यायावरी yayavaree

Friday, 30 November 2018

Agrasen ki Baoli: An Interesting Heritage of Delhi

अग्रसेन की बावली
समय के साथ-साथ जब शहर विस्‍तार के लिए अपनी बाहें फैला रहे होते हैं तो उसी वक्‍़त उनकी पुरानी सीमाओं के भीतर भी उनका स्‍वरूप लगातार परिवर्तित होता रहता है. शहर बार-बार करवटें लेते हैं और यही वजह है कि कुछ बरसों बाद कुछ इलाकों को पहचान पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. बनने और बिगड़ने की इसी प्रकिया में तमाम विरासतें या तो जमींदोज हो जाती हैं या फिर जैसे-तैसे अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष करती नज़र आती हैं. दिल्‍ली तो यूं भी बार-बार बसाई और उजाड़ी गई. एक समय में दिल्‍ली की तमाम बावडि़यां जो बेहद खुले इलाकों में बनाई गई थीं आज उनके चारों तहफ शहर न केवल उग आया है बल्कि उन्‍हें अपनी बाहों में इतना कस के खड़ा है कि ये विरासतें खुल कर सांस भी नहीं ले पा रही हैं. ऐसी ही एक विरासत है अग्रसेन की बावली. बावली को हिंदी में बावड़ी, मराठी में बारव, गुजराती में वाव, कन्‍नड़ में कल्‍याणी या पुष्‍करणी कहा जाता है.

कस्‍तूरबा गांधी मार्ग के नजदीक हेली रोड पर मौजूद 14वीं सदी की इस बावली के लिए पिछले कुछ सालों में लोगों की दिलचस्‍पी और दीवानगी बढ़ती गई है. हो भी क्‍यों न ? "झूम बराबर झूम" फिल्‍म का गीत बोल न हल्‍के-हल्‍केतो सभी को याद होगा ही. गुलज़ार के गीत पर राहत फतेह अली खान और महालक्ष्‍मी अय्यर की आवाज ने एक जादुई माहौल रच डाला था और इस जादू को मुकम्‍मल बनाया चांदनी रात के आगोश में डूबी अग्रसेन की बावलीके दृश्‍यों ने. कुछ ऐसा ही तिलिस्‍म फिल्‍म पी.के.ने भी रचा. पीके यानी कि आमिर खान का ठिकाना थी ये बावली. बस फिर क्‍या था...यहीं से इस बावड़ी के प्रति लोगों की दिलचस्‍पी दीवानगी में बदल गई. जिन्‍हें इस विरासत की कोई जानकारी नहीं थी वे भी तस्‍वीरों और तफ़री की चाह में यहां तक आने लगे. अब आलम ये है कि साल के बारहों महीनों यहां आने वालों, खासतौर पर युवाओं का मजमा लगा रहता है.

केजी मार्ग से हेली रोड पर मुडते ही दाईं ओर हेली लेन है बस इसी पतली सी सड़क के दूसरे छोर पर छिपी है ये बावड़ी. मैं कई बार कस्‍तूरबा गांधी मार्ग से गुज़रा मगर इस बावड़ी का कोई अंदाजा नहीं था. उन लाल बलुआ अनगढ़ पत्‍थरों से बनी ये ऐतिहासिक बावड़ी अपने अतीत के गौरव को बखूबी बयान कर रही है. ये अपने आप में आश्‍चर्य की बात है कि बरसों तक इस इलाके में काम कर चुके अधिकांश लोग भी इस तक पहुंचने का ठीक रास्‍ता नहीं बता पाते हैं. बावली तक वही पहुंच पाते हैं जिन्‍हें वास्‍तव में बावली से मोह है. वरना बावली उन पतली गलियों में छुपी बैठी है. इस बावली में नीचे की ओर उतरते हुए तीन स्‍तर बने हुए हैं जिनमें हर स्‍तर पर बैठने के लिए स्‍थान बनाए गए हैं. यकीन मानिए बावड़ी का पानी बेशक सूख गया हो मगर आज भी तपती गरमी में इसकी निचली सीढि़यों पर बैठने के सुकून का कोई जवाब नहीं.

आज भले ही हमें बावडियां एक अनावश्‍यक चीज दिखाई देती हों मगर पुराने समय में लोगों को इनका महत्‍व पता था. इसलिए बड़े-बड़े राजा महाराजाओं ने अपनी जनता के लिए कुएं और बावडियों का निर्माण दिल खोल कर कराया. पाटन की रानी की वाव, अडालज और दादा हरी की वाव जैसी देश की तमाम बावडियां तो अपने कलात्‍मक सौंदर्य के लिए विश्‍व-विख्‍यात हैं. यही वजह है कि 100 रुपए के नए नोट के पीछे गुजरात के पाटन में स्थित रानी की वावको स्‍थान दिया गया है. उस समय बावड़ियाँ समाज के लोगों के मिलने का स्‍थान भी थीं. खासकर महिलाएं यहां बैठकर अपने दुख-सुख साझा किया करती थीं. इसी तरह देश के अन्‍य इलाकों में भी तमाम बावडियां अपने साथ अपने समय के समृद्ध सांस्‍कृतिक इतिहास की गवाही दे रही हैं. 

माना जाता है कि इस बावड़ी का निर्माण महाभारत काल में हुआ था और बाद में अग्रवाल समाज ने इसका जीर्णोद्धार कराया था. बावली की बनावट इसके तुग़लक (1321-1414) और लोदी काल (1451-1526) अर्थात 13 वीं से 16वीं शताब्‍दी के दौरान का होने की ओर इशारा करती है. 108 सीढि़यों वाली ये बावली उत्‍तर से दक्षिण तक 60 मीटर लंबी और 15 मीटर चौड़ी है. बावली के उत्‍तरी सिरे पर 7.8 मीटर व्‍यास वाला एक कुआ है जो पानी से भरने पर एक शाफ्ट से बावली को भी पानी से भर देता था. एक खास बात जो मैंने यहां महसूस की वो ये थी कि वावली में नीचे उतरने के लिए बनाई गई सीढ़ी में इस्‍तेमाल किए गए पत्‍थरों का आकार एक समान नहीं है और सीढि़यों की ऊंचाई आम तौर पर बनाई जाने वाली सीढियों की ऊंचाई से ज्‍यादा है. अब इसकी वजह एक ही हो सकती है कि उस वक्‍़त इस इलाके में रहने वाले लोग आमतौर पर लंबे कद के थे. अलबत्‍ता इस बारे में मुझे कहीं पढ़ने को नहीं मिला. बावली का पानी सूख चुका है मगर आज भी इसका अधिकांश हिस्‍सा पहले की तरह कायम है. एक वक्‍़त था जब यहां लोग तैराकी सीखने के लिए आया करते थे. मगर अब यह जगह दिल्‍ली की भुतहा जगहों में शुमार हो चुकी है. रात के वक्‍़त इस तरफ़ कम ही लोग आते हैं और बावली को लेकर तमाम तरह के किस्‍से कहानियां लोगों की जुबान पर हैं. कुछ लोगों का कहना है कि इस बावली में तमाम लोगों ने कूद कर अपनी जान दी हैं सो बावली में भूत या आत्‍माएं अन्‍य लोगों को इसमें कूदने के लिए आवाजें देते हैं. कुछ जगहें सुनी-सुनाई बातों के आधार पर भी बदनाम हो जाती हैं. क्‍योंकि बावली में आत्‍महत्‍या करने का अभी तक सिर्फ एक ही मामला प्रकाश में आया है.

बावली की पश्‍चिम दिशा में तीन प्रवेश द्वारों वाली एक मस्जिद है जो अब पूरी तरह से खंडहर हो चुकी है और वक्‍़त के थपेड़ों के आगे कितने दिन और टिक पाएगी कहना मुश्किल है. मैंने उस रोज इस मस्जिद की दीवारों को देखा तो आभास हुआ कि अपने निर्माण काल में ये छोटी सी मस्जिद बहुत खूबसूरत रही होगी. इसकी छत व्‍हेल मछली जैसी दिखाई पड़ती है और अंदर से इसकी आकृति किसी चैत्‍य की तरह लगती है. मुझे सबसे ज्‍यादा इसके खंबों पर पदक अलंकरण जैसी आकृतियों ने आकर्षित किया. उन पर क्‍या लिखा है ये तो मैं नहीं समझ पाया. ये बावली उग्रसेन की बावली है या अग्रसेन की बावली इस बात का भी कोई साफ़-साफ़ अंदाज़ा नहीं लग पाता है. बावली के बाहर लगे आधिकारिक पत्‍थर पर इसका नाम उग्रसेन की बावली खुदा हुआ है. जबकि राष्‍ट्रीय अभिलेखागार के रिकॉर्ड में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए नक्‍़शों में इसका नाम ऊजर सेन की बावली पाया गया है. इसी नक्‍़शे में अग्रसेन की बावली के नज़दीक ही उत्‍तर-पश्चिम में एक और बावली को दिखाया गया है मगर 1911 में भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्‍ली हो जाने और दिल्‍ली को नए सिरे से बसाए जाने के दौरान हुए निर्माण कार्यों में संभवत: यह बावड़ी गायब हो गई.

इस बावड़ी के साथ एक और दिलचस्‍प किस्‍सा जुड़ा हुआ है। आपने प्रसिद्ध फोटोग्राफर रघु राय का 1971 में खींचा गया वो ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फोटो Diving into Ugrasen Ki Baoli, a 14th century monumentअवश्‍य ही देखा होगा जिसमें बावड़ी ऊपर तक लबालब भरी हुई है और एक लड़का बावड़ी में छलांग लगा रहा है। लोकप्रिय लेखक सैम मिलर ने 2008 में प्रकाशित हुई अपनी किताब Delhi: Adventures in a Megacity में इस फोटो से जुड़े एक किस्‍से के बारे में लिखा है. दरअसल इस फोटो के खींचे जाने के 26 साल बाद जब वो इस बावड़ी के देखने के लिए आए तो इस पर ताला लगा हुआ था. और एक गार्ड ने आकर अनमने ढंग से इसे खोला. मिलर रघु राय के फोटो को हजारों बार देख चुके थे. सो जिज्ञासावश उन्‍होंने वही फोटो उस गार्ड को दिखा कर पूछा कि क्‍या उसने ये फोटो देखा है. गार्ड के जवाब ने मिलर को हैरान कर दिया. दरअसल रघु राय के फोटो में बावड़ी में छलांग लगाने वाला लड़का वो गार्ड बाग सिंह खुद ही था. सबूत के तौर पर बाग सिंह ने अपनी जेब से रघु राय का वही फोटो निकाल कर दिखा दिया जो किसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. अब मिलर ने आज के बाग सिंह का एक फोटो खींचा जो उनकी पुस्‍तक में प्रकाशित हुआ है. जैसा कि तस्‍वीर से साबित होता है कि 1970 तक बावली में खूब पानी हुआ करता था मगर बाद में इस इलाके में कंक्रीट का जंगल उग आने से पानी सूखता गया और बावली की हालत खराब होती गई. रघु राय के फोटो और आज के बावली के फोटो की तुलना से एक बात और साफ होती है कि 1970 के बाद पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने बावड़ी का बखूबी जीर्णोद्धार किया है. रघु राय के फोटो में टूटे और जर्जर हालत में नज़र आ रहे हिस्‍से अब अच्‍छी हालत में हैं.

ये मेरे लिए भी बहुत अजीब था कि मेरे बहुत नज़दीक‍ होने के बावजूद मुझे इस धरोहर तक पहुंचने में कई बरस लग गए. अक्‍सर ऐसा ही होता है. हम अपने आस-पास की चीजों को हमेशा हल्‍के में लेते हैं कि कभी भी देख आएंगे मगर ये कभी भीकभी नहीं आता है. या फिर बरसों बाद जब कभी मौका लगता है तो हम पाते हैं कि वहां चीजें अब वैसी नहीं रह गई हैं जैसी बरसों पहले हुआ करती थीं. आज के शिमला, मनाली और मूसरी जैसे शहर आज से महज 10-15 बरस पहले ऐसे नहीं थे. कुछ ऐसा ही हमारी विरासतों के साथ भी होता है. सदियों पुरानी ये विरासतें हर गुज़रते दिन के साथ ढ़ल रही हैं. हर रोज़ उनकी उम्र घट रही है. तमाम संरक्षण के प्रयासों के बावजूद हम लंबे वक्‍़त तक इन सबकों बचा कर नहीं रख पाएंगे. एक और बात है जब लोग अपनी विरासतों के प्रति उदासीन हो जाते है और इन्‍हें देखने नहीं जाते हैं तो सरकारें और प्रशासन भी इनके रख-रखाव में दिलचस्‍पी नहीं लेते हैं. तमाम विरासतों के आस-पास चरसिए और गंजेडियों के अड्डों को जमते हम सभी ने देखा है. इस सबके लिए हम लोग भी जिम्‍मेदार हैं. हम अपने बच्‍चों से अपनी विरासतों के बारे में शायद ही कभी बात करते हैं या उन्‍हें वहां घुमाने ले जाते हैं. इसलिए यदि हमें अपनी विरासतों से मुहब्‍बत है तो जितना जल्‍दी हो सके इन्‍हें देख आना चाहिए. कौन जाने आज से 10-15 बरस बाद ये मिट्टी में मिल चुकी हों.

समय: सुबह 7 से शाम 6 बजे तक
प्रवेश : नि:शुल्‍क
जंतर मंतर : 1.5 किलोमीटर
इंडिया गेट: 2 किलोमीटर











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Friday, 2 November 2018

Yoga Retreat at Shikwa Haveli

योगा रिट्रीट @ शिक़वा हवेली 


जैसा कि मैंने पिछली पोस्‍ट Shikwa Haveli: A Story of Restoration, Reconstruction and Rebirth में जि़क्र किया था कि शिक़वा हवेली में हमारे ठहरने के कार्यक्रम में योग सबसे प्रमुख हिस्‍सा था. सो पहली रात बर्मा लॉन्‍ज में हम मित्रों की मंडली ग्रीन टी के साथ आ जमी. यहां योगा एक्‍सपर्ट रितु सुशीला कृष्‍णन से स्‍वास्‍थ्‍य के अर्थ, जीवन में व्‍यायाम और योग के महत्‍व और जीवन शैली में सुधार जैसे विषयों पर पर विस्‍तार से चर्चा हुई. यहीं पता लगा कि जैसे शारीरिक स्‍वास्‍थय सिर्फ एक तरह का स्‍वास्‍थ्‍य है उसी तरह मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य, भावनात्‍मक स्‍वास्‍थ्‍य जैसे 8 और रूप होते हैं स्‍वास्‍थ्‍य के. और यहां हमें अकेले शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य की भी परवाह नहीं होती है. हमारी-आपकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में स्‍वास्‍थ्‍य, एक्‍सरसाइज और योगा जैसे शब्‍द तब एंट्री मारते हैं जब शरीर का कोई अंग बेवफाई करने लगता है. उससे पहले हमें कहां ये सब याद आता है. कोई स्‍वस्‍थ रहते ही इन सबका ख्‍याल रखे तो उसे योगी ही कहा जाना चाहिए. आम तौर पर हमें स्वास्थ्य की फ़िक्र तब होनी शुरू होती है जब मेडिकल टेस्ट में हम बीपी, शुगर, कोलेस्ट्रॉल की सेहतमंद दहलीज़ों को या तो लांघ चुके होते हैं या उस दहलीज़ को बस पार करने ही वाले हों. 
योगा एक्‍सपर्ट रितु बीच में 
इस हवेली की मेहमाननवाज़ी को भी मैंने खास इसीलिए कुबूल किया था कि 700 साल पुरानी हवेली के तिलिस्म को समझने के बहाने योग के भी थोड़ा करीब पहुंचने का अवसर मिलेगा. पहले तय हुआ था कि अगली सुबह योग सत्र हवेली के कोर्टयार्ड में होगा लेकिन हवेली की छत से चारों तऱफ के विहंगम दृश्यों और खूबसूरत बारादरी ने छत पर ही खींच लिया. सो अगली सुबह हम सभी ब्लॉगर और लेखक मित्र हवेली की छत पर उगते सूरज की नज़रों में योग, प्राणायम के तमाम गुर गुरू बन चुकी रितु से सीख रहे थे. 
सुबह-ए-शिक़वा 
शिक़वा की तो सुबह भी बहुत खूबसूरत है. हवेली की छत पर बनी बारादरी से जहां पहली शाम यमुना नदी के किनारे ढ़लते सूरज का अद्भुत दृश्‍य देखा था वहीं अब हवेली से सटी मस्जिद के गुंबदों से उगते सूरज का सुंदर रूप देख कर हम उस दृश्‍य को कैमरों में कैद करने दौड़ पड़े. देखिए न सूरज, चांद, सितारे, नदियां, पहाड़ कहां मजहबों का फ़र्क करते हैं. वे तो सभी जगह एक सा प्‍यार लुटाते हैं. और काठा के इस गांव की हवा भी कहां कभी मज़हबी हुई है. मस्जिद का लाउडस्‍प्‍ाीकर हिंदू और मुस्लिम में बिना किसी फ़़र्क के हर तरह की मुनादियां करता है. काठा के बारे में बताते हुए मिसेज रज़ा बताती हैं कि ये गांव गंगा-जमुनी तहज़ीब का अनुपम उदाहरण है. पिछले सालों में पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में हुए दंगों के समय भी इस गांव के लोगों ने आपसी भाईचारा बनाए रखा और गांव में कभी दंगा-फसाद नहीं हुआ. मुज़फ़फ़रनगर के दंगों के वक्‍़त गांव के हिन्‍दू परिवार के लोगों ने हवेली और गांव के बाकी मुस्लिम परिवारों की रक्षा के लिए रात में हवेली में पहरा तक दिया. उन्‍होंने कहा कि पहले हमें मारोगे तब इन्‍हें हाथ लगाने देंगे. हो भी क्‍यों न. ये परिवार भी गांव के लोगों से उतनी ही मुहब्‍बत जो करता है. गांव के तमाम लोगों को जहां इसके निर्माण के समय रोज़गार मिला वहीं आज भी गांव के तमाम लोग हवेली में काम कर रहे हैं.

इस गांव काठा का इतिहास भी कम दिलचस्‍प नहीं है. दरअसल बागपत उत्तरप्रदेश का एक जिला है और काठा गांव इसी इलाके में है. इसीलिए पिछली शाम शारिक़ रज़ा साहब ने सबसे पहले बाग़पत और काठा से ही हमारा परिचय कराया था. ये जानना बड़ा दिलचस्‍प था कि बाग़पत का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है. जब कौरवों और पांडवों के बीच पांच गांवों का समझौता हुआ तो उसमें जो पांच गांव पांडवों को दिए गए थे उनमें पानीपत, सोनीपत, मारीपत और इंद्रप्रस्‍थ के साथ बाग़पत भी एक था. महाभारत काल में बागपत को व्याघ्रप्रस्थ कहा जाता था क्‍योंकि इस इलाके में बाघ बहुत होते थे. बस जहां बाघ के पैर पड़ते हों वो हो गया बागपत. इसी जगह को मुगलकाल से बागपत के नाम से जाना जाने लगा. बागपत ही वह जगह है, जहां कौरवों ने लाक्षागृह बनवाकर उसमें पांडवों को जलाने की कोशिश की थी.

हां, तो हम कहां थे ? हम हवेली की छत पर योगा कर रहे थे.

अब तक हम लोगों के योगा मैट जमीन पर तैयार थे और योगा का सत्र शुरू हुआ. जिसमें पहले हल्‍की वॉर्म अप एक्‍सरसाइज और फिर तमाम योग मुद्राएं शामिल थीं. कुछ ही पलों में शरीर के सारे नट बोल्ट खुलने शुरू हो गए और अगले दो घण्टे में तमाम योग मुद्राओं और योग में सांस के खेल का अभ्यास किया. अब तक सूरज सिर पर चढ़ आया था मग़र योग का नशा कहाँ उतर था अभी सो अब मण्डली अपने मैट उठा कर ग्राउंड फ्लोर पर ख़ूबसूरत "बाग़-ए-बहिश्त" में आ जमी. और अलका रज़ा जी के कैमरे के आगे कुछ असली और नकली पोज़ भी दिए. सारा दिन कुर्सी पर जमे रहने की नौकरी का सिला ये था कि कुछ मुद्राओं में हाथ और पैर वहां तक नहीं जा पा रहे थे जहां तक उन्हें पहुंचना चाहिए था. जाएंगे कैसे? हमने शरीर को तक़लीफ़ देनी ही जो बन्द कर दी है. और इधर इस देह की फ़ितरत ही कुछ ऐसी है कि जितना कष्ट देंगे उतना मजबूत बनेगी. दरअसल हम लोग जानते सब कुछ हैं लेकिन अमल में तब तक नहीं लाते जब तक संकट की घण्टी न बजने लग जाए. इस तरह की योगा रिट्रीट मुझ जैसे शख़्स को एक बार फिर से मैट पर लाकर खड़ा कर देने के लिए काफ़ी थी. उम्मीद है कि इस योगा रिट्रीट से हासिल किए सबक अगली किसी योगा रिट्रीट तक इस देह को योग के क़रीब ले जाने में सफ़ल रहेंगे. आपको योग के क़रीब पहुंचने का कोई मौक़ा मिले तो छोड़िएगा नहीं !














नोट: यह यात्रा अक्‍तूबर, 2018 में की गई थी। 

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Wednesday, 31 October 2018

Shikwa Haveli: A Story of Restoration, Reconstruction and Rebirth

शिक़वा हवेली

अभी ज्‍यादा वक्‍़त नहीं गुज़रा जब हवेलियां हमारे गांवों और शहरों में जीती-जागती और सांसें लेती हुई पाई जाती थीं. मग़र वक्‍़त के साथ कदमताल बैठाने में पिछड़ रही हवेलियों के कि़स्‍से धीरे-धीरे हमारी रोज़मर्रा की जि़ंदगी से गायब होने लगे हैं और हवेलियों का जि़क्र अब हैरिटेज के बहाने ही होता है. जि़क्र पुरानी दिल्‍ली की हवेलियों का हो या हरियाणा-राजस्‍थान की हवेलियों का, ये हवेलियां बीते वक्‍़त के दिलचस्‍प किस्‍से अपने सीने में छुपाए बैठी हैं. और बात अगर किसी 700 साल पुरानी हवेली के रेस्‍टोरेशन की हो तो ये अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं. दिल्‍ली की सरहद को लांघते ही चंद पलों में पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के बागपत इलाके में काठा गांव की खूबसूरत शिकवा हवेली रेस्‍टोरेशन और पुननिर्माण की अद्भुत कहानी कह रही है. इस हवेली को स्‍थानीय लोग काजियों की हवेली या मेहराबों वाली हवेली या हवा महल के नाम से भी जानते हैं. चंद रोज़ पहले मुझे कुछ पत्रकार और ब्‍लॉगर मित्रों के साथ इस हवेली की मेहमाननवाज़ी देखने का मौक़ा मिला.


सहारनपुर-यमुनोत्री मार्ग पर काठा के एक ऊंचे टीले पर बसी इस हवेली की कहानी को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्‍नों में तक़रीबन 700 साल पीछे की ओर लौटना होगा. किस्‍सा 1398 का है जब काबुल से चली तैमूर लंग की भारी-भरकम फ़ौज़ उत्‍तर भारत को रौंदती चली आ रही थी. सोनीपत और पानीपत के रास्‍ते दिल्‍ली को बड़ी बेदर्दी से लूटा गया और जब इतने से पेट नहीं भरा तो तैमूर लंग ने यमुना पार के इलाकों का रुख कर लिया. अब इस इलाके की बर्बादी तय थी. मगर यहां के क़ाज़ी ने तरक़ीब लगाई. काज़ी तैमूर के पक्षी प्रेम से वाकि़फ़ थे सो उन्‍होंने बहुत सोच-समझकर तैमूर लंग को एक सफेद मोर भेंट किया. तीर सही निशाने पर लगा. तैमूर बहुत खुश हुआ और इस इलाके को छेड़े बिना मेरठ की ओर निकल गया. इस तरह ये इलाका बच रहा गया. बस तभी से काठा की ये काजियों की हवेली काठा गांव के लोगों के दिल में अपनी जगह बनाए रही.


कहानी रेस्‍टोरेशन की
शायद यही वजह है कि मुग़लिया सल्‍तनत के ख़त्‍म होने के बावजूद काठा की इस हवेली में अदालत लगने का सि‍लसिला 20वीं सदी की शुरूआत तक बदस्‍तूर चलता रहा. सन 1970 तक परिवार के लोग हवेली में आते-जाते रहे मग़र धीरे-धीरे इसके बाशिंदे इससे दूर होते गए और हवेली वक्‍़त की थपेड़ों के आगे भला कब तक खड़ी रहती. वक्‍़त के साथ इसकी बुलंदी ढ़लने लगी और अधिकांश हिस्‍से खंडहर में तब्‍दील होने लगे. मगर इस हवेली के वारिस शाकि़र बिन रज़ा को उनकी जड़ें बुला रही थीं. शाकि़र, यूनाइटेड नेशन्‍स में डिप्‍लोमेट के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. दुनिया के 12 देशों में अपनी सेवाएं देने के बाद और तक़रीबन 90 देशों की यात्रा करने के बाद जब नौकरी से फुर्सत हुए तो अपने पुरखों की इस विरासत को फिर से खड़ा करने का मजबूत इरादा लेकर अपने गांव लौट आए. 
श्रीमती और श्री शारिक  बिन रज़ा
ये इतना आसान काम नहीं था मगर दिल में अपनी विरासत के प्रति गहरे जुड़ाव ने रज़ा परिवार को ये काम शुरू करने का हौसला दिया. फिर शुरू हुई तेरह बरसों तक चलने वाली पुननिर्माण की लंबी कहानी जिसमें अपनी यादों से गर्द को हटाते हुए पूरी हवेली को फिर से खड़ा करने की जि़द और ज़द्दोज़हद शामिल थी. इस काम में उनके सिविल इंजीनियर भाई ने बहुत मदद की. मगर यहां एक खास बात थी कि हवेली के बरसों तक चलने वाले पेचीदा काम के लिए रज़ा परिवार ने किसी आर्किटेक्‍ट की मदद नहीं ली. उन्‍होंने आस-पास के उन्‍हीं मिस्त्रियों, मज़दूरों और कारपेंटरों की मदद ली जिन्‍हें पहले से इस तरह के काम करने का अनुभव था. इसकी ख़ास वज़ह थी. इससे जहां हवेली के रूप को नकलीपन से बचाया जा सका वहीं आस-पास के लोगों को बरसों तक रोज़गार भी मिला और धीरे-धीरे लोगों का हवेली से जुड़ाव भी हुआ. इसके अलावा राजस्‍थान से पत्‍थरों को काटने वाले कारीगरों ने भी तक़रीबन सात सालों तक यहां रहकर काम किया. मगर उनके लिए शर्त ये थी कि हवेली पर राजस्‍थानी प्रभाव नज़र नहीं आना चाहिए. मगर ये काम सुनने में जितना आसान लगता है उतना ही टेढ़ा था. मिस्‍त्री भी इस काम को पूरे दिलो-जान से कर रहे थे और रज़ा परिवार के साथ इतने घुल मिल गए थे कि मिस्‍त्री मिसेज रज़ा को बहू कहकर बुलाते. 


काम सप्‍ताह के सातों दिन और चौबीसों घंटे चलता. ए‍क समय लगभग 100 मिस्‍त्री, मज़दूर और कारीगर दिन-रात काम करते. कभी-कभी मिस्‍त्री नाराज़ हो जाते और काम छोड़ कर चले जाते. मग़र उनके हुनर के क़द्रदान रज़ा उन्‍हें किसी तरह मना कर बुलवा ही लेते और एक बार फिर गिले-शिक़ों को भुला कर शुरू हो जाता सपने को साकार करने का सफ़र. एक दफ़ा शारिक आगरा से एक बेहद ख़ूबसूरत पच्‍चीकारी किया हुआ पत्‍थर अपनी ख्‍़वाबगाह में लगवाने के लिए लेकर आए मगर मिस्त्रियों के हिसाब से इस पत्‍थर पर किया हुआ काम सही नहीं था. उन्‍हें इस पर फूल की डिजाइन में एक पत्‍ती ज्‍यादा नज़र आई सो कह दिया कि ये पत्‍थर ख्‍वाबगाह का हिस्‍सा नहीं हो सकता. मिस्त्रियों ने कह दिया तो कह दिया. अब लाख मान मनौव्‍वल हुई मगर पत्‍थर ख्‍वाबगाह में नहीं लगाया गया. जानते हैं उस पत्‍थर को आखिरकार कहां जगह मिली? उसे जगह मिली एक टॉयलेट में (तस्‍वीर देखें).

आइए मिलते हैं हवेली से 
रज़ा साहब से जब हमने पूछा कि इस हवेली को बनाने में कितना पैसा खर्च हुआ तो वे बस मु‍स्‍कुरा कर रह गए और कहा कि इसका हिसाब लगाने की उन्‍होंने कई बार कोशिश की मगर किसी ठीक अंदाज़े तक वो नहीं पहुंच पाए. निर्माण का काम जहां तेरह वर्षों तक चला वहीं हवेली की साज-सज्‍जा का काम और दो वर्षों तक चला. इसकी सजावट में रज़ा साहब की तमाम पोस्टिंग के दौरान उनके द्वारा इकट्ठी की गई तमाम बेशकीमती चीजों ने प्रमुख भूमिका निभाई है. अब ये हवली 2009 से शारिक रज़ा, उनकी लेखिका, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पत्‍नी अलका रज़ा और उनके बेटे साहिल का घर है.
बर्मा लॉन्‍ज
हम लोग उस रोज़ हवेली के खास मेहमान थे सो हवेली से हमारा परिचय रज़ा परिवार के साथ बर्मा लॉन्‍ज में हाई-टी के दौर से शुरू हुआ. बर्मा लॉन्‍ज दरअसल हवेली का ड्राईंग रूम है और शारिक रज़ा की बर्मा पोस्टिंग के दौरान संजोई गई तमाम खूबसूरत चीजों का म्‍यूजियम है जिसमें तमाम एशियाई देशों से लाई गई हैंण्‍डीक्राफ्ट की वस्‍तुएं, सजावटी सामान, स्‍मृति चिन्‍ह, कीमती पत्‍थरों से बनी पेंटिंग, चियांगमाई से लाए गए चिडि़यों के पिंजरे आदि रखे हुए हैं. इसी लंबे-चौड़े लॉन्‍ज में एक दीवार पर रेस्‍टोरेशन की कहानी को बयां करती तस्‍वीरें हैं तो दूसरी ओर धातुओं के बेशकमती स्‍मृति चिन्‍ह. बार और पूल की टेबल भी एक कोने में सजी हैं. मतलब एक आरामदायक स्‍टेकेशन का पूरा इंतज़ाम. अब बारी थी हवेली को क़रीब से समझने की. रज़ा साहब ने एक-एक कर हवेली के कमरे दिखाने शुरू किए. ये हवेली के प्रतिबंधित हिस्‍से हैं जहां हवेली के मेहमान मेजबान के साथ ही प्रवेश कर सकते हैं.

हवेली के मुख्‍य कोर्टयार्ड में बर्मा लॉन्‍ज के ठीक सामने दूसरी ओर गोल्‍डन रूम है. इस हॉल में प्रवेश करते ही दुनिया जहान से लाई गई बेशकीमती चीजों से आंखें चुंधिया जाती है. इस कमरे में तमाम चीजों के बीच एक पालकी हमारा ध्‍यान अपनी ओर खींचती है. इस पालकी में ही शारिक रज़ा की मां विवाह के बाद घर आई थीं. इसी कमरे में एक ओर शारिक रज़ा और अलका रज़ा की एक़ खूबसूरत तस्‍वीर है. ये तस्‍वीर मिस्‍टर और मिसेज रज़ा की मुहब्‍बत की कहानी की गवाही दे रही है. ये राज़ भी खु़द मिसेज रज़ा ने खोला था कि इन दोनों की मुलाक़ात दिल्‍ली यूनिवर्सिटी में हुई थी जहां कानपुर की अलका रशियन लैंग्‍वेज में ग्रेजुएट स्‍तर का कोर्स कर रही थीं और काठा के शारिक लॉ पढ़ रहे थे. बकौल अलका शुरुआत में उन्‍हें लगा था कि शारिक कोई अफ़गान रिफ्यूजी हैं. धीरे-धीरे परिचय मुलाक़ातों और मुलाक़ातें मुहब्‍बत में बदल गईं और ये सिलसिला 8 सालों तक चलता रहा. आखिरकार दोनों ने दो अलग धर्मों के बावजूद एक होने का फैसला किया. उस दौर में ये आसान काम कतई नहीं था मगर वक्‍़त के साथ सब सांचे में ढ़लता चला गया. बाद में अलका रज़ा ने पत्रकारिता की दुनिया को अपना लिया और वॉर कोरेसपोंडेंट के रूप में भी तमाम देशों में काम किया. अरे ये क्‍या ! हम तो अफ़साने की गलियों में खो गए. चलिए वापिस कमरों के मुआयने पर लौटते हैं.

क्रिस्‍टल रूम
इसी गोल्‍डन हॉल से एक रास्‍ता क्रिस्‍टल रूम में खुलता है. ये फिरोज़ी रंग की दीवारों और कांच की खूबसूरत कारीगरी से दमकता डाइनिंग हॉल है जहां खास मेहमानों को दावत दी जाती है. कुछ इसी तरह का एक कक्ष मैंने राष्‍ट्रपति भवन में देखा था जहां राष्‍ट्रपति अपने मेहमानों को भोज देते हैं. यहां का अंदाज़ भी कुछ इसी तरह का है. हां, इस कमरे में दीवारें बड़ी-बड़ी पेंटिंग्‍स से नहीं भरी हैं. मग़र दीवारें यहां भी खाली नहीं हैं. शाकिर जब इस कमरे से परिचय करा रहे थे तो मेरी नज़र दांई ओर की दीवार पर ठहर गई. यहां दुनिया के तमाम देशों और शहरों की स्मृतियों को उन जगहों से लाई गई चम्मचों के संग्रह के ज़रिए जिंदा रखा जा रहा है. छोटी-छोटी बेहद खूबसूरत कई दर्जन चम्‍मचें उन देशों के प्रतीकों के साथ यहां मौजूद हैं। है न खूबसूरत तरीका अपनी यादों को संजो कर रखने का !

यहां से निकल कर हम अंदर वाले कोर्टयार्ड में पहुंच चुके थे. इसी कोर्टयार्ड में एक दरवाज़ा यूरो रूम में खुलता है. इस कमरे में यूरोप में पोस्टिंग के दौरान खरीदी और इकट्ठा की गई चीजें शामिल हैं. जिनमें तमाम खूबसूरत फर्नीचर, तस्‍वीरें और सजावटी सामान शामिल हैं. यूरो रूम से ही एक दरवाज़ा दूसरे कमरे में खुलता है. ये जजेज रूम था. अब काजियों की हवेली में ऐसा एक कमरा होना स्‍वाभाविक ही था. छोटा मग़र आकर्षक इंटीरियर जिसकी छतों में बर्मा टीक की लकड़ी की इंटें बरगों के ऊपर लगाई गई हैं. मगर लगता ही नहीं कि छत में ईंटों का प्रयोग हुआ है. इसे बनाने वालों का हुनर ही कहा जाएगा कि इस छत से कभी पानी लीक नहीं हुआ. शारिक बता रहे थे कि ये कमरा हवेली के तमाम कमरों की तुलना में थोड़ी बेहतर हालत में उन्‍हें मिला था. सो उसमें से जो भी बचा सके उसे हवेली के पुननिर्माण में काम में लेने की कोशिश की गई.

एक सिगार पीने के लिए माफि़क कमरे की झलक देने वाला टी-रूम है जहां जहां बैठकर घंटों सिगार के कश भरते हुए बहस-मुबाहिसे किए जा सकते हैं. मगर क्‍योंकि ये टी-रूम है सो चाय पर चर्चाओं से किसने मना किया है. इसी कमरे के पास से एक दरवाज़ा बाग़-ए-बहिश्‍त यानि कि Garden of Heavens में खुलता है. इस वक्‍़त रात हो चुकी थी. मगर वाक़ई यहां पेड़ों और पौधों के बीच शांति में स्‍वर्ग का ही अहसास हो रहा था. शारिक साहब और हम लोग देर तक बाग़ में खड़े होकर हवेली के रेस्‍टोरेशन और निर्माण के दिलचस्‍प किस्‍सों को सुनते रहे. यहां हर बात एक अफ़साना थी. शाकि़र अगले रोज़ ग़ज़ल रूम और ड्राईंग रूम से परिचय कराने का वायदा कर लौट गए और हम सब भी अपनी-अपनी ख्‍वाबगाहों में लौट आए.

मेहमानों के खास 6 कमरे
इस वक्‍त हवेली के कुल 6 कमरे मेहमानों के लिए खोले गए हैं जहां आप आकर ठहर सकते हैं. इनमें मुख्‍य कोर्टयार्ड में प्रिंसेस रूम है और ऊपर पहली मंजिल पर अफ्रीका लॉन्‍ज में खुलने वाले राइडर्स रूम और हंटर रूम. आपको बर्मा लॉंज याद होगा. ये अफ्रीका लॉन्‍ज ठीक बर्मा लॉन्‍ज के ऊपर ही है. इसी मंजिल पर पीकॉक रूम और पर्ल रूम भी मौजूद हैं. मिसेज रज़ा ने हम सब मेहमानों को अपने कमरे चुनने की पूरी आज़ादी दे दी थी और मेरा दिल पीकॉक रूम पर जाकर ठहर गया. इस कमरे में अंदर दीवारों पर गहरा इंडिगो रंग और दीवारों पर उभरी डिजाइनों में चटख लाल, पीला और सुनहरा रंग आस-पास मोर की मौजूदगी का अहसास कराते हैं. हर छोटी-छोटी चीज का बारीकी से ख्‍याल रखा गया है. अब कमरे में से एक और बेहद खूबसूरत दरवाजा नज़र आ रहा था. ये कमरे से अटैच बाथरूम था जो कमरे की साज-सज्‍जा के अनुरूप ही था.
हंटर्स रूम
तमाम कमरों की लंबी यात्रा के बाद भूख लग चुकी थी. कोर्टयार्ड में टेबल लग चुकी थी और टेबल पर मुग़लिया दौर से पहले के समय का भोजन हमारा इंतज़ार कर रहा था. मुग़लिया दौर से पहले का इसलिए क्‍योंकि इसमें पिसे मसालों की जगह खड़े मसालों का ही प्रयोग किया गया था. एकदम घरेलू और लजीज़ खाने के बाद तय कार्यक्रम के अनुसार योगा एक्‍सपर्ट रितु सुशीला कृष्‍णन लाइफ स्‍टाइल करेक्‍शन पर चर्चा करने वाली थीं सो पूरी मंडली बर्मा लॉन्‍ज में आ जमी. मगर हम अभी योग की उस दुनिया में प्रवेश नहीं करेंगे. इस रात की योग पर चर्चा और अगली सुबह योग के ण्‍क शानदार सत्र के बारे में हम अगली पोस्‍ट में बात करेंगे.
ज़रा देखें कैसे बनता था मुग़लों से पहले खाना
चलिए कुछ मीठा हो जाए
नाम शिक़वा हवेलीही क्‍यों ?
जानते हैं शिक़वा हवेली का नाम शिक़वाक्‍यों रखा गया? इसकी भी एक कहानी है. दरअसल बचपन में शारिक की शिकायतों और शिक़वों का कोई अंत नहीं था. वे कभी इसकी तो कभी उसकी शिकायतें अपनी मां से करते रहते. सो उनकी अम्‍मी प्‍यार से उन्‍हें शिक़वा मियां कहकर बुलाने लगीं. जिसे अब तक काजियों की हवेली के नाम से जाना जाता था वो अब इन मासूम से शिक़वों के कारण शिक़वा हवेली हो गई है. अब तक मेरे ज़ेहन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था कि दुनियां की तमाम रौनकें और आला दर्जे की नौकरी के अनुभवों को सीने में संजोए ये परिवार शहरी सभ्‍यता से दूर इस गांव में कैसे अपनी जिंदगी बिता रहा है? गांव की छोटी और सीधी सी दुनिया इनकी पुरानी दुनिया और समाज से काफ़ी अलग है. इसका जवाब मुस्‍कुराते हुए खुद शारिक देते हैं कि, ‘हमें समाज को ढूंढने की ज़रूरत नहीं पड़ती. जब-तब समाज ही उठ कर हवेली तक आ जाता है. जैसे आप लोग आए हैं ऐसे ही तमाम लोग यहां आते हैं. हम नए लोगों से मिलते हैं और उनसे बातें करते हैं जिंदगी सुकून और चैन से गुज़रती है. और जब ज़रूरत होती है तो दिल्‍ली तो दरवाज़े पर खड़ी ही है’.

यही नहीं रज़ा परिवार द्वारा गांव में किए जा रहे सामाजिक कामों की लंबी फेहरिस्‍त है जिसमें लड़कियों के लिए शौचालयों का निर्माण, मेडिकल कैंप का आयोजन, ज़रूरतमंद औरतों को कानूनी मदद, लड़कियों के लिए सिलाई प्रशिक्षण, ब्‍यूटी पार्लर का प्रशिक्षण, गावं के बच्‍चों के लिए होमवर्क सपोर्ट प्रोग्राम आदि. मिसेज रज़ा का कहना था कि सिलाई का प्रशिक्षण लड़कियों के लिए बहुत ज़रूरी है क्‍योंकि अगर किसी लड़की को कुछ न आता हो मगर सिलाई आती हो तो वो जिंदगी के थपेड़ों को झेल जाएगी. पिछले आठ सालों में गांव की महिलाओं और लड़कियों ने धीरे-धीरे बाहर निकलना शुरू किया और गांव में धीरे-धीरे पर्दा कम होना शुरू हो गया है. गांव की औरतें आज भी सलाह और मशविरे के लिए हवेली आती हैं. 
कपड़ों की जादूगरी और महिलाओं का सशक्तिकरण
इसके अलावा हवेली की बैठक गांव की कुछ महिलाओं और लड़कियों को हाथ से कपड़े तैयार करने की जगह देती है जहां हवेली में आने वाले मेहमान इन खूबसूरत मेजपोश, टेबल स्‍प्रेड, बेड स्‍प्रेड, कुशन, चादरों, रुमालों आदि को खरीद सकते हैं. यही नहीं अलका जी समय-समय पर इन महिलाओं को दिल्‍ली में यूएन और ब्रिटिश स्‍कूल में उनके सामानों की बिक्री के लिए ले जाती हैं. आखिरी दिन हवेली छोड़ने से पहले हमने हवेली के इस कमरे को भी नज़र किया. यहां बरामदे में गांव के बच्‍चों को पढ़ाने का काम चल रहा था तो अंदर रंग-बिरंगे कपड़ों की दुनिया सजी थी. मैं हैरान था कि एक इंसान एक साथ आखिर कितने काम कर सकता है. ये हवेली सही मायनों में गांव का सहायता केंद्र बन गई है. मैं भी याद के तौर पर अपने घर के लिए कुछ कुशन और टेबल स्‍प्रेड खरीद कर लाया हूं जो मुझे हमेशा काठा की इस हवली की याद दिलाते रहेंगे.
होमवर्क सपोर्ट प्रोग्राम
क्‍या आप कुछ वक्‍़त गुज़ारना चाहेंगे शिक़वा के आगोश में ?
यदि आप भी शहरों के बहरा कर देने वाले शोर से दूर सुकून भरा कुछ वक्‍़त गुज़ारना चाहते हैं तो दिल्‍ली की सरहद के पार ये हवेली आपका इंतज़ार कर रही है. मग़र हवेली की एक शर्त है. आपको समझना होगा कि ये होटल नहीं है जहां सब कुछ हमारी मर्जी के मुताबिक ही मिलेगा और हो-हल्‍लड़ की आजादी होगी. याद रखिए कि ये किसी का घर भी है इसीलिए इसे होमस्‍टे कहा गया है. और ये कोई मामूली घर नहीं है इसलिए अपने मेहमानों से भी थोड़ी सी संजीदगी की अपेक्षा रखता  है. यहां आने का कार्यक्रम बनाने से पहले कुछ बातों को तोल लें. यहां इंटरनेट के सिग्‍नल आते हैं मगर कमज़ोर हैं. यहां न किसी कमरे में टी.वी. है और न ही हवेली के आस-पास कोई और देखने लायक जगह. बस हवेली के अंदर की दुनिया है. बेहतर हो चार-छह लोग एक साथ यहां का कार्यक्रम बनाएं. फिर अलग ही मज़ा होगा. 

यदि आप रज़ा परिवार की इस मेहनत और उनके सपनों के इस घर को समझने के लिए यहां रुकना चाहते हैं तो आप shikwakatha@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।


कुछ और तस्‍वीरों के ज‍़़‍रिए सैर करिये हवेली की  
शाकिर रज़ा और उनके सिविल इंजीनियर भाई

हर चीज हैरत से भरी है...ज़रा बताइए कि वो क्‍या है 

अफ्रीका लॉन्‍ज 

टी-रूम की कहानी रज़ा साहब की जुबानी

इनर कोर्टयार्ड

काठा की बिरयानी 

और ये था किंग्‍स रूम यानि कि मेरा कमरा

मेरे कमरे से अटैच बाथरूम 


शाम-ए-शिक़वा
अब कैसे न हैरान हो जाएं इस दरवाजे की खूबसूरती पर 
और हम यहीं अटक कर रह गए

नोट: यह यात्रा अक्‍तूबर, 2018 में की गई थी। 

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