यायावरी yayavaree

Tuesday, 28 January 2020

जब नाथु-ला पास बना जी का जंजाल और सेना ने किया रेस्‍क्‍यू


अक्सर पहाड़ों पर यात्रियों के बर्फबारी में फंसने और रेस्क्यू ऑपरेशन द्वारा निकाले जाने की ख़बरें अखबारों और टीवी में पढ़ता-सुनता आया हूँ. लेकिन ये सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी हम भी ऐसे ही फंस जाएंगे. दार्जिलिंग-गंगटोक यात्रा के तीसरे दिन यानि 27 दिसम्बर, 2019 की शाम भारत-चीन सीमा यानि नाथू ला दर्रे की यात्रा से लौटते वक़्त हमारे साथ कुछ ऐसा ही हुआ. दिन की शुरुआत अच्छी खासी खिली हुई धूप के साथ हुई तो खराब मौसम की एक प्रतिशत भी संभावना नज़र नहीं आ रही थी. हम लोग दिन में 12 बजे के आस-पास 14140 फीट की ऊंचाई पर नाथू ला दर्रे तक पहुंच गए. बेशक अब तापमान माइनस 10 डिग्री था, दर्रे के रास्ते में छांगू या कहिए सोगमो झील पूरी तरह जम चुकी थी, बॉर्डर पर ऑक्सीजन की कमी से सांस लेने में ज़ोर लग रहा था, लेकिन चमकती धूप बराबर हौसला बनाए हुए थी. हम जैसे-तैसे नाथू ला के शिखर तक पहुंचे, भारत और चीन के बॉर्डर पर कुछ वक़्त बिताया और फिर धीरे-धीरे नीचे लौट आए. परिवार के लिए तो यही माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई हो गई थी. सूरज अभी भी उन बर्फीली हवाओं से संघर्ष करते हुए हमारा हौसला बनाए हुए था. लेकिन पहाड़ तो पहाड़ ठहरे, पल भर में मिजाज़ बदल जाता है इनका. 

Nathu la Pass at China Border
लेकिन जैसे ही गाड़ी में सवार हुए हल्की-हल्की बर्फ गिरनी शुरू हो गई. ड्राइवर ने शोर मचाना शुरू कर दिया. नाथू ला से वापसी में इस गिरती बर्फ के बीच कुछ वक़्त छांगू लेक (Tsogmo Lake) पर बिताया. अब उस जमी हुई झील को निहारने के सुख को कैसे छोड़ते भला. हज़ारों लोगों की तरह हमें भी लगा कि ये बर्फबारी थोड़ी देर में रुक जाएगी. लेकिन ये लगातार बढ़ती रही. अब ड्राइवर ने हमें डराने वाली ख़बर दी कि छांगू से कुछ किलोमीटर नीचे और ज्यादा बर्फ गिर रही है. हम फुर्ती से गाड़ी में सवार हो गए और अब गैंगटोक की तरफ़ गाड़ी की रफ़्तार बढ़ गई. हम जल्द से जल्द उस इलाके को पार कर लेना चाहते थे. सड़क पर गिरती बर्फ ऐसी लगी जैसे ऊपर से रुई की गोलियां बरस रही हों. इधर ड्राइवर ने बताया कि पिछले साल 28 दिसम्बर को भी इसी तरह भारी बर्फ गिरी थी और हज़ारों लोग यहां 2 दिन तक फंस गए थे. बात करते-करते बर्फ गिरने की रफ्तार और बढ़ी. मैंने इतना खूबसूरत मंज़र पहले कभी नहीं देखा था. चंद मिनटों में हर चीज सफेद हुई जा रही थी. मन इस दृश्य को देख बेहद खुश भी था मग़र दिल की धड़कनें लगातार बढ़ रही थीं.
कुछ इस तरह िबिगड़ना शुरू हुआ मौसम का मिजाज़ 



इसी स्‍नो-फॉल के बीच हम धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ते रहे. लेकिन जल्‍द ही वो क्षण भी आ गया जब गाड़ी का चलना मुश्किल हो गया और ड्राइवर को मजबूरन गाड़ी रोकनी पड़ी. हमारी दाईं तरफ एक छोटा सा ढ़ाबा नज़र आ रहा था जहां पहले से ही 50-60 लोग खड़े थे. मैंने गाड़ी के अंदर से अंदाजा लिया तो तकरीबन 15 से 20 गाडि़यां आस-पास खड़ी थीं. आगे न बढ़ने का सबसे बड़ा कारण कोई 200 मीटर बाद एक तीखी ढ़लान पर सड़क के मोड़ का होना था. ऐसे में गाड़ी आगे लेकर जाने का मतलब मौत से पंजा लड़ाना था. हमारे पास इंतज़ार के अलावा कोई विकल्‍प नहीं था. अब तक भूख भी लग चुकी थी. ढ़ाबा सामने था और दूर से मैगी बनती दिख रही थी. गाड़ी के बाहर भीषण ठंड भी हिम्‍मत तोड़ रही थी और डर था कि अगर गाड़ी से उतर कर मैगी खाने गए और इधर गाडियां चल पड़ीं तो हमारी गाड़ी के पास आगे बढ़ने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं होगा. सो बैठे रहे. पूरी उम्‍मीद थी कि अभी बर्फ गिरना बंद होगी और हम आगे बढ़ जाएंगे. लेकिन अगले दस-पंद्रह मिनट तक गाड़ी एक इंच भी नहीं सरकी. सो मैगी का आदेश दे दिया. ढ़ाबे को कुछ महिलाएं चला रही थीं. अचानक इतने सैलानियों को अपने ढ़ाबे में देख उनके चेहरे पर अजीब सी चमक और हाथों में ग़ज़ब की फुर्ती आ गई थी. 5-7 मिनट बाद गरमागरम मैगी का बाउल हाथों में आया ही था कि बाहर गाडियों में हलचल शुरू हो गई. किसी ने कहा कि रास्‍ता खुल गया है. बस फिर क्‍या था...भागते भागते वो गरम-गरम मैगी जल्‍दी–जल्‍दी खाई. जिंदगी में इतनी बेरहमी से मैगी कभी नहीं खाई. 2 मिनट में सभी आकर गाड़ी में बैठ गए. गाड़ी कोई 10 कदम चली होगी कि फिर रुक गई. अब तक बर्फ गिरनी बंद हो चुकी थी. इसलिए ये यकीन और पुख्‍़ता हो गया था कि अब तो रास्‍ता खुल ही जाएगा. लेकिन गाडियां थीं कि अब भी आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं. लोग बता रहे थे कि फौज रास्‍ता खोलने की कोशिश कर रही है. हम इधर उधर टहलते हुए बस इंतजार ही करते रहे. इस इंतज़ार में आधा घंटा और निकल गया.
भूखे मुसाफिरों के लिए राहत की सांस बना ये ढ़ाबा 

इधर धीरे-धीरे शाम गहराने लगी और कुछ ही देर में ड्राइवर ने वो कहा 
13 माइल पर फंसे वाहन
जिसे सुनकर हमारे पैरों के नीचे से पूरा पहाड़ ही निकल गया था. ड्राइवर ने कहा कि
‘’अब गाड़ी आगे नहीं जा पाएगी. बर्फ अगले 5 किलोमीटर तक गिरी है. आपको या तो 4-5 किलोमीटर पैदल नीचे जाकर गैंगटोक से कोई गाड़ी बुलानी पड़ेगी या फिर रात यहीं गुज़ारनी होगी’’. हम एक बार फिर गाड़ी से उतर कर कुछ दूर आगे जाकर जायजा लेकर आए. सब कुछ जैसे एक ही जगह ठहर गया था. दूर तक चांदी सी बिखरी बर्फ और गाडियों की मद्धम हैड या टेल लाइटों के अलावा कुछ नज़र नहीं आ रहा था. हमारे पास दो ही विकल्‍प थे. या तो ड्राइवर की बात मान कर इस फिसलन भरे रास्‍ते पर 5 किलोमीटर तक पैदल चलें या फिर पूरी रात गाड़ी में गुज़ारें. हम इस इमरजेंसी के लिए भी तैयार थे. मैगी हम खा ही चुके थे और पूरा बैग भर कर गज़क, ड्राई फ्रूट, चॉकलेट, लड्डू आदि साथ थे. कम से कम भूखे मरने की नौबत नहीं आने वाली थी. लेकिन तभी आस-पास के लोगों ने कहा कि यहां रात को और बर्फ गिरेगी. ढ़ाबे को चला रही महिलाएं भी ढ़ाबा बंद कर अपने घर के लिए निकल लीं. मतलब साफ था कि इस बर्फीले बियाबान में रात को रुकना भी खतरे से खाली नहीं था. एक पल को दिमाग सुन्‍न हो गया. क्‍या सही होगा और क्‍या ग़लत....कुछ समझ नहीं आ रहा था.
जब तक मुसीबत का अहसास नहीं हुआ तब तक खूब हुई मस्‍ती

मैंने गंगटोक में ट्रैवल एजेंसी को फोन लगाने की कोशिश की. मगर वोडाफोन और जियो दोनों के नेटवर्क गायब थे. ड्राइवर के पास बीएसएनएल का फोन था, बड़ी मुश्किल से ट्रैवल एजेंसी में फोन लगा मगर उधर बैठे आदमी ने भी कोई गाड़ी भेजने में असमर्थता जताई और सारी गाड़ियों के यहीं फंसे होने या ट्रिप के बीच में होने की बात कही. इधर ड्राइवर ने गाड़ी साइड लगा उसे तिरपाल से ढक दिया और कहा कि वह पैदल नीचे जा रहा है. उधर बहुत से लोग अभी भी गाड़ियों में थे. अब तक बर्फ गिरनी बन्द हो चुकी थी, कुछ ही देर में हमें कुछ फौजी नज़र आए जो रास्ते पर जमी बर्फ को काट रहे थे और गाड़ियों को निकालने में मदद कर रहे थे.  लेकिन ड्राइवर अभी भी गाड़ी लेकर आगे बढ़ने के पक्ष में नहीं था. 



उस वक्‍़त जेहन में किस-किस तरह के ख्‍याल आ रहे थे...मैं बता नहीं सकता. हमारे साथ जो अच्‍छी बात थी, वही सबसे खराब बात थी. अच्‍छी बात थी कि हम अकेले नहीं थे. तीन परिवार साथ होने के कारण 6 बड़े और एक बच्‍चा यानि कुल 7 लोग एक साथ थे और खराब बात भी यही थी इन 7 लोगों में तीन महिलाएं और एक बच्‍चा भी था. हमारा एक गलत फ़ैसला हम सबकी जि़ंदगी पर भारी हो सकता था. आप सोच रहे होंगे कि इस वक्‍़त वहां फंसे बाकी लोग क्‍या कर रहे थे. तो साहब बाकी में से अधिकांश लोग भाग्‍यशाली थे कि उनके ड्राइवर धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ रहे थे. उन्‍होंने अपने यात्रियों को हमारी तरह बीच रास्‍ते में नहीं छोड़ा था. लेकिन कुछ और लोग हमारी तरह बदकिस्‍मत थे. वे अब तक पैदल निकल चुके थे. हालांकि बात तो ड्राइवर की भी सही थी. उस फिसलन भरे रास्ते पर कुछ भी हो सकता था. ब्रेक न लगने पर गाड़ी फिसलते हुए सीधे खाई में जा सकती थी. कुछ देर पहले एक गाड़ी ढलान से कुछ नीचे सरक भी चुकी थी. इसका मतलब था कि जो गाड़ियां चल रही थीं वो लोग रिस्क ही ले रहे थे. वो मोड़ वाकई ख़तरनाक था. लेकिन ड्राइवर चाहता तो हमें वहां से उतार कर खाली गाड़ी को निकाल सकता था. लेकिन अब वो भी जिद पर आ चुका था कि गाड़ी नहीं चलानी तो नहीं चलानी. 

उस वक्‍़त हम सभी ने सामूहिक रूप से यही विचार किया कि ड्राइवर को साथ लेकर पैदल ही आगे बढ़ते हैं. कम से कम वो उस रास्ते से अच्छी तरह वाकिफ़ तो था. यही करने की कोशिश भी की. लेकिन हम लोग बमुश्किल 100 मीटर आगे बढ़े होंगे कि सेना के एक जवान ने पैदल चलते देख हमें टोक लिया. पूछताछ करने पर हमने सारा वाकया बता दिया. उस फौजी ने बताया कि फौज के जवान आगे पूरे रास्‍ते पर मुस्‍तैदी से काम कर रहे हैं और रास्‍ता एसयूवी के चलने लायक हो चुका है. फौजी ने हमारे ड्राइवर को भी हडकाया और उसे गाड़ी लेकर आने के लिए कहा. ड्राइवर फौजी से ही उलझ गया कि अगर कोई रिस्‍क हुआ तो क्‍या आप लिख कर देंगे कि जिम्‍मेदारी आपकी है. अब लिखित जिम्‍मेदारी कौन लेता है? हम लोगों ने एक बार फिर आगे बढ़ना शुरू किया. थोड़ा आगे बढ़ने पर फिर कुछ जवान मिले जिन्‍होंने ड्राइवर को थोड़ा हौसला दिया तो थोड़ी घुड़की. उन्‍होंने उसे समझाया कि रास्‍ता खोला जा रहा है सो वो वापिस जाकर गाड़ी लेकर आए. ड्राइवर गाड़ी लेने के लिए वापिस लौट गया और हमने आगे बढ़ना जारी रखा. सड़क की फिसलन लगातार बढ़ती जा रही थी. एकदम चिकनी हो चुकी बर्फ पर आखिर चलें तो कैसे चलें? इस बार भी फौजी भाईयों ने हमारी मदद की. सड़के के साइड में गिरी बर्फ अभी भी कुछ नर्म थी और पूरी तरह जमी नहीं थी. इसलिए किनारों पर चलना शुरू किया. गिरते-पड़ते हम लोगों के हाथ थाम कर उन्‍होंने जैसे-तैसे हमें कोई 200 मीटर आगे कैंप तक पहुंचाया. रास्‍ते में उन्‍होंने हमें तसल्‍ली दी कि, आप लोग बिल्‍कुल निश्चिंत रहें, ये ड्राइवर लोग जान-बूझकर लोगों को यहां छोड़ देते हैं क्‍योंकि ये जानते हैं कि आखिर में फौज मदद ज़रूर करेगी. एक फौजी रास्‍ते भर बड़बड़ाता रहा कि ये लोग नाथू ला की ट्रिप के लिए लोगों से 6000 से 8000 रु. तक लेते हैं और जब मुसीबत आती है तो सबसे पहले भाग खड़े होते हैं. कैंप के गेट पर आठ-दस फौजी और तैनात थे. हमारा मामला सुन उन्‍होंने हमें वहीं इंतज़ार करने के लिए कहा. रात गहरा चुकी थी और बर्फ की ठंडक की चुभन छह-छह गरम कपड़ों की तह में भी हड्डियों में महसूस हो रही थी ऊपर से इस संकट से निकल पाने की अनिश्चितता. अब तक बेटे ने रोना शुरू कर दिया था, शायद हालात की नज़ाकत को वो भी भांप चुका था. हमारा कोई दिलासा, कोई गोदी, कोई बात उसे चुप नहीं कर पा रही थी. बच्चा तो बच्चा ही होता है आखिर. मैं सोच रहा था कि जो लोग और छोटे बच्चों के साथ हमसे कई किलोमीटर फंसे हैं उनका क्या हाल हो रहा होगा? बच्चे को रोता देख एक फौजी भाई न जाने कहाँ से एक स्टील के गिलास में गर्म पानी ले आए. बोले कि बच्चे को राहत मिलेगी. लेकिन एक घूँट से ज्यादा रचित ने पानी भी नहीं पिया. हम सुरक्षित खड़े थे लेकिन आगे क्या होगा...हमें कोई अंदाज़ा नहीं था. हर गुज़रता लम्‍हा बहुत धीरे-धीरे गुज़र रहा था.

बीस-पच्‍चीस मिनट गुज़र गए मगर ड्राइवर नहीं लौटा. हमें भी अब उसके लौटने की उम्‍मीद नहीं रही. लेकिन फौजी तो फौजी थे. ड्राइवर का भरोसा उठते ही उन्‍होंने हमसे हमारी गाड़ी का नंबर और ड्राइवर की डिटेल लीं. वायरलैस पर कहीं संपर्क कर हमारी गाड़ी और ड्राइवर को खोजने के निदेश जारी किए गए. फिर 5 से 7 मिनट बाद वायरलैस पर रिपोर्ट आई कि गाड़ी हमारी बताई जगह पर खड़ी है मगर ड्राइवर नदारद है. ये फौजियों के लिए भी हैरानी भरी ख़बर थी, चूं‍कि जहां गाड़ी खड़ी थी वहां से वापिस नाथू ला की तरफ और यहां चैक पोस्‍ट की तरफ आने वाले दो रास्‍तों के अलावा और कोई रास्‍ता था ही नहीं. तो क्‍या ये समझा जाए कि ड्राइवर गाड़ी को वहीं छोड़ ऊपर नाथू ला की ओर निकल गया? उस वक्‍़त कुछ भी नहीं कहा जा सकता था. ये मामला शायद फौज के बड़े अधिकारियों तक पहुंचा होगा कि तभी अचानक एक जिप्‍सी हमारे पास आकर रुकी. मौके पर खड़े जवानों ने जिप्‍सी की आगे वाली सीट पर बैठे अफसर को सेल्‍यूट किया. स्‍पष्‍ट था कि कोई फौज का वरिष्‍ठ अधिकारी था. हम सभी को उस जिप्‍सी में बैठाया गया. हमें कहा गया कि जिप्‍सी आपको नीचे शहर तक छोड़ेगी. जिप्‍सी में आगे की सीट पर बैठा फौजी अफसर लगातार अपने मोबाइल से अपने किसी बड़े अधिकारी को लगातार रिपोर्ट दे रहा था कि 13 माइल से लेकर 3 माइल तक के रास्‍ते पर जवान रास्‍ता खोलने की कोशिश कर रहे हैं, रास्‍ते में बर्फ पर नमक का छिड़काव किया गया है, रास्‍ते में गांव के लोगों की भी मदद ली जा रही है, सभी गाडियों को धीमी रफ्तार में निकाला जा रहा है, लगभग 30 से 35 वाहन 3 माइल से पीछे हैं. बाद में मुझे पता चला कि ये 60 इंजीनियर्स के कैप्‍टन विशाल थे जो 13 माइल से 3 माइल तक के एरिया के इंचार्ज थे और उन्‍हें इस स्‍ट्रैच में फंसे यात्रियों को बाहर निकालने के ऑर्डर्स ऊपर से मिले थे. ऐसी स्थिति में सेना किस तरह से रेस्‍क्‍यू ऑपरेशन करती है, हम बहुत करीब से देख रहे थे. इधर कैप्‍टन विशाल के मोबाइल पर बीच-बीच में हमारे ड्राइवर को खोजे जाने के बारे में रिपोर्ट आ रही थीं. जिप्‍सी में ब्‍लोअर चल रहा था जिसकी गरमी हमें तो राहत दे ही रही थी मगर सबसे ज्‍यादा सुकून बेटे को मिला कि वो चैन से सो गया.

हम जिप्‍सी से बाहर देख रहे थे कि सड़क पर दर्जनों गाडियां सड़क की साइड में खड़ी हैं. मैंने देखा कि हर दस-बीस कदम पर सेना के जवान हाथ में कुदाल और फावड़ा लिए सड़क पर जमी बर्फ को काटने की कोशिश में जुटे हुए हैं. कहीं-कहीं कुछ गांव वाले भी उनकी मदद करते नज़र आए. बाहर का नज़ारा डराने वाला था. इस सड़क पर 5 किलोमीटर चल कर जाना न केवल बेवकूफाना फैसला होता बल्कि जान पूरी तरह जोखिम में होती.कोई 20 मिनट बाद हम थर्ड माइल के चैक पोस्‍ट पर थे. इधर कैप्‍टन विशाल को ख़बर मिली कि हमारी गाड़ी और ड्राइवर को लोकेट कर लिया गया है. कैप्‍टन ने जवानों को फोन पर निदेश दिया कि ड्राइवर का थर्ड माइल पहुंचना सुनिश्चित किया जाए. कैप्‍टन विशाल को अब एक बार फिर 13 माइल तक के स्‍ट्रैच को चेक करके आना था सो उन्‍होंने हमें वहीं उतारा और गेट पर खड़े जवानों को निदेश दिया कि बच्‍चे और महिलाओं को चेकपोस्‍ट के अंदर बिठाया जाए. उस छोटी सी गुमटी नुमा चेक पोस्‍ट के भीतर हीटर जल रहा था जिससे महिलाओं और बच्‍चे को फिर से सुकून का अहसास हुआ. मैंने कैप्‍टन विशाल का शुक्रिया अदा किया तो वे मुस्‍कुराते हुए पलट कर बोले कि कोई बात नहीं. लेकिन ये एडवेंचर आपको याद रहेगा. फिर हम तीनों मित्र जवानों के साथ चेक-पोस्‍ट पर अपनी गाड़ी का इंतज़ार करने लगे. हम जानते थे कि अब ड्राइवर के पास कोई विकल्‍प नहीं बचा है और उसे इसी रास्‍ते से आना होगा. अगले 10 से 12 मिनट तक इस चेक पोस्‍ट से गुजरने वाली हर गाड़ी को रोक कर चेक किया गया. इस इंतजार के दौरान वहां खड़े जवानों से हल्‍की–फुल्‍की बातें होती रहीं.

जवानों ने हमें बताया कि पिछले साल यहां लगभग 3000 लोग फंस गए थे और हमने उन्‍हें अपने कैंपों में ठहराया था. ये हमारे लिए हैरानी भरा था कि क्‍या वाकई सेना के पास वहां इतने इंतजाम हैं कि वे अचानक आए 3000 लोगों को रात में ठहरा सकें. एक जवान ने बताया कि सर, यहां पूरा इंतजाम हैं. हम लोग चीन बॉर्डर पर हैं. जाने कब हालात बदल जाएं और अतिरिक्‍त फौज को यहां तैनात करना पड़ जाए. इसलिए पूरा इंतजाम रखते हैं. आखिर में हमें हमारी गाड़ी नज़र आई. हम सभी को गाड़ी में बैठाया गया. गाड़ी पहले गियर में धीमे-धीमे आगे बढ़ती रही. अभी भी आगे तकरीबन पांच किलोमीटर पर सड़क पर फिसलन थी. लेकिन सभी गाडियां धीरे-धीरे आगे बढ़ती रहीं. गंगटोक की तरफ पहले चेकपोस्‍ट पर जहां बर्फ और फिसलन ने हमारा पीछा छोड़ा...हमारी सांस में सांस आई. गंगटोक पहुंचते-पहुंचते हमें रात के 9 बज गए. दिमाग सुन्‍न था... और दिन भर में जो कुछ गुज़रा हमें किसी फिल्‍म या सपने जैसा ही लग रहा था.

अगली सुबह तक ये घटना दिल्‍ली के अखबारों तक भी पहुंच चुकी थी. एक करीबी मित्र जानते थे कि हम लोग पिछले दिन नाथुला गए थे सो अखबार की ख़बर देख उन्‍होंने अखबार की ख़बर का वाट्सएप्‍प भेजा. ख़बर के मुताबिक पिछली रात 300 गाडियां और 1700 लोग वहां फंसे थे. बात सही थी. क्‍योंकि हमारे होटल के ही बहुत से गेस्‍ट पूरी रात नहीं लौटे थे. दरअसल 17 माइल से पीछे फंसे लोगों को रात में नहीं निकाला जा सका. इन सभी 1700 लोगों को रात आर्मी कैंप में ही गुज़ारनी पड़ी और अगले दिन सुबह 10 बजे तक ही निकाला जा सका. कुछ न्‍यूज़ पोर्टल पर आई ख़बरों में कैंपों की तस्‍वीरें नुमाया थीं. चेहरे खुश नज़र आ रहे थे. यकीनन फौज ने हर संभव मदद की होगी. फौज का जितना भी शुक्रिया अदा किया जाए वो कम ही होगा. फौजी भाई उस वक्‍़त हम सबके लिए देवदूत बनकर आए थे. ईश्‍वर उन सभी को उन कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए और शक्ति प्रदान करें और उनके परिवारों को हर संभव खुशियां अता करें. जवान सीमा पर खड़ा है, इसलिए न केवल हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं बल्कि सीमाओं के भीतर हम और हमारे परिवार भी सुरक्षित हैं. जय जवान, जय हिंद !

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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 


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Friday, 31 May 2019

केरल का नियाग्रा: अथिरापिल्‍ली वाटर फॉल



कुछ समय पहले आई फिल्‍म बाहुबली के वो झरनों के दिल को चुरा लेने वाले दृश्‍य तो हम सभी को याद होंगे. ऐसे ऊंचे और भव्‍य जल प्रपात देखकर एक बारगी लगा था कि या तो ये दृश्‍य किसी विदेशी लोकेशन पर फिल्‍माया गया है या फिर कंप्‍यूटर की कलाकारी है. लेकिन आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि ये बेहद खूबसूरत वाटर फॉल भारत में ही है. दरअसल फिल्‍म में दिखाए गए दृश्‍य केरल में त्रिचुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित चालाकुडी नदी पर मौजूद अथिरापिल्‍ली और वाझाचल वाटर फॉल के हैं जो केरल के सबसे बड़े वाटर फॉल में शुमार हैं. अपनी खूबसूरती और ऊंचाई के कारण ही अथिरापिल्‍ली को केरल का नियागरा भी कहा जाता है. ये जानना दिलचस्‍प था कि यहां केवल बाहुबली ही नहीं बल्कि दिल से और गुरू जैसी लोकप्रिय बॉलीवुड फिल्‍मों की भी शूटिंग हो चुकी है. फिल्‍म दिल से का जिया जले...जान जलेवाला मधुर गीत भी यहीं फिल्‍माया गया है. विख्‍यात तमिल फिल्‍म निर्देशक मणिरत्‍नम का तो इस जगह से खास लगाव रहा है इसलिए उनकी तमाम तमिल फिल्‍मों की शूटिंग यहां हुई है. उनकी फिल्‍म Raavanan की तो पूरी शूटिंग ही इसी जगह पर हुई है. ये जगह है ही नैसर्गिक सौंदर्य से भरी हुई.
कुछ दिनों पहले कोच्‍ची-त्रिचूर-मुन्‍नार की यात्रा के दौरान किसी काम के सिलसिल में त्रिचूर जाना हुआ तो वहां स्‍थानीय लोगों ने सुझाव दिया कि यहां तक आए हैं तो अथिरापिल्‍ली वाटर फॉल ज़रूर देखिए. उस वक्‍़त शाम के 3.15 हो चुके थे. पिछले दो दिनों से एक स्‍थानीय ड्राइवर सिंडो हम लोगों के साथ था. सो  सिंडो से बात की तो उसने कहा कि कि अब देर हो चुकी है और फॉल तक पहुंचना मुश्किल है क्‍योंकि ये फॉल एक वन क्षेत्र का हिस्‍सा है जिसकी एंट्री शाम 4.45 पर बंद हो जाती है. लेकिन फिर अचानक न जाने उसे क्‍या सूझी और बोला कि जल्‍दी से गाड़ी में बैठिए मैं पहुंचा सकता हूं आपको. बस फिर क्‍या था अगले डेढ़ घंटा हम सड़क के साथ रेस लगाते रहे. एक नज़र घड़ी पर थी तो दूसरी गूगल मैप पर. हमने हाइवे पर 100 की रफ़्तार से आगे बढ़ना शुरू किया और जल्‍द ही गूगल मैप के अंदाजे से आगे चल रहे थे. लगने लगा था कि समय से 20 मिनट पहले ही पहुंच जाएंगे. तभी सिंडो ने बताया कि गाड़ी में तेल खत्‍म होने वाला है इसलिए पहले तेल डलवाना होगा. हमने उस दोपहर लंच नहीं किया था. लेकिन फॉल तक पहुंचने के उत्‍साह में भूख के साथ समझौता कर लिया. लेकिन गाड़ी कहां ये समझौता करने वाली थी. रिज़र्व की लाइट लाल हो चुकी थी. थोड़ी देर में एक पेट्रोल पंप पर तेल डलवाया. उम्‍मीद थी कि ज्‍यादा से ज्‍यादा 5 मिनट में काम हो जाएगा. लेकिन यहां लगे कम से कम 12 मिनट. एक बार फिर रोड़ पर उतरे तो मैप और हमारे टारगेट में केवल 6 मिनट का अंतर चल था और मंजिल 35 किलोमीटर दूर थी. मतलब ये था कि ज़रा भी कहीं चूक हुई तो हमें उतनी दूर जाकर भी खाली हाथ लौटना पड़ेगा. एक बार लगा कि समय पर नहीं पहुंच पाएंगे तो काफी वक्‍़त बबार्द होगा. ड्राइवर से एक बार और अपने मन की शंका साझा की. मगर सिंडो निश्चिंत था. बोला कि सीट बेल्‍ट बांध लीजिए. यहां से सिंगल रोड़ शुरू हो गई थी और ट्रैफिक आमने-सामने और इधर गाड़ी 100 से ऊपर बात कर रही थी. सिंडो ज़रा सा चूका तो अपन विंडो से बाहर हो सकते थे. लेकिन बरसों की यात्राओं के अनुभव से महसूस हो रहा था कि सिंडो की स्‍टेयरिंग पर पकड़ जबरदस्‍त थी. बस सिंडो से इतना ही कहा कि रिस्‍क लेने की ज़रूरत नहीं है...फॉल छूटता है तो छूटे. सिंडो को हिंदी और अंग्रेजी दोनों कम समझ आती हैं और मुझे मलयालन नहीं आती. मगर काम चल रहा था. सिंडो ने बात को समझ कर मुस्‍कुराते हुए सिर्फ ओके और नो टेंशन कहा और मैं सांस थामें बगल में बैठा रहा. खैर, ठीक 4.43 मिनट पर हम फॉरेस्‍ट रिज़र्व के टिकट काउंटर पर थे.

अब हम 6 बजे तक वाटर फॉल का आनंद उठा सकते थे. प्रवेश द्वार से जो रास्‍ता फॉल की ओर जाता हैं वहां से सबसे पहले चालाकुडी नदी ही नज़र आती है. 145 किलोमीटर लंबी ये नदी पश्चिमी घाट में अनामुदी की पहाडियों से शुरू होती है और अरब सागर में जा कर मिलती है. थोड़ा और नीचे उतरने पर दाईं ओर इस 80 फुट उँचे वाटर फॉल का पहला दृश्‍य देखते ही दिल में उतर जाता है. एक रास्‍ता दाईं ओर से नीचे की ओर उतरता है जहां से इस झरने के ठीक नीचे तक जाया जा सकता है. लेकिन हम लोगों ने पहले बाईं ओर नदी की तरफ बढ़ना पसंद किया. थोड़ी देर नदी की धारा का आनंद ले लें फिर झरने की खूबसूरती देखी जाएगी. दरअसल नदी की ये धारा पहाड़ी के उस किनारे जहां से नदी 80 फुट की गहराई में छलांग लगाती है, वहां से झरने की 3 धाराओं में बंट जाती है. कुल 330 फुट चौड़ाई वाला ये झरना बरसात के दिन में झूम कर गिरता है और यहां से 1 किलोमीटर दूर तक नदी का वेग जैसे सब कुछ बहा ले जाने की क्षमता रखता हो. 
यही नहीं अथिरापिल्‍ली और वाझाचल इलाके में बहुत सी खास वनस्‍पतियां और जीव-जंतु भी पाए जाते हैं. पश्चिमी घाट में ये अकेला ऐसा स्‍थान है जहां 4 लुप्‍तप्राय हॉर्नबिल प्रजातियां पाई जाती हैं. अपनी ऐसी ही खूबियों के कारण पश्चिमी घाट दुनिया के सबसे महत्‍वपूर्ण बायोडायवर्सिटी हॉट-स्‍पॉट में से एक हैं.
स्त्रोत: होलिडिफाई डॉट कॉम 
यहां पाई जाने वाली पक्षियों की विभिन्‍न प्रजातियों के कारण इंटरनेशनल बर्ड एसोसिएशन ने इस इलाके को महत्‍वपूर्ण पक्षी क्षेत्रघोषित किया है. उधर वाइल्‍डलाइफ ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया ने माना है कि इस क्षेत्र में हाथियों के संरक्षण के लिए सबसे बेहतर प्रयास किए गए हैं. इस इलाके में त्रिचूर जिला पर्यटन संवर्द्धन परिषद के द्वारा चालाकुडी से मालाक्‍कपाड़ा तक हर रोज जंगल सफारी भी कराई जाती है. ये जंगह हमेशा हरे भरे रहते हैं इसलिए यहां की सफारी का अपना ही आनंद होगा. 
कैसे पहुंचे: अथिराप्पिल्‍ली वाटर फॉल त्रिचूर से 60 किलोमीटर और कोच्चि से 76 किलोमीटर दूर है. दोनों जगहों से यहां तक के लिए अच्‍छी बस सर्विस मौजूद है. कोच्चि में यहां से सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा मौजूद है. 

कुछ तस्वीरें और...





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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 


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Thursday, 2 May 2019

The Nizam's Jewels: रिज़र्व बैंक के तहखानों में आज भी सुरक्षित है बेशकीमती आभूषणों की धरोहर


आज़ादी से पहले के राजाओं, रजवाड़ों और रियासतों वाले हिंदुस्‍तान में शाही परिवारों की शान-ओ-शौक़त के कि़स्‍सों को हम बरसों से सुनते-सुनाते आए हैं। उत्‍तर में अगर अवध के नवाबों की रईसी रश्‍क़ करने लायक थी तो दक्‍कन में हैदराबाद के निज़ाम भी पीछे नहीं थे। इस इलाके में 200 वर्षों से अधिक तक राज करने वाले निज़ामों ने अपने शासन काल में धीरे-धीरे तमाम हीरे-जवाहरातों और एक से एक नायाब आभूषणों को अपने निजी खजाने में शामिल किया। आज इस खजाने का बड़ा हिस्‍सा देश की विरासत की अमूल्‍य धरोहर के रूप में भारत सरकार के पास सुरक्षित रखा है। इन आभूषणों के जरिए हम दक्‍कन के 200 वर्षों के इतिहास और उस समय के निज़ाम शासन की संपन्‍नता को बेहद करीब से देख और समझ सकते हैं। गोलकुंडा और कोलार की खान से निकले बेशकीमती हीरों सहित दुनिया के सबसे बड़े हीरों में गिना जाने वाला जैकब हीरा, बसरा मोतियों का सतलड़ा हार, कोलंबियाई पन्‍ने, बर्मा के माणिक्‍य व रूबी, हीरे जडि़त हार समेत कुल 173 आभूषणों का यह संग्रह उस दौर की याद दिलाता है जब भारत को सोने की चिडि़या कहा जाता था। सरकार अगर समय पर इन आभूषणों को न खरीदती तो यह अनमोल धरोहर देश के बाहर चली जाती। कभी निज़ामों के परिवार की निजी संपत्ति रहे इन आभूषणों की रिज़र्व बैंक के तहखानों तक पहुंचने की कहानी भी बड़ी दिलचस्‍प है।
सरपेच या कलगी

आसफ़ जाही सल्‍तनत की सात पीढि़यों ने समृद्ध किया खजाना:
हम जानते हैं कि 18वीं शताब्‍दी में मुगल सत्‍ता के कमज़ोर पड़ने पर अनेक छोटी-छोटी ताकतें देश के तमाम हिस्‍सों में उभर कर सामने आने लगीं। दक्षिण में निज़ाम सबसे शक्तिशाली शासकों के रूप में उभरे जिन्‍होंने 200 से अधिक वर्षों तक दक्‍कन क्षेत्र पर शासन किया। इस वंश के संस्‍थापक कमरुद्दीन चिंक्‍लीज खां ने दक्‍कन के वाइसराय के रूप में कार्यभार संभाला और धीरे-धीरे दक्‍कन में आसफ़ जाह वंश की नींव रखी। दरअसल, सन 1713 में मुग़ल शासक फ़र्रुखसियर ने उसे निज़ाम-उल-मुल्‍क फ़तेहजंग की उपाधी दी और 1725 में मुग़ल शासक मुहम्‍मद शाह ने आसफ़ जाह की उपाधी से नवाज़ा। बस इसके बाद सभी आसफ़ जाही शासकों ने अपने नाम के साथ निज़ामकी उपाधी लगानी शुरू कर दी। निज़ामों का यह सफ़र सातवें आसफ़ जाह मीर उस्‍मान अली खां (1911-1948) तक बदस्‍तूर चलता रहा। दक्‍कन में राज करने वाले निज़ाम शासक मुग़ल जीवन शैली से भी प्रभावित थे। संपत्ति के महत्‍व और खजाने के मूल्‍य को आंकना उन्‍हें बहुत कम उम्र में ही आ गया था। निज़ामों के इस दौर में जहां हैदराबाद शहर ने खूब तरक्‍की की वहीं हर निज़ाम शासक ने अपनी निजी संपत्ति और शाही खजाने को समृद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन आभूषणों में गोलकुंडा की खान और देश की अन्‍य तमाम खानों से निकले कीमती हीरों, रत्‍न आदि के साथ-साथ तमाम छोटी रियासतों, जागीरदारों, राजाओं आदि से नज़राने के रूप में प्राप्‍त कीमती गहने भी शामिल हैं।

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आम जनता के लिए दुर्लभ ही रहे हैं शाही आभूषण:
भारतीय राजा-महाराजाओं के आभूषण आम जनता की नज़रों से आम-तौर पर दूर ही रहे हैं। इन आभूषणों को केवल राजपरिवार के लोग या दरबारी ही देख पाते थे। इसीलिए भारतीय राजपरिवारों के आभूषण उनके महलों के खजानों में ही बंद रहे। इन आभूषणों को खास राजकीय समारोहों के अवसर पर ही पहना जाता था और खास लोग ही इन्‍हें देख पाते थे। अधिकांश निज़ाम आभूषणों का प्राप्ति स्रोत अज्ञात ही है क्‍योंकि निज़ामों का निजी जीवन और उनकी गतिविधियां आमतौर पर गोपनीय ही रहती थीं। 18वीं से 20वीं सदी के बीच के ये आभूषण अपने उत्‍कृष्‍ट शिल्‍प-सौंदर्य, पुरातनता व दुर्लभ रत्‍नों के कारण विश्‍वविख्‍यात हैं।

ट्रस्‍ट बनाकर की गई खजाने को बचाने की कोशिश:
हैदराबाद के अंतिम निज़ाम मीर उस्‍मान अली का एक विशाल परिवार था और 1000 से ज्‍यादा नौकर-चाकर। उधर आर्थिक स्थिति भी डांवाडोल होने लगी थी। सो अपने परिवार के आर्थिक भविष्‍य को सुरक्षित करने के लिए निज़ाम ने अपनी संपत्ति को कई न्‍यासों (ट्रस्‍टों) में बांट दिया। स्‍वतंत्रता के बाद सन 1951 में निज़ाम ने एच.ई.एच. द निज़ाम ज्‍वैलरी ट्रस्‍टऔर 1952 में एक अन्‍य न्‍यास एच.ई.एच. निज़ाम सप्लिमेंटल ज्‍वैलरी ट्रस्‍टकी स्‍थापना की। लेकिन इन न्‍यासों के लिए शर्त थी कि इस संपत्ति का विक्रय केवल उस्‍मान अली और उसके बड़े बेटे आज़म जाह की मृत्‍यु के उपरांत ही किया जा सकता है। सरकारी सूची के अनुसार इन दोनों ही न्‍यासों में आभूषणों की कुल संख्‍या 173 है। आभूषणों के इस नायाब संग्रह में पगड़ी के सजाने वाले सरपेच, कलगी, हार, बाजूबंद, झुमके, कंगन, कमर-पेटी, बटन, कफलिंक, पायजेब, घड़ी की चेन, अंगूठियां और बहुमूल्‍य हीरों और पत्‍थरों से जड़ी बैल्‍ट आदि खास तौर पर शामिल हैं। एक खास बात ये है कि इन आभूषणों में बाजूबंदों की प्रमुखता है क्‍योंकि ये शाही लिबास और आभूषणों का अनिवार्य अंग था। 
हीरों से जड़ा कमरबंद या बैल्‍ट

कुछ ऐसे पहनी जाती थी हीरों से जड़ी बैल्‍ट
अगर सरकार न खरीदती तो देश के बाहर चली जाती यह धरोहर:
1970 में निज़ाम द्वारा इन न्‍यासों को विघटित कर इन आभूषणों को बेचने से प्राप्‍त धनराशि को विभिन्‍न उत्‍तराधिकारियों में बांटने का निर्णय लिया गया। निज़ाम के उत्‍तराधिकारियों द्वारा तत्‍कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को एक विज्ञप्ति पत्र भेजा गया। इस पत्र में निवेदन किया गया था कि हैदराबाद के निज़ाम के आभूषणों को भारत सरकार द्वारा खरीदने का विचार किया जाये ताकि यह धरोहर भारत में ही रहे। निज़ामों के वंशज इस खजाने को 350 मिलियन डॉलर में बेचना चाहते थे। काफी दिनों तक जद्दोजहद चलती रही। अंतत: 1991 में न्‍यायाधीश ए. एन. सेन की अध्‍यक्षता में बनी समिति के निर्णय के आधार पर भारत सरकार ने निज़ाम परिवार से कुल 173 उत्‍कृष्‍ट आभूषणों को 2,17,81,89,128 रुपए (दो सौ सत्रह करोड़ इक्‍यासी लाख नवासी हज़ार एक सौ अठ्ठाईस रुपए) में खरीद लिया। इस ऐतिहासिक, बहुमूल्‍य और अनुपम धरोहर का अधिग्रहण भारत के लिए गर्व का विषय था। तभी से यह खजाना रिज़र्व बैंक के पास सुरक्षित रखा है और सरकार समय-समय पर जनता के लिए इसकी प्रदर्शनी लगाती है जिसे देखने में देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लोगों की दिलचस्‍पी रहती है।

मुग़ल, दक्‍कनी और यूरोपीय शैली का सम्मिश्रण हैं निज़ाम-आभूषण:


हीरोंं मेंं छेद कर हार बनाने का नायाब नमूना 
निज़ामो के इन आभूषणों में दक्‍कनी-शिल्‍प और मुग़ल कला का अद्भुत सम्मिश्रण देखने को मिलता है। निज़ामों के दरबारों पर दिल्‍ली के मुग़ल शासकों के भारी प्रभाव के बावजूद उनके विभिन्‍न आभूषणों में स्‍थानीय कला का स्‍पष्‍ट प्रभाव दिखाई देता है। लटकन युक्‍त हीरे-पन्‍ने के लम्‍बे हारों में उत्‍तर व दक्षिण भारतीय कला का मिश्रण नज़र आता है। हैदराबाद के आभूषणों में सामने की ओर जड़ाई और पीछे की ओर मीनाकारी खूब प्रचलित थी। इसी प्रकार मुग़ल कला शैली की पराकाष्‍ठा को दर्शाने वाले और खिले फूल के डिजाइन वाले हीरे जड़े बाजूबंद मैसूर नरेश टीपू सुल्‍तान के हैं जिन्‍हें आसफ़ जाह द्वितीय ने टीपू सुलतान से लूटे गए सामान में प्राप्‍त किया। निज़ाम शासक अंग्रेजों के मददगार रहे। शायद इसी वजह से 19 वीं शताब्‍दी में उनके कुछ आभूषणों पर यूरो‍पीय शिल्‍प और डिजाइनों का प्रभाव दिखाई पड़ता है। प्रदर्शनी में गाइड के रूप में मेरी मदद कर रहींं अनीता जी मुझे बताती हैं कि यहां एक हार बेहद खास है जिसमें हीरों में छेद कर धागा पिरोया गया है। हीरे जैसी चीज में छेद करने की कला वाकई अद्भुत थी। इस प्रकार निज़ाम-आभूषण मुग़ल, दक्‍कनी और यूरोपीय कला शैलियों का अद्भुत मिश्रण हैं।
 इन आभूषणों की कहानी बताते हुए अनीता जी

सबसे दिलचस्‍प है दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा हीरा जैकब डायमंड:
जैकब डायमंड
निज़ामों के इन आभूषणों में सबसे खास है 19वीं शताब्‍दी के अंत में दक्षिण अफ्रीका की किंबर्ली खान से निकला जैकब डायमंड। इंपीरियल, ग्रेट वाइट और विक्‍टोरिया नाम से प्रसिद्ध हुए इस हीरे की दास्‍तान बेहद दिलचस्‍प है। तराशने से पहले इसका वजन 457.5 कैरट था और उस समय इसे विश्‍व के सबसे बड़े हीरों में से एक माना जाता था। बाद में हीरा चोरी हो गया और हॉलैंड की एक कंपनी को बेच दिया गया। फिर हॉलैंड की महारानी के सामने इस हीरे को तराशा गया और इसका वजन घटकर 184.5 कैरट रह गया। 1890 में एलेग्‍जेंडर मैल्‍कम जैकब नाम के हीरों के व्‍यापारी ने इस हीरे को हैदराबाद के छठे निज़ाम महबूब अली खां पाशा को 1,20,00,000 रुपए में बेचने की पेशकश की। निज़ाम केवल 46,00,000 रुपए देने को तैयार हुआ। इसके लिए 23,00,000 रुपए का एडवांस तय हुआ। लेकिन निज़ाम ने इसके लिए कोई लिखित करार नहीं किया। इसका मतलब था कि निज़ाम को हीरा पसंद न होने पर वह मना भी कर सकता था। हुआ भी कुछ ऐसा ही।लंदन से चले हीरे के भारत पहुंचने के बाद निज़ाम का मन बदल गया और अपनी 23,00,000 रुपए की अग्रिम राशि वापिस मांग ली। दरअसल, अंग्रेजी सरकार इस सौदे से नाखुश थी क्‍योंकि इसकी खरीद के लिए अदा की जाने वाली रकम राजकोष पर उधार चढ़ जाती। उधर जैकब ने अग्रिम राशि निज़ाम को लौटाने से मना कर दिया और निज़ाम ने जैकब के खिलाफ कलकत्‍ता न्‍यायालय में मुक़द्मा दायर कर दिया। काफी दिनों तक मामला चलता रहा। आखि़रकार तंग आ‍कर निज़ाम ने अदालत के बाहर समझौता कर जैकब से वह हीरा प्राप्‍त कर लिया। इसी जैकब के नाम पर इस हीरे का नाम जैकब डायमंड पड़ा था। लेकिन इतनी फ़ज़ीहत के बाद हासिल हुए हीरे में अब निज़ाम की दिलचस्‍पी ख़त्‍म हो चुकी थी। महबूब अली की मृत्‍यु के बाद उसके पुत्र अर्थात् सातवें निज़ाम मीर उस्‍मान अली खां को यह हीरा चौमहल्‍ला पैलेस में अपने पिता के जूतों के अंदर जुराब में पड़ा मिला। इस कीमती हीरे को सातवें निज़ाम ने भी इज्‍़ज़त नहीं बख्‍़शी और वह भी जीवन भर इसका इस्‍तेमाल एक पेपरवेट के रूप में करते रहे। इस हीरे का आज दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा हीरा माना जाता है। कहते हैं कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में इस हीरे की कीमत 400 करोड़ रुपए के आस-पास है और इन दिनों यह हीरा निज़ामों के तमाम अन्‍य आभूषणों के साथ रिज़र्व बैंक के तहखानों में महफूज़ है। 
पायजेब
चाक-चौबंद सुरक्षा में रखे हैं ये अनमोल आभूषण:
निज़ामों के ये आभूषण इन दिनों दिल्‍ली के राष्‍ट्रीय संग्रहालय की एक खास प्रदर्शनी में रखे गए हैं। निज़ामों के इन आभूषणों की प्रदर्शनी वर्ष 2001 और 2007 में नई दिल्‍ली के राष्‍ट्रीय संग्रहालय और हैदराबाद के सालारजंग संग्रहालय में लगाई गई थी। ये तीसरा मौका है जब दिल्‍ली के राष्‍ट्रीय संग्रहालय में भारतीय आभूषण: निज़ाम आभूषण संकलन नाम से यह प्रदर्शनी एक बार फिर लगाई गयी है। इन आभूषणों के महत्‍व को देखते हुए इन्‍हें जेड कैटेगरी की सुरक्षा में रखा गया है। जिसमें दर्जनों हथियारबंद जवान दिन रात प्रदर्शनी हॉल की सुरक्षा कर रहे हैं। प्रदर्शनी कक्ष को बैंक के स्‍ट्रॉंग रूम की तरह सुरक्षित बनाया गया है जिसमें 65 कैमरे लगातार इन आभूषणों पर नज़र रखे हुए हैं। यहां लगाए गए जैमर के कारण प्रदर्शनी में प्रवेश करते ही फोन का सिग्‍नल बंद हो जाता है। ये इंतज़ाम देखने के बाद मुझे 80 के दशक की बॉलीवुड फिल्‍मों में ज्‍वैलरी की प्रदर्शनियों से हीरों को चुराने वाले दृश्‍य याद हो आते हैं। लेकिन, यहां की मुकम्‍मल व्‍यवस्‍था के आगे म्‍युजियम से इन हीरों को चुरा पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। अभी ये प्रदर्शनी पांच दिन और जारी रहेगी इसलिए वक्‍़त हो तो इसे देख आइये क्‍योंकि फिर न जाने कितने बरसों बाद इन नायाब आभूषणों को देखने का अवसर मिले।

अपडेट: अब यह प्रदशर्नी 31 मई तक चलेगी और सुबह 10 से सांय 6 बजे तक देखी जा सकती है।
टिकट: संग्रहालय की टिकट 20 रुपए
प्रदर्शनी टिकट: 50 रुपए

इस लेख का  संपादित संस्‍करण प्रतिष्ठित पोर्टल द बेटर इंडिया पर प्रकाशित हुआ है।


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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 


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Saturday, 13 April 2019

100 बरस बाद भी एक माफ़ी के इंतज़ार में है जलियांवाला बाग


कुछ घटनाएं देश की सामूहिक चेतना पर अमिट प्रभाव छोड़ जाती हैं. जलियांवाला बाग का नरसंहार भी एक ऐसी ही घटना थी जिसने न केवल पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया था बल्कि पूरी दुनिया के सामने ब्रिटिश हुकूमत के निकृष्‍टतम रूप को उजागर कर दिया था. समय का पहिया घूम कर 13 अप्रैल, 2019 को ठीक सौ साल बाद उसी जगह आ पहुंचा है जहां इस दर्दनाक घटना ने स्‍वतंत्रता संग्राम की दिशा और दशा दोनों को बदल कर रख दिया था. अमृतसर में अब तक बहुत कुछ बदल चुका है मगर जलियांवाला बाग (Jallianwala bagh) की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान बाकी हैं जो इतिहास की इस वीभत्‍स घटना की गवाही दे रहे हैं. मैंने आज से तकरीबन तीन साल पहले पहली बार जलियांवाला बाग को देखा और महसूस किया था. इत्‍तेफ़ाक से चंद रोज़ पहले एक बार फिर अमृतसर आना हुआ और मैं जलियांवाला बाग से लगती एक गली के होटल में ठहरा था. उस रोज़ भी अमृतसर में नींद जल्‍दी खुल गई तो सुबह की सैर के लिए मैं जलियांवाला बाग ही आ पहुंचा. बाग में घूमते हुए ही मुझे अचानक इस बात का ख्‍़याल आया कि इस 13 अप्रैल को इस घटना को ठीक 100 बरस हो जाएंगे. मैं अचानक से उस घटना को और करीब से महसूस करने लगा था.
Statue of Shaheed Udham Singh at Jallianwala Bagh
दरअसल जलियांवाला बाग की घटना को समझने के लिए हमें आज से 100 साल पहले उन दिनों अमृतसर और इसके आस-पास के इलाके में घट रही घटनाओं को समझना पड़ेगा. ये वो वक्‍़त था जब गांधी जी चंपारन, अहमदाबाद और खेड़ा में अपने सफल सत्‍याग्रह से उत्‍साहित थे और फरवरी, 1919 में उन्‍होंने अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रस्‍तावित रॉलेट एक्‍ट के खिलाफ देशव्‍यापी विरोध का आवाहन किया था. रॉलेट बिल वास्‍तव में आतंकवादी घटनाओं पर रोक लगाने की आड़ में भारतीयों की नागरिक स्‍वतंत्रता पर बंदिशें लगाने वाला कानून था और चुने हुए प्रतिनिधियों के विरोध के बावजूद जल्‍दबाज़ी में विधान परिषद में प्रस्‍तुत कर दिया गया था. पूरे देश को सरकार की ये हिमाक़त भारतीय जनता का अपमान लग रही थी और ये भी एक ऐसे वक्‍़त में जब विश्‍व युद्ध की समाप्ति के बाद यहां की जनता ब्रिटिश सरकार से कुछ संवैधानिक रिआयतों की उम्‍मीद कर रही थी. राजनेताओं के विरोध के संवैधानिक तौर-तरीके विफल हुए तो गांधी जी ने सत्‍याग्रह का प्रस्‍ताव रखा. इस प्रस्‍ताव का होम रूल लीग के लोगों ने समर्थन किया और गांधी जी के साथ आ गए. अब रातों रात होम रूल लीग के लोगों से संपर्क साधा जाने लगा और तय किया गया कि एक राष्‍ट्रव्‍यापी हड़ताल की जाएगी और उपवास और प्रार्थनाएं की जाएंगी. और ये भी तय किया गया कि कुछ खास कानूनों के विरोध में सविनय अवज्ञा भी की जाएगी. सत्‍याग्रह के लिए 6 अप्रैल का दिन तय किया गया मगर देश में इससे पहले ही आंदोलन छिड़ गया और जगह-जगह हिंसा भी होने लगी. पंजाब तो पहले ही अंग्रेजी जुल्‍मों का शिकार था. अमृतसर और लाहौर में विरोध बहुत तीखा हुआ जिसने ब्रिटिश सरकार को डरा दिया. गांधी जी ने खुद पंजाब जाकर इस आग को शांत करने की कोशिश की लेकिन सरकार ने गांधी जी को जबरन मुंबई भेज दिया. वहां पहले ही आग लगी थी सो उन्‍होंने वहीं रहकर लोगों को शांत करने का फैसला किया.

पंजाब के हालात लगातार बिगड़ रहे थे और अमृतसर में 10 अप्रैल को दो राष्‍ट्रीय नेताओं डाॅ. सत्‍यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के बाद टाउन हॉल और पोस्‍ट ऑफिस पर हमला किया गया, टेलीग्राफ की लाइनें काट दी गईं और कुछ यूरोपियन लोगों पर भी हमला हुआ. अब सरकार ने फौज़ को बुलाया और शहर की कमान जनरल डायर के हाथों में सौंप दी गई. कुछ इतिहासकार बताते हैं कि जनरल डायर ने शहर भर के लिए तकरीबन 21 आदेश जारी किए थे जिसमें एक जगह चार से ज्‍यादा लोगों का इकट्ठा न होना भी शामिल था लेकिन ये आदेश लोगों तक ठीक से नहीं पहुंचे. 13 अप्रैल को रविवार के दिन ही डायर ने किसी भी तरह की सभा के आयोजन को भी प्रतिबंधित करने का आदेश जारी किया लेकिन ये आदेश भी लोगों तक नहीं पहुंच सका. हर बार की तरह बैसाखी के दिन (13 अप्रैल) अमृतसर के आस-पास के इलाकों से लोग बैसाखी मनाने अमृतसर आ पहुंचे और अपने नेताओं की गिरफ्तारी के प्रति विरोध जताने के लिए जलियांवाला बाग में बुलाई गई एक शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभा में शरीक़ होने लगे.
जलियांवाला तब. स्‍त्रोत: विकीपीडिया 

दीवारों पर लगे गोलियों के निशान
जलियांवाला बाग असल में एक 6 से 7 एकड़ का खुला मैदान था जिसके चारों तरफ तकरीबन 10 फुट ऊंची दीवारें थीं. इस बाग में प्रवेश के लिए चार-पांच रास्‍ते थे लेकिन ज्‍यादातर पर ताला लगा हुआ था. बीच में एक कुआं और एक समाधी. उस रोज़ अमृतसर में व्‍यापारियों का पशुओं की खरीद एक मेला भी लगा हुआ था जो दोपहर दो बजे तक खत्‍म हो गया. लोग रास्‍ते में जलियांवाला से होकर गुज़रने लगे. हजारों लोग पास ही हरमंदिर साहब से दर्शन करके लौटते हुए यहां आ पहुंचे. उधर जनरल डायर को लगा कि लोग उसके आदेश की जानबूझकर अवमानना कर रहे हैं. डायर ने बाग के ऊपर से हवाई जहाज भेज कर पता लगाया कि यहां तकरीबन 6,000 लोग जमा हो चुके हैं. बाद में हंटर कमीशन ने ये आंकड़ा 20,000 तक बताया था. बस फिर क्‍या था जनरल डायर ने 29वें गोरखा, 54सिख और 59सिंध राइफल्‍स के 303 ली एनफील्‍ड राइफलों वाले कुल 90 सिख, बलूची और राजपूत जवानों के साथ जलियांवाला बाग में प्रवेश किया और बाग में प्रवेश और निकलने के एक मात्र रास्‍ते को घेर कर निहत्‍थे लोगों पर पूरे दस मिनट तक गोलियां बरसाईं. जनरल ने लोगों को बाग खाली करने की कोई चेतावनी भी नहीं दी. बाद में खुद डायर ने अपने बयान में कुबूला था कि उसका मक़सद बाग को खाली करना नहीं बल्कि हिंदुस्‍तानियों को सबक सिखाना था. गोलियां तब तक चलती रहीं जब तक असलाह खत्‍म नहीं हो गया. लोग जिधर जान बचाने के लिए भागते उधर ही गोलियां बरसाई जातीं. बच्चों, बूढ़े और जवान सबकी लाशें बिछने लगीं. कुछ ही लोग दीवार फांद पाए. ऐसे ही कुछ लोगों ने बाद में वहां का मंज़र बयां किया. लोग जान बचाने के लिए कुंए में भी कूद गए. बाद में उस कुंए से 120 लाशें निकलीं. जो लोग गोलियों से जख्‍़मी हुए वे बाद में भी बाग से बाहर नहीं निकल सके. क्योंकि रात में पूरे शहर में करफ्यू लगा दिया गया था. शहर का पानी और लाइट काट दिए गए. सरकार ने एलान कर दिया था कि जो लोग बाग़ में थे उन्होंने सरकार से गद्दारी की है. अब लोग कैसे बताते कि उनका कौन सगा-सम्बन्धी बाग में मर रहा है. उधर लोगों को बाग में जाने की मनाही थी सो घायलों को भी बाहर नहीं निकाला जा सका. इससे मरने वालों की संख्या में और इज़ाफ़ा हुआ. लोग मरते रहे और बेरहम डायर तमाशा देखता रहा. बताया जाता है कि डायर मशीनगन जैसे हथियारों से लैस दो मोटर गाडियां भी साथ लाया था जो बाग के संकरे रास्‍ते के कारण अंदर नहीं पहुंच सकीं. खुद जनरल डायर के बयान के मुताबिक उस रोज़ जलियांवाला में 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. उस समय की ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार कुल 379 लोग मारे गए और लगभग 1100 लोग जख्‍़मी हुए जबकि इंडियन नेशनल कांग्रेस ने मरने वालों की संख्‍या लगभग 1,000 और जख्मियों की संख्‍या 1500 बताई थी. इस नृशंसता ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था और उधर लंदन में हाउस ऑफ लॉर्ड्स से शुरूआत में जनरल डायर को मिली तारीफ़ ने आग में घी का काम किया और इस आक्रोश की परिणति 1920-22 के असहयोग आंदोलन में हुई.
जहां से लोगों पर गोलियां चलाई गईं  

लेकिन जुलाई, 1920 में हाउस ऑफ कॉमन्‍स ने जनरल डायर की निंदा की और उसे जबरन सेवानिवृत कराया गया. रबिंद्रनाथ टैगोर इस हत्‍याकांड से इतने व्‍यथित हुए कि उन्‍होंने अपनी नाइटहुड की उपाधी लौटाते हुए लिखा कि "such mass murderers aren't worthy of giving any title to anyone". इस हत्‍याकांड के तीन महीने बाद जुलाई, 1919 में अधिकारियों ने मरने वाले लोगों की ठीक पहचान के लिए स्‍थानीय लोगों की मदद मांगी. लेकिन इन हालातों में कौन सच बताता. ऐसे में मरने वालों के संबंधियों की पहचान जाहिर होने का खतरा था. उधर पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर ने जनरल डायर की करतूत का समर्थन किया और शाबासी दी.

इस घटना के बाद भारतीयों ने अपने-अपने तरीकों से ब्रिटिश सरकार को चोट पहुंचानी शुरू कर दी. ब्रिटिश सरकार के तमाम चहेतों ने सरकार से अपना नाता तोड़ लिया और दूसरी तरफ क्रांतिकारी इस हत्‍याकांड का बदला लेने की योजना बनाने लगे. इस हत्‍याकांड के गवाह और इस घटना में खुद जख्‍़मी होने वाले सुनाम के रहने वाले उधम सिंह के दिल में ये आग बरसों धधकती रही. जनरल डायर की 1927 में मृत्‍यु हो चुकी थी. उधम सिंह का मानना था कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे पंजाब का तत्‍कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर ही है. सो उधम सिंह मौके की तलाश करते रहे और अपने इरादे को अमलीजामा पहनाने के लिए लंदन तक जा पहुंचे. आखिरकार, 13 मार्च, 1940 को ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्‍सटन हॉल में गोली मार कर माइकल ओ डायर की हत्‍या कर दी. इस घटना के बाद का घटनाक्रम भी बड़ा दिलचस्‍प था. दुनिया भर के अखबारों ने इस घटना को छापा और ऊधम सिंह के कृत्‍य को उचित ठहराया. ऊधम सिंह को 31 जुलाई, 1940 को फांसी दे दी गई. उस समय पंडित नेहरू और गांधी जी ने इस हत्‍याकांड की निंदा की. लेकिन बाद में 1952 में पंडित जवाहर लाल नेहरू (तत्‍कालीन प्रधानमंत्री) ने ऊधम सिंह को शहीद का दर्जा दिया और कहा,
‘I salute Shaheed-i-Azam Udham Singh with reverence who had kissed the noose so that we may be free’

आज इस घटना को 100 वर्ष बीत गए हैं लेकिन हिंदुस्‍तान की जनता के दिलों में ये ज़ख्म आज भी ताज़ा है. जिन परिवारों के लोग इस घटना में शहीद हो गए वो कैसे इसे भुला सकते हैं. अबकी अमृतसर यात्रा में मैंने जलियांवाला बाग में एक परिवर्तन देखा था. बाग के मुख्‍य द्वार के नज़दीक जिस दीवार पर जलियांवाला बाग लिखा होता था वहां अब शहीद उधम सिंह की प्रतिमा भी लगाई गई है. शहीद उधम सिंह के बिना जलियांवाला का इतिहास अधूरा ही था. उधर इस घटना के बाद से लगातार ये मांग उठती रही है कि ब्रिटिश सरकार इस घटना के लिए आधिकारिक रूप से माफ़ी मांगे. लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ है. हांलाकि 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा था,

"A deeply shameful event in British history, one that Winston Churchill rightly described at that time as monstrous. We must never forget what happened here and we must ensure that the UK stands up for the right of peaceful protests”

लेकिन माफी शब्‍द यहां भी नहीं था. इस हत्‍याकांड के 100वें वर्ष में ये घटना एक बार फिर हमारे जख्‍मों को कुरेद रही है और दुनिया भर से लंदन पर इस घटना के लिए माफी मांगने का दबाव बनाया जा रहा है,  लेकिन ब्रिटिश सरकार शायद अभी तक इस घटना के लिए अपने दोष को स्‍वीकार नहीं करना चाहती. वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे का ताज़ा बयान आ चुका है,
“The tragedy of Jallianwala Bagh in 1919 is a shameful scar on British Indian history. As her majesty the Queen said before visiting Jallianwala Bagh in 1997, it is a distressing example of our past history with India”

इस बयान पर सिर्फ अफसोस किया जा सकता है. ब्रिटेन की माफी से इतिहास तो नहीं बदल जाएगा. लेकिन इतना ज़़रूर है कि हमारे जख्‍़म कुछ हद तक भर जाएंगे. जन अधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली ब्रिटेन की सरकार को जलियांवाला हत्‍याकांड के सौ वें वर्ष में आधिकारिक रूप से माफी मांगने का ये अवसर नहीं गंवाना चाहिए. 







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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 


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