और दिल्‍ली से हों तो एक डिब्‍बा मेरे लिए भी लेते आइएगा.
ग़ज़ब हैदराबादी लहज़े में  नीमराह बेकरी के अहमद भाई 

चार मीनार का तसव्‍वुर और ईरानी चाय 
खैर, चाय की चुस्कियों के बाद नीमराह बेकरी से बाहर निकले तो देखा कि चार मीनार के चारों तरफ फर्श पर टाइलें बिछाने का काम जोरों पर चल रहा है. कुछ दिनों पहले भी मैंने अंग्रेज़ी अखबार द हिन्‍दू में एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि इस चार मीनार के आस-पास चल रहे काम में जमीन से कुछ फुट नीचे पानी की पाइपें बिछाई जा रही हैं जिससे सीपेज की स्थिति में इमारत के ढ़ाचे को नुकसान पहुंचने की संभावना है. पुरातत्‍व विभाग ने खूब हो हल्‍ला किया मगर शायद इसे अनसुना कर दिया गया है. ईश्‍वर विभागों को सद्बुद्धि दे. साथ ही चार मीनार के आस-पास के पूरे इलाके को टाइलों से पाटने वालों को यहां कुछ पेड़ लगाने के बारे में भी सोचना चाहिए था. अब तक नहीं सोचा तो अब सोच लें. किसी भी ऐसी परियोजना में ग्रीन बेल्‍ट अनिवार्य हिस्‍सा होनी चाहिए. पर होता यही है कि पहले बिना ज्‍यादा सोचे-विचारे निर्माण कार्य किया जाता है फिर किसी रोज नींद खुलने पर उस निर्माण को उधेड़ कर फिर कुछ नया किया जाता है. पहले कुआ खोदो फिर कुआ भरो. यही नियती है देश की.

मक्‍का मस्जिद 
इसके बाद हमने कुछ कदम दूर मौजूद मक्‍का मस्जिद का रुख़ किया. ये हैदराबाद की सबसे पुरानी और देश की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है. ये इत्‍तेफ़ाक़ ही था कि कोई हफ़्ता भर पहले ये मस्जिद एक बार फिर सुर्खियों में थी. दरअसल यहां 18 मई, 2007 को हुए एक बंब धमाके में दर्जन भर लोग मारे गए और लगभग 60 लोग जख्‍़मी हुए थे. अब हैदराबाद में ही एनआईए की अदालत ने इस मामले के पांचों आरोपियों को रिहा कर दिया है जिनमें स्‍वामी असीमानंद भी शामिल हैं. इसी मामले के बाद से बरसों तक देश में हिंदुत्‍व आतंकवाद की थ्‍योरी पर बहसें होती रही हैं. मगर एनआईए अदालत ने सबको चौंकाते हुए सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को रिहा कर दिया है. पूरे देश में खलबली है और इसीलिए इन दिनों मक्‍का मस्जिद के आस-पास सुरक्षा बढ़ा दी गई है. 

दरअसल इस मस्जिद का निर्माण कुतुब शाही सल्‍तनत के पांचवे शासक मुहम्‍मद कुली कुतुब शाह ने मक्‍का की मिट्टी से ईंटें बनवा कर किया. इसीलिए इसका नाम मक्‍का मस्जि़द रखा गया. इसका सामने का तीन मेहराबों वाला हिस्‍सा ग्रेनाइट के अकेले बड़े पत्‍थर से बनाया गया है. कहते हैं इसे बनाने में 500-600 कारीगरों को पांच साल का वक्‍़त लगा. यहां आसफ़ जाही शासकों की क़ब्रों सहित निज़ाम और उनके परिवार के लोगों के मक़बरे भी मौजूद हैं. मुख्‍य मस्जिद परिसर 75 फुट ऊंचा है और इसकी तरफ पांच-पांच मेहराबों वाली दीवारें हैं और चौथी दीवार मिहराब यानि कि किबला (मक्‍का में काबा की दिशा) की दिशा बताती है. इस मस्जिद में एक बार में 10,000 से ज्‍यादा लोग नमाज़ अदा कर सकते हैं. रमजान के दिनों में चार-मीनार के भीतर और बाहर का नज़ारा देखने लायक होता है. हजारों लोग अंदर और बाहर सड़क पर एक साथ नमाज़ अदा करते हैं. और हां, यहां के बाजारों में इफ्तार की दावत की रौनक भी देखने लायक है. उस रोज मेरे पास ज्‍यादा वक्‍़त नहीं था सो अंदर तक जाकर नहीं देख पाया. लकिन मुख्‍य द्वार से प्रवेश करने के बाद वहां दाना चुग रहे कबूतरों के पास कुछ वक्‍़त ज़रूर बिताया. यहां छोटे बच्‍चों को दाना खिलाते देखना बड़ा सुकून भरा अनुभव था. डॉक्‍टर लोग कहते हैं कि कबूतरों को दाना खिलाना एक तरह से थैरेपी का काम करता है. एक तरह की मेडीटेशन भी है. आप करके देखिए...मज़ा आएगा. कभी-कभी कबूतरों के झुंड में से आप एक कबूतर की आरे ध्‍यान करके दाना डालते हैं. मगर बाकी कबूतर दानों पर झपट्टा मारते हैं और वो शरीफ़ज़ादा पीछे हट जाता है. आप फिर कोशिश करते हैं कि पगले खा ले. इस खेल में आप कब कबूतरों में गुम हो जाते हैं पता ही नहीं चलता.

मक्‍का मस्जिद से निकल कर एक बार फिर हम चार मीनार की तरफ लौट पड़े. लाड़ बाजार अभी भी सोया हुआ था सो हम इस बाज़ार से जुड़ी संकरी गलियों में ज़ारदोज़ी के कारीगरों का हुनर देखने के लिए जा पहुंचे. ज़ारदोज़ी जानते हें न? ये कला खासतौर पर ईरान, तुर्की, सेंट्रल एशिया के देशों में प्रचलित है जिसमें ज़ार का मतलब है सोना और दोज़ी का मतलब है काम. ये थोड़ा मंहगा काम है इसलिए हिंदुस्‍तान में इसके पहले कद्रदान शाही परिवार, राजे-रज़वाड़े बने. इसमें सोने या चांदी के तारों के साथ नगों का काम होता है मगर अब आम लोगों के बीच इस कला की मांग बढ़ने के साथ ही कारगीर तांबे के तारों पर सोने या चांदी की पॉलिश के साथ ये काम करने लगे हैं. प्रिंस मार्केट की ऐसी ही एक दुकान में हमने एक कारीगर से बातचीत की तो उसने बताया कि यहां हैदराबाद में ज़री के काम की बहुत मांग है और उसके ग्राहक वाट्सएप के जरिए ही काम भेज रहे हैं. हिंदुस्‍तान में पारसी और खासकर मुस्लिम परिवारों में जारदोज़ी के काम की बहुत मांग है. नोटबंदी की मार यहां के धंधे पर खूब पड़ी मगर अब काम पटरी पर आने लगा है. इस दुकान से निकल कर गली में आए तो देखा कि गली मक्‍का मस्जिद के एकदम पीछे जाकर खुलती है. वही किबला वाली दीवार के पीछे. यहां आसिफ़ा के लिए न्‍याय के बैनर हवा में झूल रहे हैं. आसिफ़ा के लिए तो पूरा देश ही न्‍याय चाहता है. अभी ज्‍यादा दुकानें नहीं खुली थीं सो यहां से लौटना पड़ा.

कोई नृप होऊ....हमें तो ज़ारदोज़ी का काम भला
इस इलाके को खंगालते हुए काफी देर हो चुकी थी और अकेली चाय भला बैटरी को कितनी देर तक चार्ज रख सकती थी. ये मेरी किस्‍मत थी कि मेजबान मित्र ऊषा जी एक उम्‍दा फूड ब्‍लॉगर भी हैं सो यहां की गलियों में छिपे नायाब जायकों की थाह रखती थीं. इनके काम को आप इंस्‍टाग्राम पर @travelkarmas या फिर @foodkarma_ पर देख सकते हैं. अब एक बार फिर मेरा सामना एक नए अनुभव से होने जा रहा था. ये था गाविंद भाई का डोसा कॉर्नर. गोविंद कहने को तो रेहडी पर अपना ठिया जमाए हुए हैं मगर उनके जायके के तलबगार दूर-दूर से यहां आते हैं. आएं भी क्‍यों न. यहां डोसा और इडली बनाने का तरीका जो एकदम अलग है. मैंने इतना स्‍वाद भरा डोसा और इडली शायद ही कहीं और खाई हो. ये कहते हुए बता दूं कि दुनिया की सबसे बेहतरीन इडली श्रीमती जी घर पर बनाती हैं. सो गोविंद भाई की इडली दूसरे नंबर पर ही आएगी. हां, गोविंद भाई का डोसा जरूर नंबर 1 है. मगर उसमें जमकर प्रयोग किए गए मक्‍खन को पचाने के लिए शरीर को थोड़ी ज्‍यादा मशक्‍कत की जरूरत होगी. गोविंद अब धीरे-धीरे ब्रांड बनते जा रहे हैं इसीलिए खुद और उनके ठेले पर काम करने वाले लड़के गोविंद डोसालिखी नारंगी टी-शर्ट पहने हुए थे. यहीं आस-पास ऐसे ही एक ठिए पर डोसा बेचने वाले साहब तो इतना कमाते हैं कि मर्सीडीज़ रखे हुए हैं.

तेल रोक के ...मक्‍खन ठोक के...गोविंद भाई का डोसा 
घड़ी में सवा दस बज चुके थे और अब तक पूरा चार-मीनार का इलाका लोगों की आवाजाही से आबाद हो चुका था. इधर पेट फुल हो चुका था और अभी चौमहल्‍ला पैलेस और सालार जंग म्‍यूजियम भी देखने बाकी था. उधर कुछ और मित्रों से चार-मीनार पर मुलाक़ात का वक्‍़त तय था सो मेजबान मित्र से विदा लेकर मैं एक बार फिर चार-मीनार की ओर चल पड़ा.

अब तक चार-मीनार के आस-पास सैकड़ों छोटी-छोटी दुकानें ऐसे उग आईं थी जैसे वो अभी-अभी जमीन से बाहर निकल आई हों. फल, पूजा-पाठ की सामग्री, सजावटी सामाज और खासकर चूडियां ही चूडियां चारों तरफ़. मित्रों के साथ मिलकर एक बार फिर चूडियां खरीदी गईं. अब तक चार-मीनार की पहली मंजिल के लिए एंट्री खुल चुकी थी. सो इसकी पहली मंजिल पर चढ़कर आस-पास के इलाके को देखने की तमन्‍ना भी पूरी करनी थी...सो वही किया. यक़ीनन यहां से आस-पास का नज़ारा बेहद खूबसूरत दिखता है. चूंकि ये इमारत अब पुरातत्‍व विभाग की देख-रेख में है इसलिए ये सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक ही उपलब्‍ध है. रात के वक्‍़त रौशनियों में नहाए चार-मीनार का जलवा अलग ही होता है. इ‍सलिए कभी हैदाराबाद आएं तो एक बार रात में जरूर इस इलाके को देखें. इस यात्रा में तो मुझे ये मौक़ा नसीब नहीं हुआ मगर अगली बार शाम-ए-चार मीनार देखने जरूर आउंगा.
इफ़्तार और चार मीनार             Pic Courtesy : @denny_simon 
हैदराबाद पहली मुलाक़ात में ही दिल में उतर गया है. शायद यहां की एतिहासिक विरासतों, यहां के मोतियों, यहां की स्‍ट्रीट आर्ट, शानदार आईटीसी काकातिया, हैदराबाद में मेरे साथ रहे ड्राइवर इस्‍माइल भाई, की वजह से था...और सबसे बड़ी वजह थीं ऊषा  जी. जिन्‍होंने दिल से अपना शहर दिखाया. शायद उन्‍हीं की वजह से यात्रा के आखि़री पड़ाव पर लगने लगा था कि कोई अपना इस शहर में है सो ये शहर भी अपना सा ही है. तुमसे फिर जल्‍दी मिलूंगा मेरे दोस्‍त हैदराबाद 😊  

आपको कैसी लगी चार मीनार की ये सुबह, मुझे जरूर बताइएगा. 
  
कुछ और तस्‍वीरें सुबह-ए-चार मीनार से ...



गोविंद भाई केे यम्‍मी डोसा 




कराची बेकरी के स्‍वाद भरे फ्रूट बिस्‍कुट

दुकानें अभी सोई हुई हैं...
ज़ारदोज़ी
पिन कोड 500002.... बोले तो चार मीनार 
मैं और ट्रेवल कर्मा ...ऊषा जी

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