यायावरी yayavaree

Thursday, 28 February 2019

राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक (National War Memorial) : एक तीर्थ स्‍थल


देश पर अपने प्राण न्‍यौछावर करने वाले वीर सपूतों के बलिदान के प्रति कृतज्ञ राष्‍ट्र को अंतत: एक राष्‍ट्रीय युद्ध स्‍मारक प्राप्‍त हुआ. 25 फरवरी, 2019 की शाम देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक (National War Memorial) को राष्‍ट्र को समर्पित किया. ये समय का अजब संयोग ही है कि यह स्‍मारक ऐसे समय में बनकर तैयार हुआ है जब कुछ ही दिनों पहले कश्‍मीर में सीआरपीएफ के 40 जवानों पर हुए हमले के बाद देश की सीमाओं पर तनाव बढ़ा हुआ है और देश का जन-मानस एक ओर जहां प्रतिशोध की आग में जल रहा है वहीं अपने बहादुर सपूतों के बलिदान के प्रति अश्रुपूरित श्रृद्धा सुमन अर्पित कर रहा है. दिल्‍ली में इंडिया गेट के ठीक पीछे की ओर तकरीबन 40 एकड़ क्षेत्र में फैला ये युद्ध स्‍मारक स्‍वयं में अद्भुत है. इस स्‍मारक में 1947-18 (आजादी के तुरंत बाद कश्‍मीर में कबाइली हमला), 1961 (गोवा), 1962 (चीन), 1965, 1971, 1987 (पाकिस्‍तान), 1987-88 (श्री लंका), 1999 (कारगिल) सहित ऑपरेशन रक्षक जैसे तमाम अन्‍य अभियानों में अपने सर्वस्‍व देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्‍त होने वाले योद्धाओं के नाम स्‍वर्णाक्षरों में अंकित किए गए हैं. 

National War Memorial

चक्रव्‍यूह की संरचना से प्रेरित इस स्‍मारक की डिजाइन में कुल चार चक्र हैं जो सशस्‍त्र सेनाओं के अलग-अलग मूल्‍यों को रेखांकित करते हैं:

National War Memorial
अमर चक्र (circle of immortality): अमर चक्र में एक 15 मीटर ऊंचा स्‍मारक स्‍तंभ और अमर जवान ज्‍योति है.
वीरता चक्र (circle of bravery): वीरता चक्र में थल सेना, वायु सेना और नौ सेना द्वारा लड़े गए छह प्रमुख युद्धों के दृश्‍य कांसे की धातु से दीवारों पर उकेरे गए हैं. इन्‍हें सुप्रसिद्ध मूर्तिकार श्री राम सुथार द्वारा तैयार किया गया है.
त्‍याग चक्र (circle of sacrifice): त्‍याग चक्र में लगभग 25,942 शहीदों के नाम 1.5 मीटर ऊंचाई की 16 दीवारों पर सुनहरे अक्षरों में अंकित हैं.
रक्षा चक्र (circle of protection): सबसे बाहरी इस सुरक्षा चक्रको 695 पेड़ों से तैयार किया गया है. ये वृक्ष रक्षा करने के लिए खड़े सैनिकों को प्रदर्शित करते हैं.



ऐसा नहीं है कि देश में इससे पहले कोई युद्ध स्‍मारक नहीं था. मगर राष्‍ट्रीय स्‍तर के एक युद्ध स्‍मारक की मांग देश की आजादी के बाद से लगातार उठती रही है. ये जानकर हैरानी ही होती है कि राष्‍ट्रीय युद्ध स्‍मारक की मांग पहली बार 1960 में सशस्‍त्र सेनाओं की ओर से ही उठाई गई थी और इस स्‍मारक को बनकर तैयार होने में 60 बरस लग गए. दरअसल वर्ष 2006 में यूपीए सरकार ने इंडिया गेट के पास एक राष्‍ट्रीय स्‍मारक बनाने का निर्णय लिया. और 20 अक्‍तूबर, 2012 को तत्‍कालीन रक्षा मंत्री श्री ए. के. एंटनी ने एक समारोह में इस स्‍मारक को बनाए जाने की घोषणाा की. लेकिन दुर्भाग्‍यवश ये मामला अफसरशाही के बीच बरसों इधर से उधर होता रहा. फिर 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार में इस विषय पर एक बार फिर काम शुरू हुआ और अब बहुत तेजी से इसका निर्माण किया गया.

ये जानना भी दिलचस्‍प है कि इस स्‍मारक के प्रमुख वास्‍तुकार श्री योगेश चंद्रहसन हैं. दरअसल स्‍मारक के डिजाइन के लिए सरकार ने एक ग्‍लोबल डिजाइन कंपीटीशन के माध्‍यम से लागों से प्रविष्टियां आम‍ंत्रित की थीं. इस प्रतियोगिता में चेन्‍नई की WeBe Design Lab को विजेता घोषित किया गया. इस डिजाइन के बारे में श्री चंद्रहसन कहते हैं- 

पूरी संकल्‍पना इस विचार पर आधारित है कि युद्ध स्‍मारक एक ऐसा स्‍थान होना चाहिए जहां हम मृत्‍यु पर शोक न मनाएं बल्कि सैनिकों के जीवन और उनके बलिदान का सम्‍मान करें.

National War Memorial

त्‍याग चक्र के बाहर एक स्‍थान पर एक टच स्‍क्रीन लगी हुई है. इस स्‍क्रीन के पास खड़े जवान से मैंने इसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि इस स्‍क्रीन पर किसी भी शहीद का नाम या उसकी रेजीमेंट या उसका सर्विस नंबर डालकर त्‍याग चक्र में उसके नाम की जगह का पता लगाया जा सकता है. ज़रा सोचिए कि देश के सैकड़ों-हज़ारों गांवों, कस्‍बों और शहरों से जब इन हज़ारों शहीदों के परिजन और भावी पीढि़यां यहां आकर अपने भाई, पुत्र पिता, दादा, परदादा का नाम यहां सुनहरे अक्षरों में लिखा देखेंगे तो गर्व से उनका सीना कितना चौड़ा हो जाएगा. इसकी एक झलक मुझे आज भी देखने को मिली. एक सरदार जी एक जगह पर एक शहीद के नाम पर उंगलियां फेर रहे थे और फिर अपने कैमरे से उस पट्टी के साथ एक सेल्‍फी भी ली. ज़रूर कोई संबंध रहा होगा. अभी इस स्‍मारक का उद्घाटन हुए सिर्फ दो दिन हुए हैं इसलिए उद्घाटन समारोह के दौरान फूलों से की गई सजावट यथावत है. लेकिन ये स्‍मारक अपने आप में इतना खूबसूरत है कि आने वाले समय में भी यहां आने वाले लोगों को शहादत का सम्‍मान करने के लिए प्रेरित करता रहेगा. मुझे वो पंक्तियां याद हो आईं जो स्‍मारक के बीच में लगे शिला स्‍मारक के नीचे लिखी गई हैं:

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा'

तस्‍वीर : रक्षा मंत्रालय

एक खास बात ये है कि इस शिला स्‍तंभ के भीतर प्रज्‍वलित अमर जवान ज्‍योति के साथ-साथ इंडिया गेट की अमर जवान ज्‍योति भी हमेशा जलती रहेगी. दरअसल इंडिया गेट विश्‍व युद्ध के शहीदों की याद में बनाया गया स्‍मारक था लेकिन अमर जवान ज्‍योति को 1971 के भारत-पाकिस्‍तान के युद्ध के शहीदों की याद में शुरू किया गया था. एक तरह से ये दोनों स्‍मारक एक दूसरे के पूरक ही हैं. इन दोनों को समग्रता में ही देखा जाना चाहिए. राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक के साथ-साथ निकट के प्रिंसेस पार्क में राष्‍ट्रीय समर संग्रहालय भी तैयार किया जा रहा है. कुल 500 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक तथा राष्‍ट्रीय समर संग्रहालय के निर्माण के कार्य को समय पर पूरा करने का दायित्‍व रक्षा मंत्रालय को सौंपा गया है. उम्‍मीद है जल्‍द ही ये संग्रहालय भी तैयार हो जाएगा.
Param Yoddha Sthal 
इस स्‍मारक के मुख्‍य परिसर को देखकर जैसे ही हम बाहर निकलते हैं, रास्‍ता हमें सीधे परम योद्धा स्‍थल की ओर ले जाता है. परम योद्धा स्‍थल में दरअसल कुल 21 परम वीर चक्रविजेतओं की कांसे की अर्द्ध-प्रतिमाएं लगाई गई हैं. हर प्रतिमा के साथ उनके शौर्य की कहानी पास में लगे पत्‍थर बयां कर रहे हैं. हरे-भरे लॉन और पेड़ों के खूबसूरत लैंडस्‍केप के बीच तीन दायरों में इन वीर जवानों की कहानियां आंखों के आगे से गुज़रती हैं तो हमारा सिर गर्व से खुद-ब-खुद उठ जाता है और फिर इन महान सपूतों के बलिदानों के लिए उनके शौर्य के सामने नतमस्‍तक हो जाता है. 


इन परमवीर चक्र विजेताओं में अब्‍दुल हमीद, मेजर सोमनाथ शर्मा, अरुण खेत्रपाल, मेजर शैतान सिंह के किस्‍से में बचपन से सुनता और पढ़ता आया हूं. परमवीर चक्र विजेता अब्‍दुल हमीद के बारे में सबसे पहले मुझे पापा ने बताया था. वो नाम में आज तक नहीं भूला और आज उनके बुत के सामने खड़े होकर अजीब सी अनुभूति हो रही थी. जैसे पापा कहानी सुना रहे हों और मैं सुन रहा हूं. वही अब्‍दुल हमीद जिन्‍होंने 1965 के युद्ध में पाकिस्‍तान के सात पैटन टैंको को उड़ा दिया था. ऐसी और भी कई कहानियां हैं जो इस परम योद्धा स्‍थल पर आकर जेहन में ताज़ा हो जाती हैं. हमें अपने बच्‍चों को ये कहानियां जरूर सुनानी चाहिएं. उन्‍हें बताना चाहिए कि देश के असली नायक हमारे वीर जवान हैं. मैं कई बार महसूस करता हूं कि शहीदों की कहानियों को तो स्‍कूल के सिलेबस का अनिवार्य हिस्‍सा होना चाहिए. हर क्‍लास में कुछ न कुछ पढ़ाया जाए. और बच्‍चों को ऐसे स्‍मारक अवश्‍य दिखाने चाहिएं. 
आज स्‍मारक को खुले पहला ही दिन था और मैं देख रहा था कि कई स्‍कूलों के बच्‍चे यूनीफॉर्म में अपने शिक्षकों के साथ यहां आए हुए थे. इस स्‍मारक में ड्यूटी पर तैनात फौजी उन बच्‍चों को इन शहीदों के बारे में विस्‍तार से बता भी रहे हैं और उन्‍हें जीवन में अच्‍छे काम करने और अपने देश से प्‍यार करने का मंत्र भी दे रहे हैं.

इस स्‍थान पर लगे कुल 21 बुतों से जुड़ी एक खास बात ये भी है कि इनमें से सूबेदार मेजर (ओनरेरी कैप्‍टन) बाना सिंह (सेवानिृत्‍त), सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव और सूबेदार संजय कुमार आज भी जीवित हैं. सूबेदार मेजर बाना सिंह को तो मैं 26 जनवरी की परेड़ में कई बार सीना तान कर खड़े होते हुए देख चुका हूं. ये लोग देश की धरोहर और अभिमान हैं. येे स्‍मारक किसी तीर्थ स्‍‍थल से कम नहीं. मुझे पूरा यकीन है कि ये राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक और परम योद्धा स्‍थल आने वाली पीढियों को हमेशा इन परम योद्धाओं के बलिदान का महत्‍व समझाते रहेंगे.

एंट्री फीस: नि:शुल्‍क
समय : प्रात: 9 से सांय 6.30 (नवंबर से मार्च)
  : प्रात: 9 से सांय 7.30 (अप्रैल से अक्‍तूबर)

कुछ और तस्‍वीरें इस स्‍मारक से- 
















Pic: MOD
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Tuesday, 22 January 2019

जोधुपर से जैसलमेर: एक यादगार रोड ट्रिप


उतरती जनवरी के साथ ही उत्‍तर भारत की फिज़ा में नरमाई घुलने लगी है। सुबह अब चुभती नहीं बल्कि गुलाबी ठंड चेहरे को नर्म और मखमली हाथों से छूकर दिन की शुरूआत कराती है। इससे पहले कि मौसम का मिजाज सूरज की तपिश से लाल हो, मैंने रंगीले राजस्‍थान के एक रंगीले हिस्‍से से मुलाक़ात तय कर ली थी। यों समझिए कि 15 फरवरी तक के ये दिन मौसम की आखिरी मौहल्‍लत हैं जोधपुर-जैसलमेर जैसे गर्म मिजाज़ इलाकों की नज़ाक़त से भरी मेहमाननवाज़ी का आनंद लेने के लिए। किसी काम के सिलसिले में जोधपुर आना हुआ। हुआ कुछ यूं कि तीन दिन की इस यात्रा में दो दिन जोधपुर में ही निपट गए। इधर जैसलमेर के लिए ले दे कर केवल एक दिन बचा था। एक घुमक्‍कड़ को अगर एक दिन मिल जाए तो वो पूरी दुनिया नाप देना चाहता है। कुछ ऐसा ही हाल अपना भी था। अब एक दिन में जोधपुर से जैसलमेर तक आने-जाने में लगभग 600 किलोमीटर का सफर तय कर उसी दिन वापिस जोधपुर लौटना आसान काम तो कतई नहीं था। इस तूफानी दौरे के लिए तो बढि़या सारथी की जरूरत थी। तभी ख्‍याल आया भरोसेमंद सवारी कार रेंटल सर्विस का और जोधपुर से जैसलमेर के लिए झटपट ऑनलाइन कैब बुक कर डाली

इस बार इत्‍तेफ़ाक से मेरे एक मित्र भी मेरे साथ थे जो खुद राजस्‍थान से हैं और घुमक्‍कड़ी का शौक रखते हैं। अब दो घुमक्‍कड़ मिल जाएं तो हौसला दोगुना नहीं चार गुना हो जाता है। हम तैयार थे। गूगल मैप बता रहा था कि जोधपुर से जैसलमेर तकरीबन 277 किलोमीटर पड़ेगा। अब जब हम जैसलमेर तक हिम्‍मत कर ही रहे थे तो दिल जैसलमेर से तकरीबन 40 किलोमीटर आगे सम में रेत के धोरों पर ढ़लते सूरज को देखने के लिए भी मचल उठा। ड्राइवर से बात की तो वह हमारे हौंसले देखकर हंस पड़ा और बोला कि सब दिखा दूंगा, लेकिन आपको सुबह 5 बजे से पहले जोधपुर छोड़ना होगा। मोटा-मोटा अंदाजा लगाया तो साफ हो गया कि हम सम सैंड ड्यून्‍स (Sam Sand Dunes) तक की यात्रा निपटा कर रात 10-11 बजे तक जोधपुर लौट सकते हैं। हमने उसका हुक्‍म सर आंखों पर लिया और कुछ घंटों की नींद भरने के बाद अगली सुबह ठीक 5.15 पर सफर शुरू कर दिया।

जैसे ही जैसलमेर की राह पकड़ी, एक चमचमाते हुए शानदार नेशनल हाइवे नंबर 125 ने हमारा स्‍वागत किया। ड्राइवर ने बताया कि राजस्‍थान में सड़कों का जाल बहुत अच्‍छा है और खासकर यहां हाइवे बहुत अच्‍छी हालत में हैं। जैसलमेर को जाने वाला ये हाइवे सामरिक दृष्टि से भी बहुत महत्‍वपूर्ण है। जोधपुर से जैसलमेर तक बीच-बीच में इस हाइवे के दोनों ओर फौजी ठिकाने बने हुए हैं मगर कहां कितनी फौज और साजो-सामान मौजूद है इसका पता नहीं लगाया जा सकता। कुछ निशान हैं सड़क के किनारे जिन्‍हें सिर्फ फौज के लोग ही समझ सकते हैं। इस पूरे इलाके पर फौज की अच्‍छी पकड़ थी इस बात की तस्‍दीक हाइवे से लगातार गुज़रने वाले फौजी ट्रक कर रहे थे। जोधपुर छोड़े हमें कोई दो घण्‍टे हो आए थे और चाय की तलब और जोर मारने लगी थी। दरअसल चाय तो बहाना है गाड़ी में पड़े शरीर को सीधा करने, हड्डियों को थोड़ा पैम्‍पर करने और इस बहाने ड्राइवर को थोड़ा सुस्‍ताने का मौका देने का। और इससे भी ज्‍यादा किसी रोड ट्रिप के बीच कहीं ठहर कर सफ़र के रोमांच को चाय की चुस्‍की में महसूस करने का। हाइवे के एक ओर अलसाया सा ढ़ाबा नज़र आ रहा था। गूगल मैप नज़र डाली तो कोई धीरपुरा नाम की जगह थी। बस यहीं पहला पड़ाव डाला गया। उस अंधेरे हम चाय के तलबगारों के आने से ही ढ़ाबे में काम करने वालों की नींद टूटी। बड़ी खुशी-खुशी चाय तैयार की गई। कड़क अदरक वाली चाय ने ठंड की सुरसुरी को तुरंत दूर कर दिया और उधर सूरज की किरणें बस अंगडाई लेती हुई दि‍खने लगी थीं।
कुछ यूं कदमताल करते मिले रेत के टीले  
हाइवे पर जहां-जहां काम चल रहा था। कुछ ही देर में सड़क के बाईं ओर रेत के टीलों ने हमारे साथ चलना शुरू कर दिया। दूर कहीं पवनचक्कियां भी झूमती नज़र आ रही थीं। यूं ही चलते-चलते हम यात्रा के पहले पड़ाव पोकरण आ पहुंचे। यहां से हमें एक और मित्र को अपने साथ लेना था। पोकरण तो आप जानते ही होंगे। यहीं भारत ने दो परमाणु परीक्षण किए थे। पहला 1974 में जिसका कोड नेम स्‍माइलिंग बुद्धा था और दूसरा 1998 में ऑपरेशन शक्ति। मगर इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि न्‍यूक्लियर टेस्‍ट की वास्‍तविक जगह दरअसल पोकरण नहीं बल्कि यहां से तकरीबन 26 किलोमीटर दूर एक जगह खेतोलाई है। कुछ ही देर में हम पोकरण गांव में अपने मित्र के घर पर थे। झटपट चाय-नाश्‍ते ने धीमी पड़ती बैटरी में प्राण फूंक दिए और हम हम तीन लोग आगे के सफर पर निकल पड़े। लेकिन इस तीसरे साथी ने सड़क पर आते ही यात्रा में एक और पड़ाव राम देवरा जोड़ दिया।


पोकरण जैसे गांवों में भी कलात्‍मकता अभी जिंदा है

पोकरण के घरों की छत पर 

रोड ट्रिप का यही सबसे बड़ा आनंद है कि इसमें आप जब जी चाहे परिवर्तन कर सकते हैं। अब हवाई या रेल यात्रा में ये सुख कहां। बस फिर क्‍या था पोकरण से जैसलमेर की सड़क पर आगे-बढ़ते हम अचानक बाईं ओर राम देवरा की ओर निकल लिए। राम देवरा दरअसल हिंदुओं और मुस्लिमों के आराध्‍य संत बाबा रामदेव की स्‍थली है और न केवल राजस्‍थान बल्कि आस-पास के सभी राज्‍यों से हजारों की संख्‍या में उनके भक्‍त यहां आते हैं। यहां शायद सावन के महीने में कोई मेला लगता है। लोगों का कहना है कि मेले के वक्‍़त यहां हाइवे पर आधी सड़क पैदल चलने वाले भक्‍तों से भर जाती है और मंदिर में भी दर्शन करना आसान नहीं होता है। मगर उस दिन वहां कोई भीड़ नहीं थी। हमने बड़े सुकून से दर्शन किए और थोड़ी देर मंदिर परिसर के शांत माहौल में बिताए और फिर वापिस अपने सफ़र पर लौट लिए।


जैसलमेर की ओर जाने वाली सड़क एक बार फिर दोनों तरफ के वीरान इलाके को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। आगे चलकर ये सड़क कुछ दिलचस्‍प नाम वाले गांवों से होकर गुज़री। जैसे कि एक गांव का नाम चाचा था तो एक दूसरे गांव का नाम लाठी था। भला लाठी भी कोई नाम होता है गांव का। अब होता है तभी तो था। लाठी पार करते ही सड़क के एक ओर ऊंटों का जैसे कोई मेला लगा था। हमने गाड़ी रोक ली और इस ऊंटों के इस जमघट को निहारने लगे। ऊंटों के एक बुजुर्ग मालिक से पूछा कि ये लश्‍कर आखिर कहां जा रहा है तो उन्‍होंने बताया कि वे इन ऊंटों को बेचने के लिए ले जा रहे हैं। कुछ खरीदार इसी जगह पर आकर भी ऊंट खरीद कर ले जाते हैं। जैसे दिल्‍ली जैसे इलाकों में लोग अपने घर में गाडियों को संपत्ति की तरह देखते हैं ठीक वैसे ही राजस्‍थान के इस इलाके में ऊंट लोगों के लिए संपत्ति से कम नहीं।



जैसलमेर वॉर म्‍यूजियम 
उन बुजु्र्गों से विदा लेकर हम एक बार फिर तेज रफ्तार से जैसलमेर की ओर बढ़ने लगे। तभी अचानक मेरी नज़र दाईं ओर एक बड़े कॉम्‍पलेक्‍स पर पड़ी। इसके मुख्‍य द्वार पर लगे बोर्ड पर लिखा था जैसलमेर वॉर म्‍यूजियम। मैंने एकदम से ड्राइवर को रुकने के लिए कहा। ड्राइवर ने बताया कि ये म्‍यूजियम अभी दो एक साल पहले ही बना है और हमें जरूर देखना चाहिए। सुबह जोधपुर छोड़ते वक्‍़त तय किया गया था कि हम बिना रुके सीधे जैसलमेर ही पहुंचेंगे और यहां एक के बाद एक पड़ाव जुड़ते चले जा रहे थे। ड्राइवर ने मन पढ़ लिया और बोला कि अभी हमारे पास समय है आप 20 मिनट में इसे देख सकते हैं। बस अगले 20 मिनटों में इस म्‍यूजियम में भारत-पाकिस्‍तान के तमाम युद्धों से जुड़े तथ्‍यों, जवानों की वीर-गाथाओं, युद्ध में जब्‍त किए गए पाकिस्‍तानी टैंकों, युद्धक विमानों, ट्रकों के साथ-साथ परमवीर चक्र और महावीर चक्र विजेताओं के स्‍टेच्‍यू को निहारते हुए गुजरे। तो ठीक 20 मिनट बाद हम एक बार फिर सड़क पर फर्राटा भर रहे थे। जैसलमेर अब बस 12 किलोमीटर ही दूर था मगर एक विशाल रेगिस्‍तान के बीच सांप की तरह बलखाती सड़क हमें तेजी से अपनी मंजिल की ओर लिए जा रही थी।


मगर सैकड़ों किलोमीटर के रेगिस्‍तान को पीछे छोड़ आने के बाद इस वीराने को देख-देख कर मन में एक सवाल उठने लगा कि जोधपुर जैसे बड़े शहर से इतनी दूर रेगिस्‍तान के बीच जैसलमेर नाम की कोई जगह है भी तो वह इस हजारों मील के वीराने में कैसे बसी हुई है? जवाब बड़ा दिलचस्‍प है। दरअसल जैसलमेर सदियों से चीन से तुर्की और इटली को जोड़ने वाले 2000 साल पुराने सिल्‍क रूट पर बसा एक शहर रहा है। लगभग 400 साल पहले व्‍यापारियों और यात्रियों ने मध्‍य एशिया में पामीर के पहाड़ों की बजाय इस थार मरुस्‍थल के बीच से होकर गुज़रना ज्‍यादा बेहरत समझा। इसीलिए जैसलमेर के आस-पास तमाम कारणों से उजड़ गए कुलधरा, खाबा और कनोई जैसे इलाकों के अवशेष इस बात की गवाही देते हैं कि ये इलाका यात्रियों का पसंदीदा पड़ाव हुआ करता था। मगर अब आजादी के बाद तो सरकार और फौज ने पाकिस्‍तान बॉर्डर के निकट एक शहर को बसाए रखना तमाम कारणों से जरूरी समझा है। सरकार बेहिसाब पैसा यहां के विकास के लिए खर्च करती है। मगर फिर भी जिंदगी इतनी आसान नहीं है। जिंदगी की जरूरत की चीजें यहां तक पहुंचते-पहुंचते मंहगी हो जाती हैं। पर्यटन इस इलाके के लोगों की जीवन-रेखा है और अक्‍तूबर से लेकर फरवरी के आखिर तक का वक्‍़त यहां का सीजन है। इसके बाद तो जैसलमेर की जमीन बस आग ही उगलती है। इसीलिए यहां फरवरी की शुरूआत में आयोजित होने वाले मरू महोत्‍सव ने इंटरनेशनल टूरिस्‍ट मैप पर इस इलाके की पहचान कायम कर दी है।

ड्राइवर से बातें चलती रहीं और सफर अब और दिलचस्‍प हो चला था। असल में रोड ट्रिप में अगर ड्राइवर इलाके की जानकारी रखता हो तो आप कम समय में ही इलाके के इतिहास, भूगोल और संस्‍कृति की नब्‍ज़ पकड़ लेते हैं। इस आउटस्‍टेशन कार रेंटल सर्विस के बारे में दोस्‍तों से काफी तारीफ सुन चुका था कि ये एक सस्‍ती और भरोसेमंद कार रेंटल सर्विस है और ड्राइवर के साथ अब तक के सफर ने इस कार सेवा को चुनने के मेरे फैसले को सही साबित कर दिया था। बातों-बातों में ही हम जैसलमेर के नज़दीक आ पहुंचे। कई किलोमीटर दूर से ही जैसलमेर फोर्ट या कहिए कि सोनार किला नज़र आने लगा। लगा कि दो-चार मिनट में ही हम फोर्ट के सामने होंगे। लेकिन अभी कहां। रोड ट्रिप आपको हर कदम पर न चौंकाए और छकाए तो रोड ट्रिप काहे की। हम जैसलमेर शहर में प्रवेश करते, इससे पहले ही गड़ीसर लेक ने अपनी ओर खींच लिया।

गड़ीसर लेक दरअसल जैसलमेर के पहले शासक राजा रावल जैसल द्वारा बनवाई गई झील है जिसका बाद में महाराजा ग‍डीसीसार ने पुननिर्माण और जीर्णोद्धार करवाया। यहां के सूर्योदय और सूर्यास्‍त के नज़ारे हमेशा यादों में बस जाते हैं। इस लेक से बाहर निकले तो पेट में चूहे दौड़ने लगे। गाड़ी को सीधे बाजार में मचान नाम के रेस्‍तरां के बाहर रोका। पहली मंजिल पर बने इस रेस्‍तरां में बैठकर तसल्‍ली से गोल्‍डन फोर्ट को निहारते हुए भोजन किया गया। उस दोपहर और फोर्ट के उस दिलकश नजारे को कभी नहीं भुलाया जा सकता।

गडीसर झील 

गडीसर झील
गोल्‍डन फोर्ट का प्रवेश द्वार
अब तक घड़ी में दोपहर का डेढ़ बज चुका था। अब शुरू हुआ जैसलमेर किले को भीतर से समझने का सिलसिला। अगले दो-ढ़ाई घंटे हमने पूरे किले का करीब से जाना और समझा। इसके बाद बारी आई पटवों की हवेलियों की। हर चीज अपने आप में पूरा इतिहास समेटे हुए है। उन हवेलियों में की गई बारीक कारीगरी तो बस मन ही मोह लेती है और पहली ही नज़र में हैरान कर देती है। किले से बाहर निकले तो रावणहत्‍था पर फिल्‍मी गीतों की तान पीछे तक चली आईं। उस मधुर स्‍वर लहरी के बीच हम सड़क पर आए तो पाया कि सूर्यास्‍त में अभी देर है। सड़क पर हम जहां खड़े थे वहां से एक रास्‍ता बाईं ओर कुलधरा तक जाता था। समय हाथ में था तो हम भी कुलधरा की ओर हो लिए। अब जब यहां तक आ ही गए हैं तो कुलधरा से भी मिल लेते हैं। कुलधरा के किस्‍से तो हम सभी सुनते ही आए हैं। अगली पोस्‍टों में इन जगहों के बारे में विस्‍तार से बात करूंगा मगर यहां संक्षेप में बताता चलूं कि कुलधरा के बारे में लोगों का मानना है कि कुलधरा वो बदकिस्‍मत गांव है जहां के बाशिंदों यानि कि पालिवाल ब्राह्मणों को वहां के दीवान सालिम सिंह के जुल्‍मों से तंग आकर इसे रातों- रात खाली करना पड़ा था। और उन्‍होंने ही इस गांव को शाप दिया था कि जैसे हम अपने गांव और घरों में नहीं रह पा रहे हैं इसी तरह कोई भी यहां नहीं बस पाएगा। बस तभी से भुतहे किस्‍से और कहानियां कुलधरा को जब-तब हमारे सामने लेकर आते रहते हैं।

सूर्यास्‍त में अब मुश्किल से आधा घंटा बचा था। और आधे घंटे बाद हम सम के उन मनमोहक रेत के टीलों के ऊपर थे जहां से ढ़लते को सूरज को देखने के लिए देश और विदेशों के सैलानी पहले से मजमा लगाए बैठे थे। हमने थोड़ी देर ऊंटों की सवारी की और फिर दिन भर की थकान उतारने के लिए खुद को रेत के हवाले कर दिया। रेत जितनी जल्‍दी गर्म होती है उतनी ही जल्‍दी ठंडी भी। रेत में पैर धंसाए हम देर तक वहां बैठे रहे और सामने सूरज किसी सुनहरी तश्‍तरी की तरह रेत में उतरता हुआ दिखने लगा। ये नज़ारा अद्भुत था। दूर कहीं टैंटों से गीत-संगीत की आवाजें आने लगीं। वहां रात के उत्‍सव की तैयारियां जोर पकड़ रही थीं और उधर हमारी कार हमें वापिस जोधपुर ले जाने के लिए रेत के टीलों के उस पार हमारा इंतज़ार कर रही थी। बस, उन ढ़लती किरणों के बीच हम जैसलमेर को अलविदा कह कर तेजी से अपनी मंजिल की ओर बढ़ चले। जोधुपर-जैसलमेर की ये रोड ट्रिप मुझे ताउम्र याद रहेगी। आप अपनी अगली रोड ट्रिप पर कहां जा रहे हैं ?

रामदेवरा बाबा के मंदिर में दीनाराम भील के साथ...इनकी मूंछें कमाल की हैं. हैं कि नहीं ?


सोने सा चमकता ....सोनार किला

सम में रेत के धोरों पर ढ़लता सूरज



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Friday, 30 November 2018

Agrasen ki Baoli: An Interesting Heritage of Delhi

अग्रसेन की बावली
समय के साथ-साथ जब शहर विस्‍तार के लिए अपनी बाहें फैला रहे होते हैं तो उसी वक्‍़त उनकी पुरानी सीमाओं के भीतर भी उनका स्‍वरूप लगातार परिवर्तित होता रहता है. शहर बार-बार करवटें लेते हैं और यही वजह है कि कुछ बरसों बाद कुछ इलाकों को पहचान पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. बनने और बिगड़ने की इसी प्रकिया में तमाम विरासतें या तो जमींदोज हो जाती हैं या फिर जैसे-तैसे अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष करती नज़र आती हैं. दिल्‍ली तो यूं भी बार-बार बसाई और उजाड़ी गई. एक समय में दिल्‍ली की तमाम बावडि़यां जो बेहद खुले इलाकों में बनाई गई थीं आज उनके चारों तहफ शहर न केवल उग आया है बल्कि उन्‍हें अपनी बाहों में इतना कस के खड़ा है कि ये विरासतें खुल कर सांस भी नहीं ले पा रही हैं. ऐसी ही एक विरासत है अग्रसेन की बावली. बावली को हिंदी में बावड़ी, मराठी में बारव, गुजराती में वाव, कन्‍नड़ में कल्‍याणी या पुष्‍करणी कहा जाता है.

कस्‍तूरबा गांधी मार्ग के नजदीक हेली रोड पर मौजूद 14वीं सदी की इस बावली के लिए पिछले कुछ सालों में लोगों की दिलचस्‍पी और दीवानगी बढ़ती गई है. हो भी क्‍यों न ? "झूम बराबर झूम" फिल्‍म का गीत बोल न हल्‍के-हल्‍केतो सभी को याद होगा ही. गुलज़ार के गीत पर राहत फतेह अली खान और महालक्ष्‍मी अय्यर की आवाज ने एक जादुई माहौल रच डाला था और इस जादू को मुकम्‍मल बनाया चांदनी रात के आगोश में डूबी अग्रसेन की बावलीके दृश्‍यों ने. कुछ ऐसा ही तिलिस्‍म फिल्‍म पी.के.ने भी रचा. पीके यानी कि आमिर खान का ठिकाना थी ये बावली. बस फिर क्‍या था...यहीं से इस बावड़ी के प्रति लोगों की दिलचस्‍पी दीवानगी में बदल गई. जिन्‍हें इस विरासत की कोई जानकारी नहीं थी वे भी तस्‍वीरों और तफ़री की चाह में यहां तक आने लगे. अब आलम ये है कि साल के बारहों महीनों यहां आने वालों, खासतौर पर युवाओं का मजमा लगा रहता है.

केजी मार्ग से हेली रोड पर मुडते ही दाईं ओर हेली लेन है बस इसी पतली सी सड़क के दूसरे छोर पर छिपी है ये बावड़ी. मैं कई बार कस्‍तूरबा गांधी मार्ग से गुज़रा मगर इस बावड़ी का कोई अंदाजा नहीं था. उन लाल बलुआ अनगढ़ पत्‍थरों से बनी ये ऐतिहासिक बावड़ी अपने अतीत के गौरव को बखूबी बयान कर रही है. ये अपने आप में आश्‍चर्य की बात है कि बरसों तक इस इलाके में काम कर चुके अधिकांश लोग भी इस तक पहुंचने का ठीक रास्‍ता नहीं बता पाते हैं. बावली तक वही पहुंच पाते हैं जिन्‍हें वास्‍तव में बावली से मोह है. वरना बावली उन पतली गलियों में छुपी बैठी है. इस बावली में नीचे की ओर उतरते हुए तीन स्‍तर बने हुए हैं जिनमें हर स्‍तर पर बैठने के लिए स्‍थान बनाए गए हैं. यकीन मानिए बावड़ी का पानी बेशक सूख गया हो मगर आज भी तपती गरमी में इसकी निचली सीढि़यों पर बैठने के सुकून का कोई जवाब नहीं.

आज भले ही हमें बावडियां एक अनावश्‍यक चीज दिखाई देती हों मगर पुराने समय में लोगों को इनका महत्‍व पता था. इसलिए बड़े-बड़े राजा महाराजाओं ने अपनी जनता के लिए कुएं और बावडियों का निर्माण दिल खोल कर कराया. पाटन की रानी की वाव, अडालज और दादा हरी की वाव जैसी देश की तमाम बावडियां तो अपने कलात्‍मक सौंदर्य के लिए विश्‍व-विख्‍यात हैं. यही वजह है कि 100 रुपए के नए नोट के पीछे गुजरात के पाटन में स्थित रानी की वावको स्‍थान दिया गया है. उस समय बावड़ियाँ समाज के लोगों के मिलने का स्‍थान भी थीं. खासकर महिलाएं यहां बैठकर अपने दुख-सुख साझा किया करती थीं. इसी तरह देश के अन्‍य इलाकों में भी तमाम बावडियां अपने साथ अपने समय के समृद्ध सांस्‍कृतिक इतिहास की गवाही दे रही हैं. 

माना जाता है कि इस बावड़ी का निर्माण महाभारत काल में हुआ था और बाद में अग्रवाल समाज ने इसका जीर्णोद्धार कराया था. बावली की बनावट इसके तुग़लक (1321-1414) और लोदी काल (1451-1526) अर्थात 13 वीं से 16वीं शताब्‍दी के दौरान का होने की ओर इशारा करती है. 108 सीढि़यों वाली ये बावली उत्‍तर से दक्षिण तक 60 मीटर लंबी और 15 मीटर चौड़ी है. बावली के उत्‍तरी सिरे पर 7.8 मीटर व्‍यास वाला एक कुआ है जो पानी से भरने पर एक शाफ्ट से बावली को भी पानी से भर देता था. एक खास बात जो मैंने यहां महसूस की वो ये थी कि वावली में नीचे उतरने के लिए बनाई गई सीढ़ी में इस्‍तेमाल किए गए पत्‍थरों का आकार एक समान नहीं है और सीढि़यों की ऊंचाई आम तौर पर बनाई जाने वाली सीढियों की ऊंचाई से ज्‍यादा है. अब इसकी वजह एक ही हो सकती है कि उस वक्‍़त इस इलाके में रहने वाले लोग आमतौर पर लंबे कद के थे. अलबत्‍ता इस बारे में मुझे कहीं पढ़ने को नहीं मिला. बावली का पानी सूख चुका है मगर आज भी इसका अधिकांश हिस्‍सा पहले की तरह कायम है. एक वक्‍़त था जब यहां लोग तैराकी सीखने के लिए आया करते थे. मगर अब यह जगह दिल्‍ली की भुतहा जगहों में शुमार हो चुकी है. रात के वक्‍़त इस तरफ़ कम ही लोग आते हैं और बावली को लेकर तमाम तरह के किस्‍से कहानियां लोगों की जुबान पर हैं. कुछ लोगों का कहना है कि इस बावली में तमाम लोगों ने कूद कर अपनी जान दी हैं सो बावली में भूत या आत्‍माएं अन्‍य लोगों को इसमें कूदने के लिए आवाजें देते हैं. कुछ जगहें सुनी-सुनाई बातों के आधार पर भी बदनाम हो जाती हैं. क्‍योंकि बावली में आत्‍महत्‍या करने का अभी तक सिर्फ एक ही मामला प्रकाश में आया है.

बावली की पश्‍चिम दिशा में तीन प्रवेश द्वारों वाली एक मस्जिद है जो अब पूरी तरह से खंडहर हो चुकी है और वक्‍़त के थपेड़ों के आगे कितने दिन और टिक पाएगी कहना मुश्किल है. मैंने उस रोज इस मस्जिद की दीवारों को देखा तो आभास हुआ कि अपने निर्माण काल में ये छोटी सी मस्जिद बहुत खूबसूरत रही होगी. इसकी छत व्‍हेल मछली जैसी दिखाई पड़ती है और अंदर से इसकी आकृति किसी चैत्‍य की तरह लगती है. मुझे सबसे ज्‍यादा इसके खंबों पर पदक अलंकरण जैसी आकृतियों ने आकर्षित किया. उन पर क्‍या लिखा है ये तो मैं नहीं समझ पाया. ये बावली उग्रसेन की बावली है या अग्रसेन की बावली इस बात का भी कोई साफ़-साफ़ अंदाज़ा नहीं लग पाता है. बावली के बाहर लगे आधिकारिक पत्‍थर पर इसका नाम उग्रसेन की बावली खुदा हुआ है. जबकि राष्‍ट्रीय अभिलेखागार के रिकॉर्ड में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए नक्‍़शों में इसका नाम ऊजर सेन की बावली पाया गया है. इसी नक्‍़शे में अग्रसेन की बावली के नज़दीक ही उत्‍तर-पश्चिम में एक और बावली को दिखाया गया है मगर 1911 में भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्‍ली हो जाने और दिल्‍ली को नए सिरे से बसाए जाने के दौरान हुए निर्माण कार्यों में संभवत: यह बावड़ी गायब हो गई.

इस बावड़ी के साथ एक और दिलचस्‍प किस्‍सा जुड़ा हुआ है। आपने प्रसिद्ध फोटोग्राफर रघु राय का 1971 में खींचा गया वो ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फोटो Diving into Ugrasen Ki Baoli, a 14th century monumentअवश्‍य ही देखा होगा जिसमें बावड़ी ऊपर तक लबालब भरी हुई है और एक लड़का बावड़ी में छलांग लगा रहा है। लोकप्रिय लेखक सैम मिलर ने 2008 में प्रकाशित हुई अपनी किताब Delhi: Adventures in a Megacity में इस फोटो से जुड़े एक किस्‍से के बारे में लिखा है. दरअसल इस फोटो के खींचे जाने के 26 साल बाद जब वो इस बावड़ी के देखने के लिए आए तो इस पर ताला लगा हुआ था. और एक गार्ड ने आकर अनमने ढंग से इसे खोला. मिलर रघु राय के फोटो को हजारों बार देख चुके थे. सो जिज्ञासावश उन्‍होंने वही फोटो उस गार्ड को दिखा कर पूछा कि क्‍या उसने ये फोटो देखा है. गार्ड के जवाब ने मिलर को हैरान कर दिया. दरअसल रघु राय के फोटो में बावड़ी में छलांग लगाने वाला लड़का वो गार्ड बाग सिंह खुद ही था. सबूत के तौर पर बाग सिंह ने अपनी जेब से रघु राय का वही फोटो निकाल कर दिखा दिया जो किसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. अब मिलर ने आज के बाग सिंह का एक फोटो खींचा जो उनकी पुस्‍तक में प्रकाशित हुआ है. जैसा कि तस्‍वीर से साबित होता है कि 1970 तक बावली में खूब पानी हुआ करता था मगर बाद में इस इलाके में कंक्रीट का जंगल उग आने से पानी सूखता गया और बावली की हालत खराब होती गई. रघु राय के फोटो और आज के बावली के फोटो की तुलना से एक बात और साफ होती है कि 1970 के बाद पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने बावड़ी का बखूबी जीर्णोद्धार किया है. रघु राय के फोटो में टूटे और जर्जर हालत में नज़र आ रहे हिस्‍से अब अच्‍छी हालत में हैं.

ये मेरे लिए भी बहुत अजीब था कि मेरे बहुत नज़दीक‍ होने के बावजूद मुझे इस धरोहर तक पहुंचने में कई बरस लग गए. अक्‍सर ऐसा ही होता है. हम अपने आस-पास की चीजों को हमेशा हल्‍के में लेते हैं कि कभी भी देख आएंगे मगर ये कभी भीकभी नहीं आता है. या फिर बरसों बाद जब कभी मौका लगता है तो हम पाते हैं कि वहां चीजें अब वैसी नहीं रह गई हैं जैसी बरसों पहले हुआ करती थीं. आज के शिमला, मनाली और मूसरी जैसे शहर आज से महज 10-15 बरस पहले ऐसे नहीं थे. कुछ ऐसा ही हमारी विरासतों के साथ भी होता है. सदियों पुरानी ये विरासतें हर गुज़रते दिन के साथ ढ़ल रही हैं. हर रोज़ उनकी उम्र घट रही है. तमाम संरक्षण के प्रयासों के बावजूद हम लंबे वक्‍़त तक इन सबकों बचा कर नहीं रख पाएंगे. एक और बात है जब लोग अपनी विरासतों के प्रति उदासीन हो जाते है और इन्‍हें देखने नहीं जाते हैं तो सरकारें और प्रशासन भी इनके रख-रखाव में दिलचस्‍पी नहीं लेते हैं. तमाम विरासतों के आस-पास चरसिए और गंजेडियों के अड्डों को जमते हम सभी ने देखा है. इस सबके लिए हम लोग भी जिम्‍मेदार हैं. हम अपने बच्‍चों से अपनी विरासतों के बारे में शायद ही कभी बात करते हैं या उन्‍हें वहां घुमाने ले जाते हैं. इसलिए यदि हमें अपनी विरासतों से मुहब्‍बत है तो जितना जल्‍दी हो सके इन्‍हें देख आना चाहिए. कौन जाने आज से 10-15 बरस बाद ये मिट्टी में मिल चुकी हों.

समय: सुबह 7 से शाम 6 बजे तक
प्रवेश : नि:शुल्‍क
जंतर मंतर : 1.5 किलोमीटर
इंडिया गेट: 2 किलोमीटर











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