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Saturday, 13 April 2019

100 बरस बाद भी एक माफ़ी के इंतज़ार में है जलियांवाला बाग


कुछ घटनाएं देश की सामूहिक चेतना पर अमिट प्रभाव छोड़ जाती हैं. जलियांवाला बाग का नरसंहार भी एक ऐसी ही घटना थी जिसने न केवल पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया था बल्कि पूरी दुनिया के सामने ब्रिटिश हुकूमत के निकृष्‍टतम रूप को उजागर कर दिया था. समय का पहिया घूम कर 13 अप्रैल, 2019 को ठीक सौ साल बाद उसी जगह आ पहुंचा है जहां इस दर्दनाक घटना ने स्‍वतंत्रता संग्राम की दिशा और दशा दोनों को बदल कर रख दिया था. अमृतसर में अब तक बहुत कुछ बदल चुका है मगर जलियांवाला बाग (Jallianwala bagh) की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान बाकी हैं जो इतिहास की इस वीभत्‍स घटना की गवाही दे रहे हैं. मैंने आज से तकरीबन तीन साल पहले पहली बार जलियांवाला बाग को देखा और महसूस किया था. इत्‍तेफ़ाक से चंद रोज़ पहले एक बार फिर अमृतसर आना हुआ और मैं जलियांवाला बाग से लगती एक गली के होटल में ठहरा था. उस रोज़ भी अमृतसर में नींद जल्‍दी खुल गई तो सुबह की सैर के लिए मैं जलियांवाला बाग ही आ पहुंचा. बाग में घूमते हुए ही मुझे अचानक इस बात का ख्‍़याल आया कि इस 13 अप्रैल को इस घटना को ठीक 100 बरस हो जाएंगे. मैं अचानक से उस घटना को और करीब से महसूस करने लगा था.
Statue of Shaheed Udham Singh at Jallianwala Bagh
दरअसल जलियांवाला बाग की घटना को समझने के लिए हमें आज से 100 साल पहले उन दिनों अमृतसर और इसके आस-पास के इलाके में घट रही घटनाओं को समझना पड़ेगा. ये वो वक्‍़त था जब गांधी जी चंपारन, अहमदाबाद और खेड़ा में अपने सफल सत्‍याग्रह से उत्‍साहित थे और फरवरी, 1919 में उन्‍होंने अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रस्‍तावित रॉलेट एक्‍ट के खिलाफ देशव्‍यापी विरोध का आवाहन किया था. रॉलेट बिल वास्‍तव में आतंकवादी घटनाओं पर रोक लगाने की आड़ में भारतीयों की नागरिक स्‍वतंत्रता पर बंदिशें लगाने वाला कानून था और चुने हुए प्रतिनिधियों के विरोध के बावजूद जल्‍दबाज़ी में विधान परिषद में प्रस्‍तुत कर दिया गया था. पूरे देश को सरकार की ये हिमाक़त भारतीय जनता का अपमान लग रही थी और ये भी एक ऐसे वक्‍़त में जब विश्‍व युद्ध की समाप्ति के बाद यहां की जनता ब्रिटिश सरकार से कुछ संवैधानिक रिआयतों की उम्‍मीद कर रही थी. राजनेताओं के विरोध के संवैधानिक तौर-तरीके विफल हुए तो गांधी जी ने सत्‍याग्रह का प्रस्‍ताव रखा. इस प्रस्‍ताव का होम रूल लीग के लोगों ने समर्थन किया और गांधी जी के साथ आ गए. अब रातों रात होम रूल लीग के लोगों से संपर्क साधा जाने लगा और तय किया गया कि एक राष्‍ट्रव्‍यापी हड़ताल की जाएगी और उपवास और प्रार्थनाएं की जाएंगी. और ये भी तय किया गया कि कुछ खास कानूनों के विरोध में सविनय अवज्ञा भी की जाएगी. सत्‍याग्रह के लिए 6 अप्रैल का दिन तय किया गया मगर देश में इससे पहले ही आंदोलन छिड़ गया और जगह-जगह हिंसा भी होने लगी. पंजाब तो पहले ही अंग्रेजी जुल्‍मों का शिकार था. अमृतसर और लाहौर में विरोध बहुत तीखा हुआ जिसने ब्रिटिश सरकार को डरा दिया. गांधी जी ने खुद पंजाब जाकर इस आग को शांत करने की कोशिश की लेकिन सरकार ने गांधी जी को जबरन मुंबई भेज दिया. वहां पहले ही आग लगी थी सो उन्‍होंने वहीं रहकर लोगों को शांत करने का फैसला किया.

पंजाब के हालात लगातार बिगड़ रहे थे और अमृतसर में 10 अप्रैल को दो राष्‍ट्रीय नेताओं डाॅ. सत्‍यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के बाद टाउन हॉल और पोस्‍ट ऑफिस पर हमला किया गया, टेलीग्राफ की लाइनें काट दी गईं और कुछ यूरोपियन लोगों पर भी हमला हुआ. अब सरकार ने फौज़ को बुलाया और शहर की कमान जनरल डायर के हाथों में सौंप दी गई. कुछ इतिहासकार बताते हैं कि जनरल डायर ने शहर भर के लिए तकरीबन 21 आदेश जारी किए थे जिसमें एक जगह चार से ज्‍यादा लोगों का इकट्ठा न होना भी शामिल था लेकिन ये आदेश लोगों तक ठीक से नहीं पहुंचे. 13 अप्रैल को रविवार के दिन ही डायर ने किसी भी तरह की सभा के आयोजन को भी प्रतिबंधित करने का आदेश जारी किया लेकिन ये आदेश भी लोगों तक नहीं पहुंच सका. हर बार की तरह बैसाखी के दिन (13 अप्रैल) अमृतसर के आस-पास के इलाकों से लोग बैसाखी मनाने अमृतसर आ पहुंचे और अपने नेताओं की गिरफ्तारी के प्रति विरोध जताने के लिए जलियांवाला बाग में बुलाई गई एक शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभा में शरीक़ होने लगे.
जलियांवाला तब. स्‍त्रोत: विकीपीडिया 

दीवारों पर लगे गोलियों के निशान
जलियांवाला बाग असल में एक 6 से 7 एकड़ का खुला मैदान था जिसके चारों तरफ तकरीबन 10 फुट ऊंची दीवारें थीं. इस बाग में प्रवेश के लिए चार-पांच रास्‍ते थे लेकिन ज्‍यादातर पर ताला लगा हुआ था. बीच में एक कुआं और एक समाधी. उस रोज़ अमृतसर में व्‍यापारियों का पशुओं की खरीद एक मेला भी लगा हुआ था जो दोपहर दो बजे तक खत्‍म हो गया. लोग रास्‍ते में जलियांवाला से होकर गुज़रने लगे. हजारों लोग पास ही हरमंदिर साहब से दर्शन करके लौटते हुए यहां आ पहुंचे. उधर जनरल डायर को लगा कि लोग उसके आदेश की जानबूझकर अवमानना कर रहे हैं. डायर ने बाग के ऊपर से हवाई जहाज भेज कर पता लगाया कि यहां तकरीबन 6,000 लोग जमा हो चुके हैं. बाद में हंटर कमीशन ने ये आंकड़ा 20,000 तक बताया था. बस फिर क्‍या था जनरल डायर ने 29वें गोरखा, 54सिख और 59सिंध राइफल्‍स के 303 ली एनफील्‍ड राइफलों वाले कुल 90 सिख, बलूची और राजपूत जवानों के साथ जलियांवाला बाग में प्रवेश किया और बाग में प्रवेश और निकलने के एक मात्र रास्‍ते को घेर कर निहत्‍थे लोगों पर पूरे दस मिनट तक गोलियां बरसाईं. जनरल ने लोगों को बाग खाली करने की कोई चेतावनी भी नहीं दी. बाद में खुद डायर ने अपने बयान में कुबूला था कि उसका मक़सद बाग को खाली करना नहीं बल्कि हिंदुस्‍तानियों को सबक सिखाना था. गोलियां तब तक चलती रहीं जब तक असलाह खत्‍म नहीं हो गया. लोग जिधर जान बचाने के लिए भागते उधर ही गोलियां बरसाई जातीं. बच्चों, बूढ़े और जवान सबकी लाशें बिछने लगीं. कुछ ही लोग दीवार फांद पाए. ऐसे ही कुछ लोगों ने बाद में वहां का मंज़र बयां किया. लोग जान बचाने के लिए कुंए में भी कूद गए. बाद में उस कुंए से 120 लाशें निकलीं. जो लोग गोलियों से जख्‍़मी हुए वे बाद में भी बाग से बाहर नहीं निकल सके. क्योंकि रात में पूरे शहर में करफ्यू लगा दिया गया था. शहर का पानी और लाइट काट दिए गए. सरकार ने एलान कर दिया था कि जो लोग बाग़ में थे उन्होंने सरकार से गद्दारी की है. अब लोग कैसे बताते कि उनका कौन सगा-सम्बन्धी बाग में मर रहा है. उधर लोगों को बाग में जाने की मनाही थी सो घायलों को भी बाहर नहीं निकाला जा सका. इससे मरने वालों की संख्या में और इज़ाफ़ा हुआ. लोग मरते रहे और बेरहम डायर तमाशा देखता रहा. बताया जाता है कि डायर मशीनगन जैसे हथियारों से लैस दो मोटर गाडियां भी साथ लाया था जो बाग के संकरे रास्‍ते के कारण अंदर नहीं पहुंच सकीं. खुद जनरल डायर के बयान के मुताबिक उस रोज़ जलियांवाला में 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. उस समय की ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार कुल 379 लोग मारे गए और लगभग 1100 लोग जख्‍़मी हुए जबकि इंडियन नेशनल कांग्रेस ने मरने वालों की संख्‍या लगभग 1,000 और जख्मियों की संख्‍या 1500 बताई थी. इस नृशंसता ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था और उधर लंदन में हाउस ऑफ लॉर्ड्स से शुरूआत में जनरल डायर को मिली तारीफ़ ने आग में घी का काम किया और इस आक्रोश की परिणति 1920-22 के असहयोग आंदोलन में हुई.
जहां से लोगों पर गोलियां चलाई गईं  

लेकिन जुलाई, 1920 में हाउस ऑफ कॉमन्‍स ने जनरल डायर की निंदा की और उसे जबरन सेवानिवृत कराया गया. रबिंद्रनाथ टैगोर इस हत्‍याकांड से इतने व्‍यथित हुए कि उन्‍होंने अपनी नाइटहुड की उपाधी लौटाते हुए लिखा कि "such mass murderers aren't worthy of giving any title to anyone". इस हत्‍याकांड के तीन महीने बाद जुलाई, 1919 में अधिकारियों ने मरने वाले लोगों की ठीक पहचान के लिए स्‍थानीय लोगों की मदद मांगी. लेकिन इन हालातों में कौन सच बताता. ऐसे में मरने वालों के संबंधियों की पहचान जाहिर होने का खतरा था. उधर पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर ने जनरल डायर की करतूत का समर्थन किया और शाबासी दी.

इस घटना के बाद भारतीयों ने अपने-अपने तरीकों से ब्रिटिश सरकार को चोट पहुंचानी शुरू कर दी. ब्रिटिश सरकार के तमाम चहेतों ने सरकार से अपना नाता तोड़ लिया और दूसरी तरफ क्रांतिकारी इस हत्‍याकांड का बदला लेने की योजना बनाने लगे. इस हत्‍याकांड के गवाह और इस घटना में खुद जख्‍़मी होने वाले सुनाम के रहने वाले उधम सिंह के दिल में ये आग बरसों धधकती रही. जनरल डायर की 1927 में मृत्‍यु हो चुकी थी. उधम सिंह का मानना था कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे पंजाब का तत्‍कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर ही है. सो उधम सिंह मौके की तलाश करते रहे और अपने इरादे को अमलीजामा पहनाने के लिए लंदन तक जा पहुंचे. आखिरकार, 13 मार्च, 1940 को ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्‍सटन हॉल में गोली मार कर माइकल ओ डायर की हत्‍या कर दी. इस घटना के बाद का घटनाक्रम भी बड़ा दिलचस्‍प था. दुनिया भर के अखबारों ने इस घटना को छापा और ऊधम सिंह के कृत्‍य को उचित ठहराया. ऊधम सिंह को 31 जुलाई, 1940 को फांसी दे दी गई. उस समय पंडित नेहरू और गांधी जी ने इस हत्‍याकांड की निंदा की. लेकिन बाद में 1952 में पंडित जवाहर लाल नेहरू (तत्‍कालीन प्रधानमंत्री) ने ऊधम सिंह को शहीद का दर्जा दिया और कहा,
‘I salute Shaheed-i-Azam Udham Singh with reverence who had kissed the noose so that we may be free’

आज इस घटना को 100 वर्ष बीत गए हैं लेकिन हिंदुस्‍तान की जनता के दिलों में ये ज़ख्म आज भी ताज़ा है. जिन परिवारों के लोग इस घटना में शहीद हो गए वो कैसे इसे भुला सकते हैं. अबकी अमृतसर यात्रा में मैंने जलियांवाला बाग में एक परिवर्तन देखा था. बाग के मुख्‍य द्वार के नज़दीक जिस दीवार पर जलियांवाला बाग लिखा होता था वहां अब शहीद उधम सिंह की प्रतिमा भी लगाई गई है. शहीद उधम सिंह के बिना जलियांवाला का इतिहास अधूरा ही था. उधर इस घटना के बाद से लगातार ये मांग उठती रही है कि ब्रिटिश सरकार इस घटना के लिए आधिकारिक रूप से माफ़ी मांगे. लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ है. हांलाकि 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा था,

"A deeply shameful event in British history, one that Winston Churchill rightly described at that time as monstrous. We must never forget what happened here and we must ensure that the UK stands up for the right of peaceful protests”

लेकिन माफी शब्‍द यहां भी नहीं था. इस हत्‍याकांड के 100वें वर्ष में ये घटना एक बार फिर हमारे जख्‍मों को कुरेद रही है और दुनिया भर से लंदन पर इस घटना के लिए माफी मांगने का दबाव बनाया जा रहा है,  लेकिन ब्रिटिश सरकार शायद अभी तक इस घटना के लिए अपने दोष को स्‍वीकार नहीं करना चाहती. वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे का ताज़ा बयान आ चुका है,
“The tragedy of Jallianwala Bagh in 1919 is a shameful scar on British Indian history. As her majesty the Queen said before visiting Jallianwala Bagh in 1997, it is a distressing example of our past history with India”

इस बयान पर सिर्फ अफसोस किया जा सकता है. ब्रिटेन की माफी से इतिहास तो नहीं बदल जाएगा. लेकिन इतना ज़़रूर है कि हमारे जख्‍़म कुछ हद तक भर जाएंगे. जन अधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली ब्रिटेन की सरकार को जलियांवाला हत्‍याकांड के सौ वें वर्ष में आधिकारिक रूप से माफी मांगने का ये अवसर नहीं गंवाना चाहिए. 







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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 


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Thursday, 11 April 2019

जोश और जुनून से लबरेज़ है अटारी-वाघा बॉर्डर की रिट्रीट सेरेमनी


अमृतसर के नज़दीक अटारी-वाघा बॉर्डर की रिट्रीट सेरेमनी को देखना हिंदुस्‍तान के कुछ चुनिंदा और अनूठे अनुभवों में से एक है. दुनिया में शायद ही किन्‍हीं और दो देशों की सरहद पर इस तरह के जोश और जुनून से लबरेज़ रिट्रीट कार्यक्रम होता होगा जहां न केवल सीमा पर तैनात फौजी अपने-अपने अंदाज़ में सीमा पार खड़े दूसरे देश के फौजियों को अपनी भाव-भंगिमाओं से चेतावनी देते नज़र आते हैं बल्कि दोनों तरफ़ दो देशों के लोग अपने नारों की बुलंद आवाजों से ही एक दूसरे को हराने की कोशिश करते हों. जब हिंदुस्‍तान और पाकिस्‍तान के रिश्‍ते आम-तौर पर तनाव से ही गुज़रते रहते हों, ऐसे में अटारी जैसी सरहद की फि़ज़ा में बिगड़ते रिश्‍तों की तपिश आसानी से महसूस की जा सकती है. यूं तो भारत की कुल 3323 किलोमीटर की सीमा पाकिस्‍तान से लगती है मगर लोग इस बार्डर को सड़क मार्ग से सिर्फ अटारी-वाघा बार्डर से ही पार कर सकते हैं. कुछ ही दिनों पहले इसी बार्डर से विंग कमांडर अभिनंदन की वतन वापसी के वक्‍़त की तस्‍वीरें हम सबके जेहन में ताज़ा होंगी. पिछले सप्‍ताह की अपनी अमृतसर यात्रा के दौरान मैंने इस सेरेमनी का एक बार फिर आनंद लिया. मैं तीन साल पहले जून, 2016 में पहली बार यहां आया था. लेकिन जितनी बार देखो, हर बार नया ही अनुभव होगा और मेरा मानना है कि हर हिंदुस्‍तानी को अपने जीवन में एक बार यहां ज़रूर आना चाहिए. वो समां कुछ और ही होता है जब रगों में दौड़ता खून उबाल मारने लगता है और  पाकिस्‍तान की आंख में आंख डालकर भारत माता की जय और हिंदुस्‍तान जिंदाबाद के नारे दिल की गहराइयों से निकलते हैं. सीमा पर रिट्रीट सेरेमनी का ये सिलसिला भारत की बॉर्डर स्क्यिोरिटी फोर्स (बीएसएफ) और पाकिस्‍तान की पाकिस्‍तान रेंजर्सके द्वारा 1959 से हर दिन यूं ही चला आ रहा है. ये दो मुल्‍कों की आपसी रंजिश के साथ-साथ भाईचारे और आपसी सहयोग का भी प्रतीक है. कुछ इसी तरह की परेड़ का आयोजन फ़ाजिल्‍का के नज़दीक सादिकी बॉर्डर और फिरोजपुर में हुसैनीवाला बार्डर पर भी होता है.

ये तो मुल्‍क के बंटवारे ने लोगों को बांट दिया वरना हमारे लिए तो लाहौर भी वैसा ही प्‍यारा शहर था जैसे अमृतसर. आज़ादी तक तो इन दोनों शहरों का नाम भी एक साथ लिया जाता था जैसे अपने चंडीगढ़-मोहाली हैं वैसे ही लाहौर-अमृतसर के ट्विन सिटी हुआ करते थे. सब वक्‍़त की बात है, जमीन पर एक लकीर क्‍या खिंची, सब अलग हो गया. साझा इतिहास और विरासत वाले लोग एक दूसरे के खून के प्‍यासे हो गए. बंटवारे के दर्द की दास्‍तां जितनी कही जाए कम है.

Pic Courtesy: Scoopwhoop 
खैर, सीमा के इस तरफ पूरा कार्यक्रम तयशुदा तरीके से चलता है जिसमें भीड़ में गर्मजोशी पैदा करने वाले देशभक्ति के गीत, सड़क पर तिरंगा लेकर दौड़ती हिंदुस्‍तानी युवतियां, बीएसएफ के आमंत्रण पर सड़क पर आकर देशभक्ति के गीतों पर नाचने और झूमने उतरी महिलाओं का सैलाब, बीएसएफ के फौजियों की परेड़, बीएसएफ के फौजियों का अपनी मूंछों को ताव देना, पाकिस्‍तानी रेंजरों की आंखों में घूरना, सिर की उँचाई तक किक मारना और हिंदुस्‍तान जिंदाबाद के नारे...सब कुछ जैसे धीरे-धीरे खून की गरमी बढ़ाता है. बड़े तैश में दोनों और के फौजी बार्डर के उसे गेट को खोलते हैं, बूटों की धमक जैसे बताती है कि कौन कितने जोश में है, पहले आंखों में आंखे डाली जाती हैं, फिर हाथ मिलते हैं और फिर ढ़लते सूरज के साये में दोनों ओर की सेनाएं अपने-अपने ध्‍वज का सम्‍मान करने के लिए ध्‍वज को उतारती हैं. बीएसएफ के उस जवान की भी दाद देनी पड़ेगी जो एक तरह से हज़ारों की इस भीड़ की भावनाओं को कोरियोग्राफ करता है. आप ताली बजाने या नारा लगाने में ज़रा सा ढ़ीला पड़े नहीं कि उसकी नज़र आपको पकड़ लेगी. ये जवान लगातार जोश बढ़ाने की कोशिश में नज़र आता है और धीरे-धीरे दर्शकों का जोश बढ़ता जाता है, मुठ्ठियां भिंचने लगती हैं, सांसें गरम होने लगती हैं और वतन के लिए जज्‍़बात चरम पर होते हैं...एक साथ हज़ारों लोग जब जय हिंद का नारा लगाते हैं तो हवा तक कांपती है. 


इस बार सीमा पर इस आयोजन की सूरत बदली-बदली नज़र आ रही थी. मैं जब पिछली बार यहां आया था तो दर्शक दीर्घा में काफी बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा था. इस बार तो यहां 50,000 की क्षमता वाला एक छोटा सा स्‍टेडियम जैसा पैवेलियन तैयार हो चुका है. दरअसल पिछले कुछ वर्षों में इस सेरेमनी की लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही है सो पहले के इंतज़ाम नाकाफी साबित हो रहे थे. दिलचस्‍प बात ये है कि सीमा-रेखा के उस पार पाकिस्‍तान की दर्शक-दीर्घा बहुत छोटी है और वो भी पूरी भरी नहीं होती. पता नहीं ये बात कितनी सही है कि पाकिस्‍तान में रेंजर्स ने आस-पास के गांव वालों को इस आयोजन में नियम से हाजि़र होने का हुक्‍म सुनाया हुआ है. खैर, जो भी हो, बॉर्डर के इस आयोजन में दोनों मुल्‍कों के समाज के खुलेपन और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अंतर की हल्‍की सी झलक देखने को मिलती है. सीमा के इस तरफ जहां महिलाएं सड़क पर आकर देशभक्ति के गीतों पर जी भर कर झूमती और गाती नज़र आती हैं वहीं पाकिस्‍तान की ओर की दर्शक दीर्घा में पसरी सुस्‍ती साफ़ नज़र आती है. ले दे कर दो चार ढ़ोल वाले ढ़ोल पीटते नज़र आते हैं. उस तरफ़ के उत्‍सव में महिलाएं जैसे शामिल ही नहीं हैं. उधर का हाल देखकर इधर की महिलाएं अपने आजाद ख्‍़याल मुल्‍क पर इतराती नज़र आती हैं.


हालात तो इस बार पूरे बॉर्डर के ही बदले-बदले नज़र आते हैं. अटारी का रेलवे स्‍टेशन सुनसान पड़ा है और इंटीग्रेटेड चेक पोस्‍ट भी वीरान नज़र आती है. हमारी गाड़ी का ड्राइवर अटारी गांव का ही रहने वाला है. वो कहता है कि साहब, जब से सरकार ने पाकिस्‍तान के साथ कारोबार पर पाबंदियां या सख्तियां की हैं इधर का माल इधर और उधर का माल उधर है. और सबसे ज्‍यादा बुरी हालत पाकिस्‍तान के कारोबारियों की है. वहां बॉर्डर के उस तरह हजारों ट्रक सामान ट्रकों में लदा पड़ा है. मार इधर भी पड़ी है मगर देश के लिए इतना तो जरूरी ही था.  

बॉर्डर के इस अद्भुत आयोजन में कोई भी आम आदमी बिना किसी टिकट के शामिल हो सकता है. ये कार्यक्रम गर्मियों में 5.30 बजे शुरू होता है और पैवेलियन का गेट 3 बजे खोल दिया जाता है. इसलिए लोग आगे की पंक्तियों में बैठने के लिए 3 बजे से जाकर अपनी जगह ले लेते हैं. हां, बीएसएफ या भारतीय सीमा शुल्‍क के विशेष अतिथियों के लिए यहां विशेष व्‍यवस्‍था है जिसमें यदि आपका नाम पहले से बीएसएफ अधिकारियों के पास दर्ज है तो आपके वाहन को वीआईपी पार्किंग तक आने दिया जाएगा अन्‍यथा आयोजन स्‍थल से तकरीबन एक किलोमीटर दूर ही वाहर छोड़ने होंगे. वीआईपी अतिथियों के लिए बॉर्डर के बिल्‍कुल नज़दीक कुर्सियों की व्‍यवस्‍था है जहां से पूरी सेरेमनी बहुत नज़दीक से और इत्‍मीनान से देख पाते हैं. कैमरा, मोबाइल, पानी की बोतल के अलावा आयोजन स्‍थल पर कुछ न लेकर जाएं. वहां अंदर भी पानी, कोल्‍ड ड्रिंक्‍स और चिप्‍स आपकी सीट पर आप प्रिंट रेट पर खरीद सकते हैं.

समय: 5.30 से 6.30 बजे (गरमियों में) 5.00 से 6.00 बजे (सर्दियों में)

प्रवेश शुल्‍क: नि:शुल्‍क

कैसे पहुंचें: अटारी बॉर्डर अमृतसर से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर है. यदि परिवार साथ हो तो अमृससर से टैक्‍सी लेना ही बेहतर है. अन्‍यथा गोल्‍डन टेंपल, जलियांवाला बाग़ और घोड़े वाले चौक के पास से ऑटो भी यहां तक आते हैं जो प्रति सवारी 50 से 60 रुपया लेते हैं.







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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 


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Saturday, 30 March 2019

शहर की सूरत और सीरत बदल रही है देश की पहली आर्ट डिस्ट्रिक: लोधी कॉलोनी


शहर की गलियों और उन गलियों में घरों की दीवारों को भी कला के लिए कैनवास की तरह इस्‍तेमाल किया जा सकता है, इस एक खूबसूरत ख्‍याल ने पिछले कुछ सालों में देश के तमाम शहरों की शक्‍लो-सूरत को बदल कर रख दिया है. फिर दिल्‍ली कैसे पीछे रह सकती थी. दिल्‍ली की जिस लोधी कॉलोनी की पहचान अब तक सरकारी अफ़सरों और कर्मचारियों के घरों से होती थी वो कॉलोनी अब देश की पहली आर्ट डिस्ट्रिक बन कर देश और दुनिया के नक्‍शे पर अपनी अलग जगह बना रही है. चटख रंगों में रंगी इसकी सैकड़ों दीवारें आज हज़ारों कहानियां कह रही हैं. अगर आपको कला में ज़रा भी दिलचस्‍पी है और आपने लोधी आर्ट डिस्ट्रिक नहीं देखी तो फिर आपने बहुत कुछ नहीं देखा. स्‍ट्रीट आर्ट के माध्‍यम से कला को एकदम से आम लोगों के बीच लाकर रख देना और लोगों को कला से जुड़ने का अवसर देना अपने आप में एक क्रांतिकारी पहल है. एक नॉन प्रोफिट संगठन St+art India Foundation का स्‍ट्रीट आर्ट के साथ इस तरह प्रयोग करने का ये सिलसिला दरअसल चंद दीवारों के साथ दिल्‍ली से 2015 में शुरू हुआ था और अब तक मुंबई, हैदराबाद, बेंगलूरू, गोवा, कोयंबटूर, चेन्‍नई, चंडीगढ़ और कोच्‍ची जैसे देश के तमाम शहरों में आकर्षक रंगों और चित्रों से लबरेज़ सैकड़ों दीवारें आम शहरी की जिंदगी का हिस्‍सा बन चुकी हैं. स्‍ट्रीट आर्ट फाउंडेशन, एशियन पेंट्स जैसे प्रायोजकों और तमाम सरकारी एजेंसियों के सहयोग से देश भर में एक अनूठी कलात्‍मक क्रांति की पटकथा लिख रहा है. अभी हाल ही में 1 मार्च को St+art India Foundation ने सीपीडब्‍ल्‍यूडी और एशियन पेंट्स के साथ मिलकर देश के पहले पब्लिक आर्ट डिस्ट्रिक- लोधी आर्ट डिस्ट्रिक को जनता को समर्पित किया है.   

मैं पिछले कई वर्षों से देश के तमाम शहरों में स्‍ट्रीट आर्ट को करीब से देखने और समझने की कोशिश करता रहा हूं. शहर वाकई बदल रहे हैं और कला को लेकर उनका नज़रिया भी. एक ओर ये कला के अद्भुत नमूने जहां स्‍थानीय लोगों की जिंदगी में सकारात्‍मक परिवर्तन ला रहे हैं वहीं दूर-दूर से आने वाले पर्यटकों के लिए शहर को और भी खूबसूरत अंदाज में प्रस्‍तुत कर रहे हैं. कला अब बंद गैलरियों की मिल्कियत नहीं रह गई है बल्कि कला का लोकतंत्रीकरण हो रहा है. जो लोग आर्ट गैलरियों में नहीं जा सकते या जिनके पास इतनी फुर्सत नहीं है, उनके लिए कला ने खुद चल कर उनके गली-मुहल्‍ले यहां तक कि उनके अपने घर की दीवारों, खिड़कियों और छज्‍जों पर अपना आशियाना बना लिया है. अब हर रोज़ आस-पास के बाशिंदों को एक आर्ट गैलरी से गुज़रने का अहसास होता है. यूं कहिए कि कला अब उनकी जिंदगी का अभिन्‍न हिस्‍सा बन गई है. दिल्‍ली का लोधी कॉलोनी भी कुछ ऐसा ही इलाका है जहां मेहरचंद मार्केट से लेकर खन्‍ना मार्केट तक का हिस्‍सा एक मुकम्‍मल पब्लिक आर्ट गैलरी बन चुका है. सरकारी कर्मचारियों के घरों के बीच की दीवारों पर देशी और विदेशी कलाकारों ने पिछले कुछ बरसों में रंगों से भरी एक अद्भुत दुनिया रच दी है. हर दीवार जैसे कुछ कहती है. हर दीवार जैसे आपको अपने पास रोक लेना चाहती हो. 
2015 में शुरू हुए इस सफर में लोधी कॉलोनी में पिछले साल (2018) में तकरीबन 30 नई दीवारों पर काम हुआ था इस साल मार्च के अंत तक स्‍ट्रीट आर्ट फैस्टिवल, 2019 के खत्‍म होने तक 50 नई रंग-बिरंगी दीवारें कुछ और घरों का हिस्‍सा बन चुकी होंगी. शहर में रंगों के ऐसे अद्भुत उत्‍सव ने मुझे खुद-ब-खुद अपनी ओर खींच लिया. ये पूरा इलाका इतना बड़ा है और दीवारें इतनी अधिक हैं कि एक दिन में सभी को देखा भी नहीं जा सकता. मैं अगले दिन एक बार फिर इन गलियों में था. यकीन मानिए दो दिन की मेहनत के बाद भी कुछ दीवारें मुझसे छूट गईं.

मुझे सबसे ज्‍यादा प्रभावित किया सिंगापुर के आर्टिस्‍ट यिप येव चौंग की कलाकृति ने. फाइनेंस की बैकग्राउंड से आने वाले 50 वर्षीय चौंग ने इस दीवार पर शहर की रोजमर्रा की जिंदगी से उठाए चरित्रों को रचा है जिसमें छज्‍जे पर अखबार पढ़ते सरदार जी, मिठाई की दुकान, गाय, बांसुरी बेचने वाला, दीवारों से लटकाए हुए कालीन, नाई की दुकान जैसे आम दृश्‍य शामिल हैं. और क्‍या खूब कलाकारी की गई है. इस दीवार का हर हिस्‍सा एकदम वास्‍तविक प्रतीत होता है. चौंग की कलाकृतियों की खासियत यह है कि वे देखने वाले को क‍लाकृति का ही हिस्‍सा बन जाने के लिए आमंत्रित करती हैं. अब देखिए न, इस कलाकृति में सी‍ढ़ी और नाई की दुकान इतनी रियल है कि मैं खुद इसका हिस्‍सा बनकर तस्‍वीरों में गुम हो गया. यहां हर रोज तस्‍वीरें खिंचवाने वालों का मजमा लगा रहता है. आर्टिस्‍ट को उनके इन्‍स्‍टाग्राम हैंडल @yipyewchong पर फॉलो किया जा सकता है.
Artist: Yip Yew Chong 
Artist: Yip Yew Chong 
स्‍ट्रीट आर्ट के इन विषयों में पर्यावरण, ट्रांसजेंडर, सांप्रदायिक सौहार्द, महिला सशक्तिकरण, पक्षी, संस्‍कृति, ग्रामीण परिवेश जैसे विषय शामिल हैं. ब्‍लॉक 19 की सुनहरी मछली वाली एक मुराल पिछले वर्षों में हमारे शहरों और नदियों में प्राकृतिक आवासों की भयानक हानि को रेखांकित करती है. इसका कारण प्‍लास्टिक, मानव निर्मित सामग्रियों का जल में प्रवाह और यहां तक कि गोल्‍ड फिशजैसी एलियन प्रजातियों के दखल से नदियों की बायो डायवर्सिटी पर बुरा प्रभाव पड़ना है. ये दीवार खास तौर पर दिल्‍ली की यमुना नदी की समस्‍या को उजागर करती नज़र आती है. इस आर्टिस्‍ट का उनके ट्विटर हैंडर @H11235 पर फॉलो किया जा सकता है.
Artist: H11235
इस बार के स्‍ट्रीट आर्ट फेस्‍टीवल में तैयार की गई कलाकृतियों में से ही एक और वॉल ने मुझे अपनी ओर खूब आकर्षित किया. ये है ब्‍लॉक 12 में जर्मन आर्टिस्‍ट बांड द्वारा दीवार पर किया गया 3डी प्रयोग. ये एक तरह का augmented reality का खेल है. जिसमें देखने पर लगेगा कि दीवार में से ही कुछ आकृतियां बाहर तक उभरी हुई हैं. लेकिन ऐसा है नहीं. वहां तो केवल एक सपाट दीवार ही है. बस नज़र का धोखा है. और इस धोखे में दीवार में मौजूद खिडकियां और दरवाजे सब गुम हुए नज़र आते हैं. बांड स्‍ट्रीट आर्ट की सीमाओं को तोड़ते नज़र आते हैं. उनकी इस अद्भुत रचना के जादू को #VuforiaViewApp  के जरिए देखा जा सकता है. इस एप से इस स्‍ट्रीट आर्ट को देखने पर इसकी आकृतियां दीवार पर मचलती नज़र आएंगी. मानो वो वास्‍तव में दीवार से बाहर निकल रही हैं.   

Artist: @bondtruluv 

Artist: @bondtruluv 
कुछ इसी तरह ब्‍लॉक 9 की एक और दीवार अपने चटख रंगों और आकृतियों के कारण दूर से ही देखने वाले को अपनी ओर आकर्षित करती है. आर्टिस्‍ट @saner_edgar की ये कलाकृति में मैक्सिकन और भारतीय संस्‍कृति के समान पहलुओं को प्रदर्शित करती है. बकौल सेनर, इस चित्र की प्रेरणा उन्‍हें भारतीय दर्शन की उन अवधारणाओं से मिली है जो मैक्सिको तक पहुंची हैं. आध्‍यात्मिक पथ पर चलते हुए आत्‍म-ज्ञान से ज्ञान प्राप्‍त करने और पुनर्जन्‍म की चाह और आत्‍म-सुधार जैसे विषय इस कृति का हिस्‍सा बन गए हैं. बीच की खाली जगह के एक तरफ स्‍त्री और दूसरी तरफ एक पुरुष का चित्र सृष्टि के संतुलन को प्रदर्शित करते हैं. उनके कपडे मैक्सिकन और हिंदू परंपराओं की पहचान कराते हैं और इन दोनों संस्‍कृतियों के बीच एक सेतु की तरह काम कर रहे हैं. सेनर अपनी कलाकृतियों में अकसर मास्‍क का प्रयोग करते हैं जो मैक्सिकन सभ्‍यता का अभिन्‍न अंग है जिसका इस्‍तेमाल पशुओं की आकृति के माध्‍यम से मानव की वास्‍तविक प्रकृति को दर्शाने के लिए किया जाता है.
Artist: @Saner_edgar

Artist: @Saner_edgar

तमाम विदेशी कलाकारों के अलावा यहां कुछ भारतीय कलाकारों ने भी अपनी कलाकृतियों के माध्‍यम से अभिन्‍न छाप छोड़ी है. मुंबई के आर्टिस्‍ट समीर कुलावूर की ब्‍लॉक 17 की एक कलाकृति डिजीटल युग को प्रदर्शित करती है. उन्‍होंने इस चित्र में सोशल मीडिया और लोगों पर इसके प्रभाव को मैक्रो और माइक्रो लेवल पर दर्शाया है.
Artist: Sam_Kulavoor
अरावनी आर्ट प्रोजेक्‍ट ने दिल्‍ली की ट्रांसजेंडर कम्‍युनिटी के साथ समन्‍वय में अपनी पहली मुराल यहां ब्‍लॉक 5 में एन पी सीनियर सेकेंडरी स्‍कूल के सामने तैयार की है. एकता की थीम पर तैयार इस मुराल में उन ट्रांसजेंडर महिलाओं को प्रदर्शित करने की कोशिश की गई है जिनके साथ इस संगठन ने काम किया है. एक दिलचस्‍प बात है कि इस वॉल को तैयार करने में 15 ट्रांसजेंडर महिलाओं ने भी अपना योगदान दिया है.
Artist: Sajid Wazid

Artist: Nikunj 
कला के इन अद्भुत नमूनों को देखते हुए लोधी कॉलोनी की इन गलियों में मेरी मुलाकात अहमदाबाद के आर्टिस्‍ट निकुंज से हुई. निकुंज अभी ब्‍लॉक 5 में एक दीवार पर काम करने  की तैयारी कर रहे हैं. मुझे ये जानने में बहुत दिलचस्‍पी थी कि ऐसे किसी स्‍ट्रीट आर्ट वर्क को तैयार करने में पर्दे के पीछे कौन लोग काम करते हैं और कितना पेंट इस्‍तेमाल होता है और क्‍या-क्‍या साधन जुटाने पड़ते हैं. मेरे इन सवालों का जवाब भी मुझे जल्‍द ही मिल गया. निकुंज के लिए इस दीवार को तैयार करने की जिम्‍मेदारी निभा रहे स्‍ट्रीट आर्ट संगठन के प्रोजेक्‍ट मैनेजर नयनतारा और आरिफ भी उनके साथ साइट पर मौजूद हैं. मेरे पूछने पर नयनतारा ने बताया कि एक दीवार को आर्टिस्‍ट के लिए तैयार करने में 40 लीटर पेंट सिर्फ बेस कलर के लिए इस्‍तेमाल होता है. और इसके बाद आर्टिस्‍ट की थीम और चित्र के हिसाब से बाकी पेंट का इंतजाम किया जाता है. ये सारा पेंट एशियन पेंट्स के द्वारा उपलब्‍ध कराया जा रहा है. ऊंची दीवारों तक पहुंच के लिए क्रेन जैसी मशीन भी आर्टिस्‍ट को मुहैया कराई जाती है. मुझे बताया गया कि इस स्‍ट्रीट आर्ट फैस्टिवल में एक समय में ऐसी चार मशीनें अलग-अलग दीवारों पर काम में जुटी हैं. एक आर्टिस्‍ट के साथ कुछ वॉलंटियर भी उनकी मदद के लिए मौजूद रहते हैं. तो कुछ इस तरह तैयार होती हैं ये स्‍ट्रीट आर्ट.
पर्दे के पीछे के कलाकार : नयनतारा और आरिफ 
एक शहर के बीच रंगों के प्रति दीवानगी को रेखांकित करती वी लव दिल्‍ली’ की दीवार तो जैसे इस आर्ट डिस्ट्रिक का विजिटिंग कार्ड ही बन गई है. इस एक तस्‍वीर की भी लंबी कहानी है. वो कहानी फिर कभी. आप यहां आएं तो इसे देखने से न चूकें. 

इस आर्ट डिस्ट्रिक की कुछ और कृतियों ने मेरे दिल को छू लिया है. वे बार-बार मुझे अपनी ओर आकर्षित करती हैं. कुछ और दिलचस्‍प दीवारें यहां देखें...






पोलिश आर्टिस्‍ट NeSpoon के एम्‍ब्रॉयडरी पैटर्न हमेशा देखने वाले होते हैं लेकिन इस बार यहां बात कुछ अलग तरह से कही गई है. लोधी कॉलोनी के सेमल के लाल फूलों से प्रेरणा लेकर ब्‍लैक एंड व्‍हाइट स्‍कैच को इन चटकीले लाल पीले रंगों से इस तरह भरा है जैसे किसी ने दीवार पर कढ़ाई कर दी हो. इसमें यूरोपियन यूनियन के साथ-साथ ईशा-ए-नूर फाउंडेशन (आगा खां फाउंडेशन की एक पहल) का भी सहयोग नीस्‍पून को मिला है. इस दीवार को अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर लोकार्पित किया गया था.

ब्‍लॉक 14 में आर्टिस्‍ट आरोन @aaronglasson की कृति तो लाजवाब है. दूर से देखने पर सब कुछ एब्‍सट्रेक्‍ट नज़र आता है. मगर एक-एक हिस्‍से को अलग-अलग करके देखने पर कुछ बातें उभर कर सामने दिखने लगती हैं. इस कृति में केले के डंठल को गौर से देखिए. जहां डंठल नहीं बल्कि दो हाथ एक दूसरे को थामे हुए हैं.
Artist: @aaronglasson
St+Art Foundation के सह-संस्‍थापक और कंटेंट डायरेक्‍टर, अक्षत नौरियाल कहते हैं कि, इस साल हमारे कम्‍युनिटी आउटरीच प्रयासों को लोगों से अच्‍छी प्रतिक्रिया मिली है. हमने लगभग 7500 घरों से अखबारों में पेम्‍फलेट आदि के जरिए उनकी प्रतिक्रिया, उनकी रुचियों और लोधी कॉलोनी की कहानियों को जानने के लिए संपर्क किया था. बाद में तमाम वर्कशॉप, परफॉर्मेंस और क्‍यूरेटेड टुर भी आयोजित किए. इस सबके जरिए हम यहां के लोगों के सहयोग के लिए उनका शुक्रिया अदा करना चाहते थे. अक्षत की बात सही थी. इसकी तस्‍दीक यहां की एक कम्‍युनिटी वॉल साथ-साथभी करती है जिसे यहां के स्‍थानीय लोगों ने मिलकर रंगा है. जाहिर है कि ये एक दीवार यहां के लोगों के दिलों में लोधी आर्ट डिस्ट्रिक के प्रति गर्व और स्‍वामित्‍व की भावनाएं जगाने में सफल रही है. उस रोज आर्टिस्‍ट अखलाख अहमद इस दीवार को फाइनल टल देने में मशगूल थे. अखलाख ने बताया कि वे सिर्फ इस दीवार पर लिखे शब्‍दों को सजा रहे हैं, बाकी का पेंट यहां के बच्‍चों और लोगों ने मिलकर किया है. मैंने कई स्‍थानीय लोगों से बात की, लोग इस बात पर एकमत नज़र आए कि इस स्‍ट्रीट आर्ट ने उनकी कॉलानी को एक खूबसूरत शक्‍़ल दी है. उन्‍हें यहां रहना अब पहले से ज्‍यादा अच्‍छा लगता है. नीरस दीवारें अब बोलने लगी हैं और लोग उनके घरों को देखने आने लगे हैं. स्‍ट्रीट आर्ट के जरिए देश के शहर की सूरत बदलने के लिए St+Art का शुक्रिया का हकदार है. 
कम्‍युनिटी वॉल को अंतिम रूप देते अखलाख 
यहां हर एक दीवार की अपनी अलग कहानी है जिसे कोई समझाने वाला चाहिए. वरना यूं ही इन दीवारों के चित्रों को देखकर आधा-अधूरा ही समझ आएगा. सो स्‍ट्रीट आर्ट ऑर्गेनाइजेशन खुद समय-समय पर यहां वॉक आयोजित करता है. इसके अलावा KLoDB (Knowing & Loving Delhi Better) से सुष्मिता सरकार (myunfinishedlife.com) भी यहां वॉक आयोजित करती हैं. सुष्मिता लंबे समय से लोधी कॉलोनी में रह रही हैं. सो वे इस इलाके को बेहतर पहचानती हैं. KLODB दिल्‍ली में नि:शुल्‍क वॉक आयोजित करता है. ये अच्‍छी पहल है. ऐसे ही प्रयास कला तक पहुंचने के लिएअमीर-गरीब की खाई को पाटने में अहम भूमिका निभाते हैं. मैं खुद समय-समय पर वॉक के जरिए यहां की स्‍ट्रीट आर्ट को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा. तो अब वक्‍़त निकालिए और अपने परिवार के साथ इस नायाब दुनिया को देखने के लिए निकल पडि़ए. 

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सौरभ आर्य
सौरभ आर्य, को यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 

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