यायावरी yayavaree

Friday, 8 June 2018

सुबह-ए-चार मीनार: A morning with Char Minar-2


सुबह-ए-चार मीनार

दूसरी किस्‍त

दोस्‍तो पिछली किस्‍त में आपने सुबह चार मीनार की यात्रा पर निकलने, ऑपरेशन पोलो की बदौलत हैदराबाद के भारत का अभिन्‍न अंग बनने की कहानी,  हैदराबाद के भाग्‍यनगर से हैदराबाद बनने का किस्‍सा, चार मीनार के बनने की वजह, आसफ़़ जाही सल्‍तनत की सात पुश्‍तों की कहानी, चार मीनार इलाके की सुबह का आलम और लाड बाज़ार में चूडियों की रौनक के बारे में पढ़ा. अब आगे...

नीमराह बेकरी के बिस्‍कुट और चाय 
सुबह होटल से बिना कुछ खाए पिए निकल आने के बाद अब तक चाय की तलब हो उठी थी. सुबह की चाय के अनुभव को और ज्‍यादा यादगार बनाने के लिए मेरी मेजबान मित्र ने इसका ठिकाना पहले से सोच रखा था. कुछ ही देर में हम चार मीनार से चंद कदम के फ़ासले पर नीमराह बेकरी में थे. यहां बेकरी के ताजा बिस्‍कुटों के साथ ईरानी चाय का अपना अलग मज़ा है. चाय की चु‍स्कियों के साथ बेकरी के मालिक अहमद से थोड़ी गुफ्तगू हुई तो उन्‍होंने बताया कि उनके पुरखे ईरान से यहां आए थे और ये दुकान बहुत पुरानी है. अहमद ने हमें दर्जनों तरह के बिस्‍कुट दिखाए जिनमें से कोई सात-आठ किस्‍म के बिस्‍कुटों को हमने चखा. इनमें चांद बिस्‍कुट, उस्‍मानिया बिस्‍कुट, चोको बार, पिस्‍ता, काजू, स्‍टार काजू, ड्राई फ्रूट, ओट्स, डायमंड, रस्‍क केक शुमार थे. यहां बेहतरीन ब्रेड, बन और केक भी चखे जा सकते हैं. चाय के भी अपने किस्‍से हैं. यहां एक चाय है पौना’. है न दिलचस्‍प नाम? जहां आम चाय 12 रुपए की है वहीं पौना 15 रुपए की. वैसे मामला सिर्फ इतना सा है कि इस चाय में दूध ज्‍यादा होता है. ये ज्‍यादा दूध वाली चाय के भी देश में अलग अलग नाम हैं. मैं जब लुधियाना में पोस्‍टेड था तो दफ़्तर में एक तो होती थी चाय और एक होती थी मिल्‍क टी. निखालिस खड़े दूध की चाय. अब एक चाय से मेरा क्‍या काम बनता...सो एक कप और पी गई. मैं यहां से घर के लिए कुछ लिए बिना ही निकल आया. मगर ये अफ़सोस शाम तक दूर हो गया. एयरपोर्ट के लिए निकलते वक्‍़त कराची बेकरी मिल गई. अब कराची बेकरी की तारीफ़ में क्‍या शब्‍दों को जाया करना. एक से एक बेहतरीन बिस्‍कुट और कुकीज यहां मौजूद हैं. मुझे यहां का फ्रूट बिस्‍कुट बेहद पसंद है. आपको कहीं दिख जाए तो चूकिएगा मत. और दिल्‍ली से हों तो एक डिब्‍बा मेरे लिए भी लेते आइएगा.
ग़ज़ब हैदराबादी लहज़े में  नीमराह बेकरी के अहमद भाई 

चार मीनार का तसव्‍वुर और ईरानी चाय 
खैर, चाय की चुस्कियों के बाद नीमराह बेकरी से बाहर निकले तो देखा कि चार मीनार के चारों तरफ फर्श पर टाइलें बिछाने का काम जोरों पर चल रहा है. कुछ दिनों पहले भी मैंने अंग्रेज़ी अखबार द हिन्‍दू में एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि इस चार मीनार के आस-पास चल रहे काम में जमीन से कुछ फुट नीचे पानी की पाइपें बिछाई जा रही हैं जिससे सीपेज की स्थिति में इमारत के ढ़ाचे को नुकसान पहुंचने की संभावना है. पुरातत्‍व विभाग ने खूब हो हल्‍ला किया मगर शायद इसे अनसुना कर दिया गया है. ईश्‍वर विभागों को सद्बुद्धि दे. साथ ही चार मीनार के आस-पास के पूरे इलाके को टाइलों से पाटने वालों को यहां कुछ पेड़ लगाने के बारे में भी सोचना चाहिए था. अब तक नहीं सोचा तो अब सोच लें. किसी भी ऐसी परियोजना में ग्रीन बेल्‍ट अनिवार्य हिस्‍सा होनी चाहिए. पर होता यही है कि पहले बिना ज्‍यादा सोचे-विचारे निर्माण कार्य किया जाता है फिर किसी रोज नींद खुलने पर उस निर्माण को उधेड़ कर फिर कुछ नया किया जाता है. पहले कुआ खोदो फिर कुआ भरो. यही नियती है देश की.

मक्‍का मस्जिद 
इसके बाद हमने कुछ कदम दूर मौजूद मक्‍का मस्जिद का रुख़ किया. ये हैदराबाद की सबसे पुरानी और देश की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है. ये इत्‍तेफ़ाक़ ही था कि कोई हफ़्ता भर पहले ये मस्जिद एक बार फिर सुर्खियों में थी. दरअसल यहां 18 मई, 2007 को हुए एक बंब धमाके में दर्जन भर लोग मारे गए और लगभग 60 लोग जख्‍़मी हुए थे. अब हैदराबाद में ही एनआईए की अदालत ने इस मामले के पांचों आरोपियों को रिहा कर दिया है जिनमें स्‍वामी असीमानंद भी शामिल हैं. इसी मामले के बाद से बरसों तक देश में हिंदुत्‍व आतंकवाद की थ्‍योरी पर बहसें होती रही हैं. मगर एनआईए अदालत ने सबको चौंकाते हुए सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को रिहा कर दिया है. पूरे देश में खलबली है और इसीलिए इन दिनों मक्‍का मस्जिद के आस-पास सुरक्षा बढ़ा दी गई है. 

दरअसल इस मस्जिद का निर्माण कुतुब शाही सल्‍तनत के पांचवे शासक मुहम्‍मद कुली कुतुब शाह ने मक्‍का की मिट्टी से ईंटें बनवा कर किया. इसीलिए इसका नाम मक्‍का मस्जि़द रखा गया. इसका सामने का तीन मेहराबों वाला हिस्‍सा ग्रेनाइट के अकेले बड़े पत्‍थर से बनाया गया है. कहते हैं इसे बनाने में 500-600 कारीगरों को पांच साल का वक्‍़त लगा. यहां आसफ़ जाही शासकों की क़ब्रों सहित निज़ाम और उनके परिवार के लोगों के मक़बरे भी मौजूद हैं. मुख्‍य मस्जिद परिसर 75 फुट ऊंचा है और इसकी तरफ पांच-पांच मेहराबों वाली दीवारें हैं और चौथी दीवार मिहराब यानि कि किबला (मक्‍का में काबा की दिशा) की दिशा बताती है. इस मस्जिद में एक बार में 10,000 से ज्‍यादा लोग नमाज़ अदा कर सकते हैं. रमजान के दिनों में चार-मीनार के भीतर और बाहर का नज़ारा देखने लायक होता है. हजारों लोग अंदर और बाहर सड़क पर एक साथ नमाज़ अदा करते हैं. और हां, यहां के बाजारों में इफ्तार की दावत की रौनक भी देखने लायक है. उस रोज मेरे पास ज्‍यादा वक्‍़त नहीं था सो अंदर तक जाकर नहीं देख पाया. लकिन मुख्‍य द्वार से प्रवेश करने के बाद वहां दाना चुग रहे कबूतरों के पास कुछ वक्‍़त ज़रूर बिताया. यहां छोटे बच्‍चों को दाना खिलाते देखना बड़ा सुकून भरा अनुभव था. डॉक्‍टर लोग कहते हैं कि कबूतरों को दाना खिलाना एक तरह से थैरेपी का काम करता है. एक तरह की मेडीटेशन भी है. आप करके देखिए...मज़ा आएगा. कभी-कभी कबूतरों के झुंड में से आप एक कबूतर की आरे ध्‍यान करके दाना डालते हैं. मगर बाकी कबूतर दानों पर झपट्टा मारते हैं और वो शरीफ़ज़ादा पीछे हट जाता है. आप फिर कोशिश करते हैं कि पगले खा ले. इस खेल में आप कब कबूतरों में गुम हो जाते हैं पता ही नहीं चलता.

मक्‍का मस्जिद से निकल कर एक बार फिर हम चार मीनार की तरफ लौट पड़े. लाड़ बाजार अभी भी सोया हुआ था सो हम इस बाज़ार से जुड़ी संकरी गलियों में ज़ारदोज़ी के कारीगरों का हुनर देखने के लिए जा पहुंचे. ज़ारदोज़ी जानते हें न? ये कला खासतौर पर ईरान, तुर्की, सेंट्रल एशिया के देशों में प्रचलित है जिसमें ज़ार का मतलब है सोना और दोज़ी का मतलब है काम. ये थोड़ा मंहगा काम है इसलिए हिंदुस्‍तान में इसके पहले कद्रदान शाही परिवार, राजे-रज़वाड़े बने. इसमें सोने या चांदी के तारों के साथ नगों का काम होता है मगर अब आम लोगों के बीच इस कला की मांग बढ़ने के साथ ही कारगीर तांबे के तारों पर सोने या चांदी की पॉलिश के साथ ये काम करने लगे हैं. प्रिंस मार्केट की ऐसी ही एक दुकान में हमने एक कारीगर से बातचीत की तो उसने बताया कि यहां हैदराबाद में ज़री के काम की बहुत मांग है और उसके ग्राहक वाट्सएप के जरिए ही काम भेज रहे हैं. हिंदुस्‍तान में पारसी और खासकर मुस्लिम परिवारों में जारदोज़ी के काम की बहुत मांग है. नोटबंदी की मार यहां के धंधे पर खूब पड़ी मगर अब काम पटरी पर आने लगा है. इस दुकान से निकल कर गली में आए तो देखा कि गली मक्‍का मस्जिद के एकदम पीछे जाकर खुलती है. वही किबला वाली दीवार के पीछे. यहां आसिफ़ा के लिए न्‍याय के बैनर हवा में झूल रहे हैं. आसिफ़ा के लिए तो पूरा देश ही न्‍याय चाहता है. अभी ज्‍यादा दुकानें नहीं खुली थीं सो यहां से लौटना पड़ा.

कोई नृप होऊ....हमें तो ज़ारदोज़ी का काम भला
इस इलाके को खंगालते हुए काफी देर हो चुकी थी और अकेली चाय भला बैटरी को कितनी देर तक चार्ज रख सकती थी. ये मेरी किस्‍मत थी कि मेजबान मित्र ऊषा जी एक उम्‍दा फूड ब्‍लॉगर भी हैं सो यहां की गलियों में छिपे नायाब जायकों की थाह रखती थीं. इनके काम को आप इंस्‍टाग्राम पर @travelkarmas या फिर @foodkarma_ पर देख सकते हैं. अब एक बार फिर मेरा सामना एक नए अनुभव से होने जा रहा था. ये था गाविंद भाई का डोसा कॉर्नर. गोविंद कहने को तो रेहडी पर अपना ठिया जमाए हुए हैं मगर उनके जायके के तलबगार दूर-दूर से यहां आते हैं. आएं भी क्‍यों न. यहां डोसा और इडली बनाने का तरीका जो एकदम अलग है. मैंने इतना स्‍वाद भरा डोसा और इडली शायद ही कहीं और खाई हो. ये कहते हुए बता दूं कि दुनिया की सबसे बेहतरीन इडली श्रीमती जी घर पर बनाती हैं. सो गोविंद भाई की इडली दूसरे नंबर पर ही आएगी. हां, गोविंद भाई का डोसा जरूर नंबर 1 है. मगर उसमें जमकर प्रयोग किए गए मक्‍खन को पचाने के लिए शरीर को थोड़ी ज्‍यादा मशक्‍कत की जरूरत होगी. गोविंद अब धीरे-धीरे ब्रांड बनते जा रहे हैं इसीलिए खुद और उनके ठेले पर काम करने वाले लड़के गोविंद डोसालिखी नारंगी टी-शर्ट पहने हुए थे. यहीं आस-पास ऐसे ही एक ठिए पर डोसा बेचने वाले साहब तो इतना कमाते हैं कि मर्सीडीज़ रखे हुए हैं.

तेल रोक के ...मक्‍खन ठोक के...गोविंद भाई का डोसा 
घड़ी में सवा दस बज चुके थे और अब तक पूरा चार-मीनार का इलाका लोगों की आवाजाही से आबाद हो चुका था. इधर पेट फुल हो चुका था और अभी चौमहल्‍ला पैलेस और सालार जंग म्‍यूजियम भी देखने बाकी था. उधर कुछ और मित्रों से चार-मीनार पर मुलाक़ात का वक्‍़त तय था सो मेजबान मित्र से विदा लेकर मैं एक बार फिर चार-मीनार की ओर चल पड़ा.

अब तक चार-मीनार के आस-पास सैकड़ों छोटी-छोटी दुकानें ऐसे उग आईं थी जैसे वो अभी-अभी जमीन से बाहर निकल आई हों. फल, पूजा-पाठ की सामग्री, सजावटी सामाज और खासकर चूडियां ही चूडियां चारों तरफ़. मित्रों के साथ मिलकर एक बार फिर चूडियां खरीदी गईं. अब तक चार-मीनार की पहली मंजिल के लिए एंट्री खुल चुकी थी. सो इसकी पहली मंजिल पर चढ़कर आस-पास के इलाके को देखने की तमन्‍ना भी पूरी करनी थी...सो वही किया. यक़ीनन यहां से आस-पास का नज़ारा बेहद खूबसूरत दिखता है. चूंकि ये इमारत अब पुरातत्‍व विभाग की देख-रेख में है इसलिए ये सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक ही उपलब्‍ध है. रात के वक्‍़त रौशनियों में नहाए चार-मीनार का जलवा अलग ही होता है. इ‍सलिए कभी हैदाराबाद आएं तो एक बार रात में जरूर इस इलाके को देखें. इस यात्रा में तो मुझे ये मौक़ा नसीब नहीं हुआ मगर अगली बार शाम-ए-चार मीनार देखने जरूर आउंगा.
इफ़्तार और चार मीनार             Pic Courtesy : @denny_simon 
हैदराबाद पहली मुलाक़ात में ही दिल में उतर गया है. शायद यहां की एतिहासिक विरासतों, यहां के मोतियों, यहां की स्‍ट्रीट आर्ट, शानदार आईटीसी काकातिया, हैदराबाद में मेरे साथ रहे ड्राइवर इस्‍माइल भाई, की वजह से था...और सबसे बड़ी वजह थीं ऊषा  जी. जिन्‍होंने दिल से अपना शहर दिखाया. शायद उन्‍हीं की वजह से यात्रा के आखि़री पड़ाव पर लगने लगा था कि कोई अपना इस शहर में है सो ये शहर भी अपना सा ही है. तुमसे फिर जल्‍दी मिलूंगा मेरे दोस्‍त हैदराबाद 😊  

आपको कैसी लगी चार मीनार की ये सुबह, मुझे जरूर बताइएगा. 
  
कुछ और तस्‍वीरें सुबह-ए-चार मीनार से ...







कराची बेकरी के स्‍वाद भरे फ्रूट बिस्‍कुट

दुकानें अभी सोई हुई हैं...
ज़ारदोज़ी
पिन कोड 500002.... बोले तो चार मीनार 
मैं और ट्रेवल कर्मा ...ऊषा जी

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Thursday, 7 June 2018

सुबह-ए-चार मीनार : A morning with Char Minar -1


सुबह-ए-चार मीनार
पहली किस्‍त

कहते हैं किसी शहर को ठीक से समझना हो तो उसके साथ नींद से जागो, उसे महसूस करने के लिए उसके साथ ही सुबह की ताज़ा हवा में सांस लो. वरना दिन चढ़ने के साथ ही शहर बहरूपिया हो जाता है. ये देखना बेहद दिलचस्‍प होता है कि एक अलसाया हुआ, देर तक करवटें बदलता हुआ 400 साल पुराना शहर जब उठता है तो अपने बिस्‍तर की सिलवटें कैसे हटाता है? सुबह के उन कुछ घंटों में शहर जैसे रात की खामोशी के शून्‍य से बाहर निकल कर एक बार फिर बहुत तेजी से खिल जाना चाहता है. यही वो वक्‍़त है जब आप शहर की सही नब्‍ज़ को टटोल सकते हैं. यूं तो ये बात हर शहर पर लागू होती है मगर बात हैदराबाद और वो भी पुराने हैदराबाद के चार मीनार इलाके की हो तो और भी ज्‍यादा सटीक बैठती है।
अप्रैल की उस एक सुबह चार-मीनार दिखाने की जिम्‍मेदारी ब्‍लॉगर मित्र @travelkarmas ने ले ली. इससे बेहतर क्‍या हो सकता था कि एक हैदराबादी की नज़र से उसका शहर देख सकूं. तय हो गया था कि चार-मीनार इलाके का दौरा सुबह-सुबह किया जाएगा. हैदराबाद की यात्रा के दौरान मेरा ठिकाना बेगमपेट इलाके में होटल आईटीसी, काकातिया था. ये हैदराबाद में आखिरी दिन था और सुबह होटल से निकलते-निकलते 7 बज गए. खैर, अभी भी वक्‍़त था. हमने चार-मीनार जाने के लिए सिकंदराबाद की ओर से चार-मीनार की तरफ़ जाने का रास्‍ता चुना. इस तरह हम हुसैन सागर लेक की परिक्रमा कर रहे थे. सिकंदराबाद और हैदराबाद थे तो दो अलग-अलग शहर मगर दोनों एक साथ मिलकर अब एक महानगर का अहसास कराते हैं. विकास कुछ इस तरह हुआ है कि अब इस महानगर को मोतियों का शहर, नवाबों का शहर, बिरयानी का शहर या साइबराबाद के नाम से भी जाना जाता है. शहर के तमाम इलाकों की सूरत और सीरत दोनों ही लखनऊ से बहुत मिलते हैं. किसी अनजान शख्‍़स को यदि आंख बंद कर शहर के बीचों-बीच छोड़ दिया जाए तो उसे लखनऊ में होने का मुग़ालता हो सकता है. हम धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ रहे थे और रास्‍ते में हैदराबाद के पुराने इलाके एक-एक कर अपने किस्‍से कहने के लिए आंखों के आते रहे. हम हैदराबाद में सरदार पटेल मार्ग देखकर चौंके कि सरदार पटेल की कर्मभूमि तो आम-तौर पर गुजरात और उत्‍तर भारत ही रही है फिर हैदराबाद में सरदार पटेल मार्ग क्‍यों? जवाब जानने की बेचैनी में चलती गाड़ी में ही इस सवाल के उत्‍तर के लिए गूगल बाबा को खंगाल डाला और जो जवाब मिला वो बेहद दिलचस्‍प था.

हैदराबाद का नक्‍शा Pic: Madras Courier  
दरअसल हुआ यूं कि भारत की आज़ादी के समय लॉर्ड मांउटबेटन ने भारत की 565 रियासतों को भारत या पाकिस्‍तान के साथ जुड़ने का विकल्‍प दिया और उनमें से ज्‍यादातर बिना किसी ज्‍यादा हील-हुज्‍ज़त के अपने मुस्‍तक़बिल का फैसला इधर या उधर होकर कर रहे थे. मगर हैदराबाद के आखिरी निज़ाम उस्‍मान अली खान के मन में कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी. वो ना तो हिंदुस्‍तान के साथ आना चाहता था और ना ही पाकिस्‍तान के साथ. ये बात सभी जानते हैं कि निज़ाम के राज में हैदराबाद एक दौलतमंद राज्‍य था जिसमें उसकी अपनी फौज़, अपना हैदराबादी रुपया चलता था और निज़ाम दुनिया का सबसे अमीर आदमी था. फैसला लेने के लिए और वक्‍़त के नाम पर निज़ाम एक साल तक मामले को लटकाता रहा. उस समय के गृह मंत्री सरदार पटेल निज़ाम के मंसूबों को भांप चुके थे. ये जाहिर हो चुका था कि निज़ाम के ख्‍़वाब ओस्‍मानिस्‍तान नाम का अलग देश बनाने के हैं और उसकी नज़दीकी और हमदर्दी पाकिस्‍तान के साथ है. यही नहीं राजाकारों के रूप में वहां कट्टर इस्‍लामी ताकतें भी अपना सिर उठा रही थीं. हिंदुस्‍तान के बीचों-बीच एक कट्टर इस्‍लामी देश भला कैसे बनने दिया जा सकता था. बस अब सरदार पटेल का धैर्य जवाब दे गया और हैदराबाद के भारत में विलय के लिए फौज़ को हैदराबाद को कब्‍जे में लेने का आदेश दे दिया गया. ऑपरेशन का कोड नेम था ऑपरेशन पोलो  और 13 सितंबर, 1948 को भारतीय फौज़ ने हैदराबाद में प्रवेश किया. निज़ाम टेढ़ी खीर था सो हैदराबादी फौज़ और राजाकारों के साथ भारतीय फौज़ से टक्‍क्‍र ली. मगर 100 घंटों तक चली जंग के बाद निज़ाम ने हथियार डाल दिए और रेडियो पर आकर सीज़फायर की गुहार लगाई और कुछ दिनों बाद पटेल से मुलाक़ात में निज़ाम ने भारतीय संघ सरकार के साथ पूरी वफ़ादारी निभाने का वायदा किया. इस तरह हैदराबाद हिंदुस्‍तान का हिस्‍सा बना.
सरदार पटेल के सामने सरेंडर करते हुए आखिरी निज़ाम      Pic Courtesy: Quora.com 
निज़ाम की हेकड़ी के किस्‍से जितने दिलचस्‍प हैं उतने ही उसकी रईसी और निज़ामत के दौर के. कुछ और इलाकों से गुज़रते हुए हम आखिरकार चार मीनार इलाके में आ पहुंचे. चारों तरफ बाज़ार ही बाज़ार. अब ये जानना भी एक दिलचस्‍प बात थी कि इस भरे-पूरे बाज़ार के अधिकांश हिस्‍से निज़ाम के समय से चले आ रहे हैं और निज़ाम ने अपने लोगों को ये दुकानें मुहैया कराई थीं. अभी सुबह का वक्‍़त था सो पूरा बाज़ार बंद था बस जहां-तहां पटरी पर अपना कारोबार करने वाले लोग अपना ठिया जमाने में लगे थे. बस कोई दो घंटे बाद ही इस जगह को भीड़ से भर जाना था. गाड़ी किनारे लगा हमने चार-मीनार का रुख़ किया. चार मीनार के बनने की कहानी को समझने के लिए हमें इतिहास में थोड़ा और पीछे जाना होगा. 

दरअसल 1463 में कुली कुतुब-उल-मुल्‍क ने आज के हैदराबाद के पश्चिम में 8 किलोमीटर दूर गोलकोंडा किले का निर्माण किया और तेलंगाना क्षेत्र के विद्रोह को दबा दिया. नतीज़तन मुग़लिया सल्‍तनत द्वारा उसे इस क्षेत्र का सूबेदार या प्रशासक बना दिया गया. मगर, 1518 तक वह बहमनी सल्‍तनत से स्‍वतंत्र हो गया और खुद को सुल्‍तान घोषित कर दिया और कुली कुतुब शाह के नाम पर कुतुब शाही सल्‍तनत की नींव रख दी. गोलकोंडा में पानी की बहुत कमी थी इसलिए 1589 में कुली कुतुब शाह के पोते मुहम्‍मद कुली कुतुब शाह ने अपनी राजधानी को गोलकोंडा से आज के हैदाराबाद स्‍थानांतरित करने का फैसला लिया. फिर 1591 में चार मीनार का निर्माण शुरू हुआ. कहते हैं कि चार मीनार दरअसल ख़ुदा का शुक्रिया अदा करने के लिए बनवाई गई थी. गोलकोंडा में पानी की कमी से हैजा फैल गया था और हजारों लोग मारे गए थे. इस दौरान मुहम्‍मद कुली कुतुब शाह हैदराबाद में एक जगह पर इस महामारी को रोकने के लिए रोज अल्‍लाह से प्रार्थना करता रहा और जल्‍दी ही अल्‍लाह ने उसकी प्रार्थना सुन भी ली. जिस जगह मुहम्‍मद कुली कुतुब शाह प्रार्थना करता था ठीक उसी जगह उसने ख़ुदा का शुक्रिया अदा करने के तौर पर इस मीनार का निर्माण करवाया. इस तरह चारमीनार हैदराबाद की पहली इमारत थी. कुछ ऐसा ही दिलचस्‍प किस्‍सा हैदराबाद शहर के नामकरण का भी है. माना जाता है कि हैदराबाद शहर का नाम मुहम्‍मद कुली कुतुब शाह और स्‍थानीय तेलगु वेश्‍या भागमती के इश्‍क से पैदा हुआ. हुआ यूं कि शाह ने भागमती के नाम पर शहर का नाम भाग्‍यनगर कर दिया. बाद में भागमती ने इस्‍लाम अपना लिया और अब उसका नाम हैदर महल हो गया. अब एक बार फिर शाह ने शहर का नाम बदलकर हैदराबादकर दिया. हालांकि इतिहासकारों में इस किस्‍से की सत्‍यता को लेकर मतभेद है.

और जैसा कि इतिहास में हमेशा होता रहा है, कोई एक सल्‍तनत हमेशा के लिए नहीं होती. कुतुब शाही सल्‍तनत भी 1687 में मुगल बादशाह औरंगज़ेब द्वारा हैदराबाद पर कब्‍जा करने के साथ ही ख़त्‍म हो गई. औरंगजेब ने अपने अपने गवर्नर को इस इलाके का शासक नियुक्‍त कर दिया और उसे निज़ाम-उल-मुल्‍क का नाम दिया. मुग़लिया सल्‍तनत भी कौन सी हमेशा के लिए ताक़तवर रहने वाली थी. 1734 में कमज़ोर होती मुग़लिया सल्‍तनत से निज़ाम आसफ़ जाह ने आज़ादी हासिल कर ली. कहते हैं कि एक बार किसी शिकार अभियान पर निज़ाम को एक संत मिले जिन्‍होंने निज़ाम को कुलचे दिए और कहा कि जितने खा सकते हों खा लें. निज़ाम केवल 7 खा पाए. तब संत ने भविष्‍यवाणी की कि उसकी सल्‍तनत 7 पीढियों तक चलेगी. हुआ भी बिल्‍कुल ऐसा ही. निज़ाम की सात पीढियों ने हैदराबाद पर राज किया. संत की इसी बात के सम्‍मान में निज़ामों के झंडों में कुलचे देखे जा सकते हैं. फिर 1763 में मराठाओं से हारकर और मैसूर के शासक टीपू सुल्‍तान के डर से हैदराबाद ने अंग्रेजों के साथ संधी कर प्रिंसली स्‍टेट का दर्जा हासिल कर लिया. अब हुकूमत अंग्रेजों के अधीन थी. इस तरह आज तक शहर का नाम हैदराबाद चला आ रहा है. शहर को ग्रिड प्‍लान पर बसाया भी बड़े सलीक से गया था. इसीलिए फ्रेंच ट्रेवलर जीन-बैप्‍टाइज़ टैवर्निअर ने हैदराबाद की तुलना ओरलिअंस से की थी. और बाद में हैदराबाद के चार मीनार की तुलना पेरिस के आर्क डि ट्रायम्‍फ से की गई और इसे आर्क डि ट्रायम्‍फ ऑफ ईस्‍ट के नाम से भी जाना गया.

तो उस रोज मैं आर्क डि ट्रायम्‍फ ऑफ ईस्‍ट यानि कि चार मीनार के ठीक सामने खड़ा था. इस इमारत को देखने की ख्‍वाहिश बरसों से थी. जब भी इसका जि़क्र हुआ आस-पास के लोगों ने इस इलाके को भीड-भड़क्‍के वाला और चार मीनार को सिर्फ चार खंभों की इमारत कहकर इसे तवज्‍़जो नहीं दी. मगर मुझे ऐसी विरासतें हमेशा से अपनी ओर खींचती रही हैं क्‍योंकि वे एक लंबे इतिहास के जीते-जागते गवाह के रूप में हमारे शहरों के बीचों-बीच खड़ी हैं. चार मीनार हैदराबाद शहर के बीचों-बीच बनाई गई एक चौकोर इमारत है जिसकी हर साइड 20 मीटर है और बड़े मेहराब चार अलग-अलग रास्‍तों की ओर खुलते हैं. इसके चारों कौनों पर चार मीनारें हैं जो 56 मीटर उँची हैं जिनके ऊपर छोटे छोटे गुंबद हैं. इन मीनारों के भीतर ऊपर चढ़ने के लिए सीढि़यां हैं. इन दिनों पर्यटक केवल पहली मंजिल तक ही जा सकते हैं. बाहरी दीवारों पर सुंदर नक्‍काशी आकर्षित करती है. अन्‍य खास इस्‍लामी इमारतों से अलग इसकी मीनारें मुख्‍य ढ़ांचे के अंदर ही बनी हैं. मीनार मेंं 149 सीढियां हैं. ये इमारत भारतीय-इस्‍लामी वास्‍तुकला का अनुपम उदाहरण है जिस पर पर्शियन प्रभाव भी साफ-साफ देखा जा सकता है. जहां मेहराब और गुंबद इस्‍लामी प्रभाव को दर्शाते हैं वहीं मीनारें पर्शियन कला से प्रेरित हैं. छतों में फूलों की आकृतियां, झरोखे और बाहरी दीवारों पर हिंदू प्रभाव देखे जा सकते हैं.

तो साहब, सुबह के ठीक साढ़े सात बज चुके थे और चार-मीनार के आस-पास हलचल आहिस्‍ता-आहिस्‍ता बढ़ चली थी. हांलाकि अभी ज्‍यादा लोग यहां नहीं थे फिर भी अकेले चार मीनार को कैमरे में कैद करने के लिए बहुत जद्दोज़हद करनी पड़ रही थी. हमें पास ही पहली मंजिल पर एक दुकान तक जाती सीढि़यां नज़र पड़ीं. यहां से पूरा चार-मीनार कै़द किया जा सकता था. मग़र हवा में लटकती तारों का ताम-झाम यहां भी तस्‍वीर के मिजाज़ को बिगाड़ रहा था. इस वक्‍़त मैं अपने दो कैमरों के साथ- साथ @travelkarma के मिरर लैस सोनी कैमरे पर भी हाथ आजमा रहा था. अच्‍छा कैमरा है. गरमियों के दिनों में हैदराबाद का आसमान आग उगलता है मग़र सुबह के इस वक्‍़त में थोड़ी मासूमियत अभी भी बाकी थी. मैं अलग-अलग कैमरों से तस्‍वीरें लेता रहा. इसी दौरान चार मीनार के चारों ओर दुकानें जैसे नींद से जागने लगी थीं.

चार-मीनार से लगता हुआ लाड बाजार चूडियों पर नायाब कारीगरी के हजारों तरीकों के साथ ग्राहकों को लुभाता है. और दाम...बस वो मत पूछिए....जी करता है कि पूरा बाज़ार खरीद लें. एक चूड़़ी बेचने वाले बुजुर्ग ने अपनी ओर बुलाया तो उधर ही जा खड़ा हुआ. वो रंग-बिरंगी चूडियां मन मोह रही थीं सो आधा दर्जन खरीद लीं. हां, मोल-भाव यहां भी है तो साहब जितना दाम बताया जाए...मोलभाव के लिहाज़ से सीधा आधा कर दें और फिर बात पौने पर तय कर सौदा पक्‍का कर लें. चार-मीनार के आस-पास बरसातियों के नीचे आबाद होने वाली चूडि़यों की सैकड़ों अस्‍थाई दुकानें हैं जहां 75 रुपए से लेकर सौ-सवा सौ में हाथ के सुंदर कड़े और चूडि़यों के सैट मिल सकते हैं. इनमें थोड़ी और बेहतर क्‍वालिटी और सफाई का काम चाहिए तो लाड़-बाजार की दु‍कानों का जायजा लें. चूडियों से निपट लें तो लाड बाजार और मोती चौक के बीच परफ्यूम मार्केट से इत्र की एकाध शीशी लेना न भूलें. इस बाजार में कुछ दुकानें तो सैकड़ों साल पुरानी हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी यूं ही चली आ रही हैं.




तब तक कुछ और तस्‍वीरें चार-मीनार से

और हां, जाने से पहले बताते जाइएगा कि पोस्‍ट कैसी लगी :)  

चार मीनार के पास चूडियां  

 

अल सुबह बाज़ार बस खुलने से कुछ वक्‍़त पहले 

चलो शुरू करें जिंदगी का एक और दिन 
चलो जम गई दुकान...आपको क्‍या चाहिए साहिबान 

कुछ ऐसी खामोशी से उठता है शहर 

पहली मंजिल से गुंबद का भीतरी भाग

गुंबद के भीतर छत में भारतीय वास्‍तुकला की छाप 


गुंबद का भीतरी भाग

पहली मंजिल की ओर ले जाने वाली सीढियां 


चार मीनार की पहली मंजिल से मक्‍का मस्जिद का विंहगम दृश्‍य

चलो चलें काम पर


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Thursday, 31 May 2018

Tomb of Balban: An Ignored Heritage



बलबन का मक़बरा
कुछ दिनों पहले जब दिल्‍ली के महरौली आर्कियोलोजिकल पार्क में गयासुद्दीन बलबन की बदहाल कब्र को देखा तो किसी का कहा गया एक शेर याद हो आया
मौत ने ज़माने को ये समा दिखा डाला कैसे कैसे रुस्तम को खाक में मिला डाला,
याद रख सिकन्दर के हौसले तो आली थे जब गया था दुनिया से दोनों  हाथ खाली थे
अब चाहे सिकंदर हो या कोई और सुल्‍तान सभी को एक दिन खाक में मिलना पड़ा. मगर बलबन की क़ब्र आज जिस हाल में है उसे देख कर लगता है कि समय ने उसके साथ कुछ ज्‍यादा ही ज्‍यादती की है. लगता नहीं कि आर्कियोलोजिकल पार्क के उस कौने में बुरी हालत में इस कब्र के भीतर एक समय का बहुत ताकवर सुल्‍तान सोया हुआ है. ये वही सुल्‍तान है जिसे लोग लेट कर सलाम करते थे और उसके ताज और पैरों को चूमा जाता था. मगर आज उसका नाम लेने वाला भी कोई नहीं है. उसके बाद दिल्‍ली के तख्‍़त पर बैठने वालों के बड़े मक़बरे दिल्‍ली की विरासत का हिस्‍सा बन गए मग़र बलबन के हिस्‍से में यही गुमनाम सी जगह आई.
बलबन का मक़बरा
भारतीय-इस्‍लामी वास्‍तुशिल्‍प के एतिहासिक महत्‍व का ये मक़बरा 1287 में महरौली में बनाया गया था. ये अपने आप में बहुत दिलचस्‍प है कि भारत में मेहराबों का प्रयोग पहली बार इसी मक़बरे की दीवारों में किया गया था और यहां तक कि माना जाता है कि गुंबद का प्रयोग भी पहली बार इसी मक़बरे में किया गया था। मगर अब गुंबद के अवशेष भी बाकी नहीं हैं और उस दौर का जो शुरुआती गुंबद अभी भी मौजूद है उसे नज़दीक के कुतुब कॉम्‍पलेक्‍स में 1311 में बने अलाई दरवाजे में देखा जा सकता है। इसलिए भारत में पहले गुंबद की बात चलती है तो इसी अलाई दरवाजे का नाम लिया जाता है. इन गुंबदों की कहानी भी बड़ी दिलचस्‍प है...पहले यहां अच्‍छे कारीगर थे सो ठीक-ठाक गुंबद बनने लगे मगर 14वीं सदी में मुहम्‍मद बिन तुग़लक द्वारा राजधानी को दौलताबाद ले जाने के कारण अच्‍छे कारीगर भी उधर ही चले गए और फिर काफी समय तक कोई उल्‍लेखनीय गुंबद शैली का निर्माण नहीं हुआ. फिर लोधी सल्‍तनत में खूब गुंबद बने और मुग़लिया सल्‍तनत का पहला बड़ा और उल्‍लेखनीय गुंबद 1562 से 1571 के बीच एक पर्शियन वास्‍तुकार द्वारा हुमायूं के मक़बरे में बनाया गया. खैर, फिलहाल बात बलबन की हो रही है तो साहब, आज उसके मक़बरे में देखने लायक ज्‍यादा कुछ नहीं बचा है. बस खंडहरों के बीच वीराने में गुमनाम सी कब्र के इर्द-गिर्द मक़बरे की दीवारों के कुछ अवशेष ही बचे हैं. कुछ इतिहासकारों में तो इस कब्र को लेकर भी मतभेद है. कुछ का मानना है कि ये क़ब्र बलबन की न होकर उसके बड़े बेटे प्रिंस मुहम्‍मद (खान शहीद) की है. मगर इस बात के कोई सबूत नहीं हैं इसलिए अधिकांश इतिहासकार इसे बलबन की ही कब्र मानते हैं. इब्‍नेबतूता ने बलबन की मौत के 50 साल बाद लिखा था- 

“He had built a house which he called Darul Aman. The Sultan was buried in this building and I have visited his tomb”. 

इब्‍नेबतूता की ये टिप्‍प्‍णी भी इस क़ब्र की पहेली को नहीं सुलझा पाई मगर इतना तय कर गई है कि ये मक़बरा बलबन का ही है और यही दारुल अमन है. 

क़ब्र तक पहुंचते-पहुंचते आसमान में घनघोर काले बादल घिर आए थे और बारिश किसी भी वक्‍़त हो सकती थी. भला ये भी कोई वक्‍़त और मौसम हुआ किसी सुल्‍तान से मिलने का. या फिर सुल्‍तान से ऐसे ही मौसम में मिलना लिखा था. अख़बार की दुनिया में काम करने के दिनों से ही मुझे अपने विषय को बेहतर समझने के लिए आस-पास की थाह लेने की आदत पड़ गई है. सबसे बेहतर जानकारियां उस जगह के आस-पास रहने वाले लोग देते हैं. अब यहां इस वीराने में मुझे कौन बलबन के किस्‍से बताता. उस रोज केवल एक शख्‍़स वहां शकरकंदी बेच रहा था. सो उसी से शकरकंदी लेकर टटोलना शुरू कर दिया. उसने बताया कि साहब, यहां अजीब अजीब किस्‍म के लोग आते हैं. कुछ तो कॉलेज के लड़के-लड़कियां तफ़री के लिए आते हैं, शनिवार-इतवार को कुछ प्रोफ़ेसर टाइप लोग भी आते हैं और साहब रात के वक्‍़त भी लोग आते हैं और न जाने क्‍या-क्‍या तंत्र-मंत्र करते हैं. इस जगह पर पैरानॉरमल एक्टिविटी के बारे में तो मैंने सुना था. मगर ये जानना हैरानी भरा था कि सप्‍ताह के कुछ खास दिनों में लोग यहां मन्‍नतें मांगने भी आते हैं. ये जिन्‍नों से दुआएं मांगने का मामला है. इस कहानी के तार इतिहास से भी जुड़े हुए हैं. इतिहासकारों और लोगों का मानना है कि बलबन का ये मक़बरा बलबन का बनाया दार-उल-अमन (Place of Peace/Refuge) है जहां प्रवेश करते ही कर्ज़दार अपने कर्जों से मुक्‍त हो जाते थे. यहां तक कि यदि कोई हत्‍या करके भी इस दार-उल-अमन में आ जाता तो सुल्‍तान उसे बचा लेता था. हमारे देश में तो लोग ऐसे कि़स्‍सों को सिर आंखों पर ले लेते हैं. यही वजह है कि आज भी बहुत से लोग इस दार-उल-अमन में अपने कर्जों से मुक्ति के लिए दुआएं मांगने आते हैं. ऐसे काम के लिए तो लोग पीर-फ़कीरों की मज़ारों पर भी जाया करते हैं फिर ये तो एक सुल्‍तान की सैकड़ों वर्ष पुरानी क़ब्र है. मामला जितना पुराना उतना जानदार. मगर इस क़ब्र के आस-पास के इलाके की न सलीके से देखभाल हो रही है और न ही साफ-सफाई. ये जगह अब प्रेमी जोड़ों के लिए छुप कर इश्‍क़ फ़रमाने के काम आने लगी है. बेहतर ही दिल्‍ली सरकार या पुरातत्‍व विभाग इस ओर थोड़ा ध्‍यान दे और इस सुल्‍तान को उसकी वाजिब इज्‍़ज़त बख्‍़शे.
आखिर कौन था बलबन?
जिसे दुनिया ने गयासुद्दीन बलबन के नाम से जाना उसका असल नाम बहाउद्दीन था और दिल्‍ली सल्‍तन में गुलाम वंश के शासन में 1266 से 1286 तक दिल्‍ली पर राज किया. बलबन वास्‍तव में एक इलाबरी जनताति का तुर्क था जिसे उसके बचपन में मंगोलों ने बगदाद के बाजार में गुलाम के रूप में बेच दिया था. किस्‍मत का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि बलबन भारत आ पहुंचा और सुल्‍तान इल्‍तुतमिश ने उस पर दया करके उसे मोल खरीद लिया. बलबन ने जी लगा कर अपने मालिक की सेवा की और अपनी स्‍वामीभक्ति के परिणामस्‍वरूप सुल्‍तान ने चेहलगन या चालीसा के दल में शामिल कर लिया गया. ये दरअसल 40 दरबारियों का दल था जिसका शासन और प्रशासन में पूरा दखल था. बाद में रजि़या सुल्‍तान के शासन में उसे अमीर-ए-शिकार बनाया गया. शुरुआत में तो बलबन रजिया सुल्‍तान के प्रति वफ़ादार रहा मगर बाद में रजिया सुल्‍तान द्वारा हिंदुओं के ऊपर लगने वाले जजिया कर को ख़त्‍म करने से नाराज होकर दरबारी लोगों का समर्थन किया जिन्‍होंने रजिया को दिल्‍ली के तख्‍़त से उतार दिया. नए सुल्‍तान बहरम शाह ने बलबन की इस मदद का इनाम उसे हांसी और रेवाड़ी का गवर्नर भी बनाकर दिया. सन 1245 में बलबन ने मंगोलों से लोहा लेकर उन्‍हें खदेड़ दिया और अगले ही साल जब महमूद नसीरुद्दीन शाह सुल्‍तान बना तो उसने बलबन को अपना मुख्‍यमंत्री बनाया. 
बलबन ने 20 वर्षों तक सुल्‍तान के दाहिने हाथ के रूप में काम किया और दरबार के भीतर और बाहर के विद्रोहियों को खत्‍म कर दिया. प्रसन्‍न होकर सुल्‍तान ने अपनी बेटी का विवाह बलबन से कर दिया. सुल्‍तान ने बलबन को उलुघ खान के शीर्षक से नवाजा और नायब-ए-मामलिकात या कहिए कि उप-सुल्‍तान बना दिया. इस दौरान बलबन लगातार जंग जीतता रहा और बागियों को खत्‍म करता रहा. इसीलिए सुल्‍तान की मौत के बाद फरवरी 1265 में बलबन ने बिना किसी के विरोध के ताज को संभाला. तब तक चालीसा के लोगों की ताकत बढ़ चुकी थी और वे बलबन से जलने लगे थे. ताज संभालने के बाद सबसे पहले बलबन ने चा‍लीसा के बचे-खुचे लोगों को मौत के घाट उतार दिया और विद्रोह की संभावनाओं को खत्‍म कर दिया. बलबन ने जब तक राज किया पूरी धमक और सख्‍ती से किया.
बलबन ने अपने दरबार को भी दुरुस्‍त किया. बलबन की सख्‍ती का आलम ये था कि कोई उसके दरबार में मुस्‍कुराने की खता भी नहीं कर सकता था. उसने खुफिया विभाग तैयार किया और जासूसों की एक फौज को अपने राज्‍य के तमाम हिस्‍सों में तैनात कर दिया ताकि किसी भी विद्रोह की ख़बर सुल्‍तान को मिलती रहे. रूहेलखंड में विद्रोहियों ने सिर उठाया तो बलबन ने उनके गांवों के सभी पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया. बलबन ने दिल्‍ली में बैठ कर भी बंगाल तक के इलाके को नियंत्रित किया और अपने पुत्र बुगरा खान को बंगाल का गवर्नर बना दिया. फिर 1279 और 1285 में मुगलों के आक्रमण को भी बलबन ने विफल कर दिया मगर इस खेल में बलबन ने अपने बेटे मुहम्‍मद को खो दिया और इसी ग़म ने बलबन को भीतर से तोड़ कर रख दिया और 1287 में उसने दुनिया को अलविदा कह दिया.     
एक सुल्‍तान के तौर पर बलबन ने अपनी काबिलियत को बखूबी साबित किया और सही मायनों में बलबन इल्‍तुतमिश का वारिस था. उसने अपने राज को बेहद बुद्धिमानी और कानून आधारित व्‍यवस्‍था से चलाया. इसीलिए इतिहासकारों ने उसकी प्रशंसा की है. उसका न्याय पक्षपात रहित था और उसका दंड अत्यंत कठोर.  इसीलिए उसकी शासन व्यवस्था को लौह रक्त की व्यवस्था कहकर संबोधित किया जाता है. वास्तव में उस समय ऐसी ही व्यवस्था की आवश्यकता थी.
बलबन के मक़बरे की ओर जाने वाला रास्‍ता











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