यायावरी yayavaree

Tuesday, 3 April 2018

Statue of Queen Victoria, Bangalore: An Interesting Heritage


एक बुत की दिलचस्‍प दास्‍तान 

तमाम शहरों में यात्राओं के दौरान चौराहों या पार्कों में लगे बुत मुझे हमेशा से आकर्षित करते रहे हैं। अलबत्‍ता ये बात और है कि आमतौर पर शहरवासियों को ये बुत निहायत ही साधारण नज़र आते हैं और शायद इसीलिए हर रोज़ इनके करीब से गुज़रने के बावजूद ये उन्‍हें नज़र भी नहीं आते या कहिए कि इनकी ओर ध्‍यान नहीं जाता। आप अपने शहर में लगे कुछ स्‍टेच्‍यू को याद कीजिए कि आखिरी बार आपने कब उन्‍हें गौर से देखा? दरअसल जिन आम चीजों को हम सड़कों से गुजरते हुए हर रोज़ देखते हैं वे हमेशा इतनी मामूली भी नहीं होती हैं। उनके विषय में हमारी अज्ञानता उन्हें मामूली बनाती है। जहां तक चौराहों या पार्कों में खड़े बुतों का सवाल है वे अपने आप में इतिहास के एक टुकड़े को लेकर बड़ी शान से शहर के बीचों-बीच खड़े होते हैं और हमें अतीत के गौरवशाली अध्‍यायों का नियमित रूप से स्‍मरण करा रहे होते हैं।
बैंगलोर या कहिए कि बेंगलूरू में मैं एमजी रोड के पास एक होटल में ठहरा हुआ था। हर रोज होटल से निकलते ही कोई पांच-छह सौ मीटर पर एक स्टेच्यू एक पार्क के कौनेे से झाँकता -नज़र आता। हर बार मन होता कि दो पल गाड़ी रुकवा कर तसल्ली से इस स्टेच्यू को देख लूं। मग़र सड़क पर ट्रैफ़िक या संग में और लोगों के होने से इस ख़्याल को जाने देता। मग़र मन के एक कौने में रख छोड़ा था कि किसी दिन फुर्सत में अकेले ही इधर चला आऊंगा। बस आख़िरी सुबह शहर को अलविदा कहने से पहले मैं इस स्टैच्यू तक आ पहुंचा।

एमजी रोड़ के एक किनारे कब्बन पार्क के एक कोने पर छोटे से पार्क में क्वीन विक्टोरिया का एक बुत नीले जकरंदा के फूलों के नीचे बड़ी शान से खड़ा है। ये साधारण सा दिखने वाला रानी विक्टोरिया का स्टेच्यू भी बेहद खास है। दरअसल 1901 में ब्रिटिश साम्राज्‍य की महारानी विक्‍टोरिया की मृत्‍यु के बाद पूरे ब्रिटिश भारत में महारानी विक्टोरिया के सम्‍मान में कुल 50 बुत लगाए गए थे। दिलचस्‍प बात ये है कि उन 50 बुतों में से केवल 5 ही आज अपनी मूल जगह पर मौजूद हैं। ये बुत उन्हीं 5 बुतों में से एक है। बाकी चार (1) मद्रास यूनिवर्सिटी, चेन्‍नई (2) किंग एडवर्ड VII मार्केट, विशाखापट्टनम, (3) और (4) विक्‍टोरिया मैमोरियल, कोलकाता में आज भी ठीक उसी जगह खड़े हैं जहां उन्‍हें पहली बार लगाया गया था। इत्‍तेफ़ाक से इन पांच में से तीन बुतों को मैंने देखा है और मुझे यकीन है कि बाकी दो से भी जल्‍दी ही मुलाक़ात होगी।

बैंगलोर के लिए इस बुत को तैयार किए जाने की कहानी भी दिलचस्‍प है। यहां क्‍वीन का स्‍टेच्‍यू स्‍थापित करने के लिए क्‍वीन विक्‍टोरिया मैमोरियल फंड स्‍थापना की गई। फंड द्वारा 6 महीने में कुल 10,000 रुपए की व्‍यवस्‍था की गई और उस समय के मैसूर के महाराजा, कृष्‍णराजा वोडेयार IV ने मैमोरियल के लिए जरूरी बाकी 15,500 रुपए की व्‍यवस्‍था की। तो इस तरह कुल 25,500 रुपए का खर्च आया इस बुत पर। यकीनन एक शानदार बुत लगाया जाना था तो इस काम को भी किसी योग्‍य व्‍यक्ति को ही सौंपा जा सकता था। खोजबीन के बाद एक विख्‍यात मूर्तिकार सर थॉमस ब्रोक को इस बुत को तैयार करने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई। ब्रोक वही शख्‍़स थे जिन्‍होंने विक्‍टोरिया मैमोरियल, लंदन में शानदार मूर्तियों का निर्माण किया था। तमाम देशों में उनके हाथों से तराशे गए बुत आज भी उस महान शिल्‍पकार की कला का लोहा मनवा रहे हैं।  बैंगलोर में लगी क्‍वीन विक्‍टोरिया की यह मार्बल की प्रतिमा कुल 11 फुट ऊंची है और चौकीनुमा ग्रेनाइट का आधार 13 फुट उँचा है और इस तरह कुल ऊंचाई 24 फुट है। इस बुत का पूरा निर्माण कार्य लंदन में हुआ और फिर समुद्री जहाज के जरिए 1905 में यह बैंगलोर पहुंचा। दरअसल यह स्‍टेच्‍यू ब्रोक द्वारा 1890 में अपने गृह नगर वोरसेस्‍टर के लिए बनाई गई क्‍वीन की प्रतिमा की हू-ब-हू प्रतिकृति है। जानकारों का कहना है कि ये स्‍टेच्‍यू लंदन, होव, कार्लिस्‍ले, बेलफास्‍ट और केप टाउन में लगी क्‍वीन की प्रतिमाओं से मेल खाता है।

यहां एक दिलचस्‍प कहानी ये भी है कि क्‍वीन अपनी प्रतिमाओं में जितनी खूबसूरत दिखती हैं वो असल में उतनी ही सुंदर नहीं थीं। उनके बुतों में उन्‍हें जानबूझकर सुंदर दिखाया गया ताकि उनके साम्राज्‍य में जनता उनसे मोहब्‍बत कर सके। इस बुत का अनावरण उस वक्‍़त के प्रिंस ऑफ वेल्‍स, जॉर्ज अर्नेस्‍ट V (जो बाद में किंग जॉर्ज V के नाम से जाने गए) ने 5 फरवरी, 1906 को किया। विक्‍टोरिया पार्क में लगा ये बुत वक्‍़त के साथ-साथ अपनी चमक को खोने लगा है और आलम ये है कि कुछ वक्‍़त पहले क्‍वीन के हाथ में रखा गेंदनुमा ग्‍लोब और क्‍वीन के सीधे हाथ की उंगली भी टूट गई थी। मैंने पार्क के बारे में पढ़ते हुए इस टूटी उंगली के बारे में पढ़ा था। मगर उस सुबह मैंने सभी उंगलियों को सलामत पाया। मेरा ध्‍यान शायद ही इस उंगली की तरफ जाता मगर जिस वक्‍़त मैं इस स्‍टेच्‍यू की तस्‍वीरें ले रहा था ठीक उसी वक्‍़त वहां कुछ लोग सिटी वॉक करते हुए आए। ग्रुप में ज्‍यादातर लोग विदेशी नागरिक थे और वे सिटी वॉक के जरिए कब्‍बन पार्क का दौरा कर रहे थे। ग्रुप के गाइड ने अचानक ये रहस्‍य खोला कि हाल ही में इस सटेच्‍यू के रेस्‍टोरेशन का काम किया गया और टूटी उंगली को जोड़कर फिर से ठीक किया गया है। उन्‍होंने एक और दिलचस्‍प बात बताई कि रेस्‍टोरेशन के बाद जोड़ी गई उंगली यानि की सीधे हाथ की इंडेक्‍स फिंगर बाकी उंगलियों के मुकाबले थोड़ी बड़ी है। बात एकदम सही थी। शायद यही वो लम्‍हा था जिसने इस बुत में मेरी दिलचस्‍पी को और भी बढ़ा दिया था। यहां से लौटने के बाद कई दिनों तक इस बुत से जुड़े इतिहास पर काफी कुछ पढ़ा जिसमें से कुछ बातें ऊपर आपसे साझा की हैं। 

हां, एक खास बात और। ऐसा नहीं है कि विक्‍टोरिया की इस मूर्ति को हर शख्‍़स अदब और इज्‍़जत की नज़र से देखता हो। उनका एक ही सवाल है। अंग्रेजों का शासन अत्‍याचारी शासन था तो जब अंग्रेज चले गए तो उनकी प्रतिमाएं क्‍यों? वटल नागराज नाम के एक एक्टिविस्‍ट 1960 से इस बुत सहित कब्‍बन पार्क में लगे सर मार्क कब्‍बन और किंग एडवर्ड के विक्‍टोरिया युगीन बुतों को नष्‍ट कर देने की पैरवी कर रहे हैं। सरकार ने 1977 में इन बुतों को हटाने का निर्णय भी ले लिया था मगर बाद में फैसले को अमल में नहीं लाया गया। मगर इस तरह की मांगें जब-तब उठती रहती हैं। शायद ये बैंगलोर शहर के इतिहासकारों, विरासतों के कद्रदानों के प्रतिरोध का फल है कि ये बुत वक्‍़त की एक विरासत को लेकर आज भी जीवित खड़े हैं।  



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Wednesday, 24 January 2018

Indore: A Tale of Cleanest City of India

कहानी सबसे स्‍वच्‍छ शहर इंदौर की
अपने देश में जहां शहरों में गंदगी, कूड़े के ढ़ेर, सड़कों पर बहता नालियों का पानी और सीवरों का जाम होना आम बात हो वहीं इसी देश में एक ऐसा शहर भी है जो वर्ष 2017 में क्‍लीनेस्‍ट सिटी चुना गया और 2018 में भी सबसे स्‍वच्‍छ शहर का खिताब अपने नाम करने के लिए इस वक्‍़त पूरी शिद्दत से जुटा हुआ है। स्‍वच्‍छता के लिए एक दीवानगी सी पूरे शहर में नज़र आती है मानो इस शहर के प्रशासन और इसके नागरिकों की जि़ंदगी का सबसे ज़रूरी काम शहर को स्‍वच्‍छ रखना है। आप चाहे चाट-खौमचे के अड्डे छप्‍पन चले जाएं या देर रात गुलज़ार होने वाले सर्राफ़ा की तंग गलियों पर नज़र डालें...मजाल है कि ज़रा भी गंदगी कहीं नज़र आ जाए।

राजवाड़ा के ठीक सामने स्‍वच्‍छता का संदेश
मैंने ख़ुद रात 11 बजे भी सफ़ाई कर्मचारियों को सड़कों को बुहारते और गाडियों को कचरा उठाते देखा है। शहर के हर इलाके में कचरे वाली गाडि़यों के आने का समय तय है। अगर गाड़ी तय वक्‍़त पर नहीं आती है तो ज्‍यादा से ज्‍यादा 15 मिनट इंतज़ार करने के बाद आपको सिर्फ एक नंबर पर मिस कॉल देनी है. इसके बाद नियंत्रण कक्ष खुद आपसे संपर्क करेगा और दूसरी गाड़ी मौक़े पर भेजी जाएगी। कचरा उठाना एक बात है मगर गीले, सूखे और घरेलू जैव कचरे का अलग-अगल वेस्‍ट मैनेजमेंट करना दूसरी। कचरे के प्रबंधन की भी बेहतरीन व्‍यवस्‍था सुनिश्चित की गई है। इस तरह निगम प्रशासन ने शहरवासियों को एक मुकम्‍मल इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर मुहैया करवाया है और अब शहरवासी उसकी कद्र करते हुए इस पूरे अभियान को सिर-माथे उठा कर आगे चल रहे हैं। इस पूरी कवायद में बच्‍चों का जुड़ जाना इस अभियान की सार्थकता और इसकी जीवंतता का परियाचक है। लोगों का कहना है कि, ‘साहब अब तो बच्‍चे हमें टोकने लगे हैं कि पापा गन्‍दगी करना बुरी बात है और खुद ही हमारे गिराए हुए पॉलिथीन या लिफ़ाफ़े को उठा लेते हैं

बसें बस एक ही संदेश दे रही हैं इन दिनों 
छप्‍पन का व्‍यस्‍ततम इलाका...मगर गंदगी नदारद है
शहर में सैकड़ों सार्वजनिक शौचालय बनाए गए हैं। मैंने पिछले चार दिनों में किसी को दीवारों पर मूत्र विसर्जन करते नहीं देखा। पूरे शहर में जहां कहीं भी जगह मिली वहीं दीवारों, बाउंड्रियों, खंबों, दुकान के शटरों, बसों, ऑटो और यहां तक कि मंदिरों में भी हर जगह को स्‍वच्‍छता के संदेशों से रंग दिया गया है। शहर में हर सड़क के किनारे अलग-अलग तरह के कचरे के लिए डस्‍टबिन लगे हैं और कार चालकों को सस्‍ते कार डस्‍टबिन भी दिए जा रहे हैं। इसके लिए बाकायदा विक्रय केन्‍द्र भी खोले गए हैं। आप लोकेटर की मदद से नज़दीकी शौचालय ढूंढ सकते हैं और तमाम सुविधाओं के लिए हेल्‍पलाइन नंबर 1969 पर संपर्क कर सकते हैं। मोबाइल एप भी खूब लोकप्रिय हो रहा है। 

प्‍लास्टिक कचरे को रीसाइकल करने की मशीन
रीसाइकल योग्‍य प्‍लास्टिक कचरे को रीसाइक्लिंग मशीनों में डालने पर गिफ्ट वाउचर्स मिलते हैं। हालांकि छप्‍पनके बाज़ार में लगी एक ऐसी मशीन मुझे बंद हालात में मिली। संभव है हाल-फिलहाल में खराब हुई हो। चीजों को दुरुस्‍त रखना अपने-आप में एक चुनौती है। किसी भी व्‍यवस्‍था को शुरू करना आसान है मगर उसे बनाए रखना बहुत कठिन होता है। फिर भी कमोबेश स्थिति बेहतर नज़र आती है। कुछ लोग इस कवायद का श्रेय निगम कमिश्‍नर मनीष सिंह को देते हैं तो कुछ लोग इस अभियान की सूत्रधान यहां की महापौर श्रीमती मालिनी गौड़ को मानते हैं। एक महानगर जैसे शहर को लगातार साफ़ रखना यकीनन आसान काम नहीं है। चुनौतियां लगातार सामने आती हैं। इन चुनौतियों में एक चुनौती है धार्मिक जुलूसों आदि में होने वाली गंदगी से निपटना और आयोजकों को सफ़ाई के प्रति संजीदा बनाना। निगम इसके लिए कोई रियायत नहीं बरतता है। कुछ स्‍थानीय मित्रों ने बताया कि अभी हाल में निगम ने एक धार्मिक समुदाय के जुलूस से हुई गंदगी के लिए 50,000 का दंड लगाया तो वहीं दूसरे धार्मिक समुदाय द्वारा जलाशयों को गंदा करने पर मोटा जुर्माना ठोका है। शहर में किसी भी तरह की गंदगी फैलाने वालों को बख्‍शा नहीं जा रहा है। रेहड़ी खौमचे वालों को सख्‍़त हिदायत है। इस तरह इंदौर तमाम शहरों के लिए रोल मॉडल बन सकता है। 



स्‍वच्‍छता के लिए प्रेरित करने का सबसे रोचक अंदाज़ मुझे यहां के खजराना मंदिर में मिला जहां स्‍वयं भगवान की ओर से संदेश दीवारों पर चस्‍पा हैं कि मैं आपका घर गंदा नहीं करता हूं, आप मेरा घर गंदा न करें। बात सीधी सी है और यही बात शहर पर भी लागू होती है। हम अपना घर साफ रखना चाहते हैं तो शहर को क्‍यों गंदा करते हैं ? हम जब पूरे शहर को अपना घर मानेंगे तभी हम शहर को स्‍वच्‍छ रख पाएंगे। अन्‍यथा स्‍वच्‍छता अभियान केवल एक फोटो अपॉर्चुनिटी बन कर रह जाएगा। 
खजराना मंदिर परिसर

इंदौर रहेगा नंबर 1
कैसे चुना जाता है सबसे स्‍वच्‍छ शहर ?
क्‍लीनेस्‍ट शहरों का चयन शहरी विकास मंत्रालयभारत सरकार और केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा प्रकाशित की जाने वाली नेशनल सिटी रेटिंग के आधार पर किया जाता है। स्‍वच्‍छ भारत अभियान सर्वेक्षण 2017 में कुल 500 शहरों को शामिल किया गया है और पूरे देश को पांच जोन में बांट कर हर शहर को कुल 19 मानकों पर परखा गया है। शहरी विकास मंत्रालय द्वारा Quality Council of India को यह सर्वेक्षण करने के लिए अधिकृत किया गया है। इसका सर्वेक्षण का उद्देश्‍य शहरों के बीच प्रतिस्‍पर्धा को बढ़ावा देना और उन्‍हें अपनी स्‍वच्‍छता का स्‍तर जानने का अवसर प्रदान करना है। हर शहर के प्रदर्शन को
·        म्‍युनिसिपल सोलिड वेस्‍ट – झाडू लगाना, कचरे का संग्रहण और ढुलाई
·        म्‍युनिसिपल सोलिड वेस्‍ट – प्रसंस्‍करण और ठोस कचरे का निस्‍तारण
·        खुले में शौच से मुक्‍त होना/ शौचालयों की व्‍यवस्‍था
·        क्षमता निर्माण और इलैक्‍ट्रॉनिक माध्‍यमों से ज्ञान का प्रसार
·        सार्वजनिक और सामु‍दायिक शौचालयों का प्रावधान
·        सूचनाशिक्षा और संचार तथा व्‍यवहारगत परिवर्तन आदि बिन्‍दुओं की कसौटी पर परखा जाता है।

स्‍वच्‍छता सर्वेक्षण 2017 ने इंदौर को सबसे स्‍वच्‍छ शहर चुना है और ये भी आश्‍चर्य की बात है कि मध्‍यप्रदेश का ही एक दूसरा सुंदर शहर भोपाल इस सर्वेक्षण में दूसरे स्‍थान पर रहा है। अब इंदौर अपने खिताब को बचाने के लिए जी-जान से जुटा हुआ है। शहर में हर ओर बस एक ही नारा हैइंदौर फिर बनेगा नंबर 1। ये एक अच्‍छी शुरूआत है। यदि इसी तरह सभी शहर आपस में प्रतिस्‍पर्धा करने लगें तो पूरा देश स्‍वच्‍छ होने में देर नहीं लगेगी। ये कार्य केन्‍द्र के स्‍तर पर किया जा रहा है। इसी तरह राज्‍य सरकारों द्वारा भी अपने-अपने स्‍तर पर सबसे स्‍वच्‍छ शहरजिलातहसील और ग्राम पंचायतों को चुना जा सकता है। अगर इंदौर कर सकता है तो बाकी शहर क्‍यों नहीं? वर्ष 2017 के स्‍व्‍च्‍छता सर्वेक्षण में निचले पायदानों पर रहे भोपाल, मैसूरसूरतविशाखापट्टनम इस बार ऊपर आने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।
वर्ष 2017 के शीर्ष 15 स्‍वच्‍छ शहरों में ये शहर शामिल हुए :

स्वच्छता सर्वेक्षण रैंक
शहर
राज्य / संघ शासित प्रदेश
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15




















ये इत्‍तेफाक ही है कि जिन दिनों मैं इंदौर में हूं उन्‍हीं दिनों स्‍वच्‍छता सर्वेक्षण 2018 चल रहा है। हो सकता है कि शहर इन दिनों पहले से ज्‍यादा सतर्क और मुस्‍तैद हो मगर यहां के स्‍थानीय लोगों से बातचीत करने से पता चलता है कि स्‍वच्‍छता अब यहां का वर्ष भर चलने वाला कार्यक्रम बन चुका है और अब धीरे-धीरे ये शहर की संस्‍कृति में घुल-मिल गया है। मेरे इंदौर में आने और शहर छोड़ने तक हर तरफ़ स्‍वच्‍छता अभियान की छाप नज़र आई. मैं इंदौर को 2018 में भी सबसे स्‍वच्‍छ शहर बनने की शुभकामनाएं देता हूं और पाठक मित्रों से आग्रह करूंगा कि मौका मिले तो एक बाद इंदौर जरूर जाएं और कुछ नहीं तो एक स्‍वच्‍छ शहर देखने के लिए ही सही. 

17 अप्रैल, 2018 की अपडेट: 
इंदौर को वर्ष 2018 में भी सबसे स्‍वच्‍छ शहर के रूप में चुुुुना गया है। इंदौर को बहुत ये खिताब बहुत मुबारक :)

कुुछ और तस्‍वीरें इन्‍दौर से:











छप्‍पन की रौनक 


सर्राफ़ा
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