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शनिवार, 30 मार्च 2019

शहर की सूरत और सीरत बदल रही है देश की पहली आर्ट डिस्ट्रिक: लोधी कॉलोनी | India's First Art District: Lodhi Colony


शहर की गलियों और उन गलियों में घरों की दीवारों को भी कला के लिए कैनवास की तरह इस्‍तेमाल किया जा सकता है, इस एक खूबसूरत ख्‍याल ने पिछले कुछ सालों में देश के तमाम शहरों की शक्‍लो-सूरत को बदल कर रख दिया है. फिर दिल्‍ली कैसे पीछे रह सकती थी. दिल्‍ली की जिस लोधी कॉलोनी की पहचान अब तक सरकारी अफ़सरों और कर्मचारियों के घरों से होती थी वो कॉलोनी अब देश की पहली आर्ट डिस्ट्रिक बन कर देश और दुनिया के नक्‍शे पर अपनी अलग जगह बना रही है. चटख रंगों में रंगी इसकी सैकड़ों दीवारें आज हज़ारों कहानियां कह रही हैं. अगर आपको कला में ज़रा भी दिलचस्‍पी है और आपने लोधी आर्ट डिस्ट्रिक नहीं देखी तो फिर आपने बहुत कुछ नहीं देखा. स्‍ट्रीट आर्ट के माध्‍यम से कला को एकदम से आम लोगों के बीच लाकर रख देना और लोगों को कला से जुड़ने का अवसर देना अपने आप में एक क्रांतिकारी पहल है. एक नॉन प्रोफिट संगठन St+art India Foundation का स्‍ट्रीट आर्ट के साथ इस तरह प्रयोग करने का ये सिलसिला दरअसल चंद दीवारों के साथ दिल्‍ली से 2015 में शुरू हुआ था और अब तक मुंबई, हैदराबाद, बेंगलूरू, गोवा, कोयंबटूर, चेन्‍नई, चंडीगढ़ और कोच्‍ची जैसे देश के तमाम शहरों में आकर्षक रंगों और चित्रों से लबरेज़ सैकड़ों दीवारें आम शहरी की जिंदगी का हिस्‍सा बन चुकी हैं. स्‍ट्रीट आर्ट फाउंडेशन, एशियन पेंट्स जैसे प्रायोजकों और तमाम सरकारी एजेंसियों के सहयोग से देश भर में एक अनूठी कलात्‍मक क्रांति की पटकथा लिख रहा है. अभी हाल ही में 1 मार्च को St+art India Foundation ने सीपीडब्‍ल्‍यूडी और एशियन पेंट्स के साथ मिलकर देश के पहले पब्लिक आर्ट डिस्ट्रिक- लोधी आर्ट डिस्ट्रिक को जनता को समर्पित किया है.   

मैं पिछले कई वर्षों से देश के तमाम शहरों में स्‍ट्रीट आर्ट को करीब से देखने और समझने की कोशिश करता रहा हूं. शहर वाकई बदल रहे हैं और कला को लेकर उनका नज़रिया भी. एक ओर ये कला के अद्भुत नमूने जहां स्‍थानीय लोगों की जिंदगी में सकारात्‍मक परिवर्तन ला रहे हैं वहीं दूर-दूर से आने वाले पर्यटकों के लिए शहर को और भी खूबसूरत अंदाज में प्रस्‍तुत कर रहे हैं. कला अब बंद गैलरियों की मिल्कियत नहीं रह गई है बल्कि कला का लोकतंत्रीकरण हो रहा है. जो लोग आर्ट गैलरियों में नहीं जा सकते या जिनके पास इतनी फुर्सत नहीं है, उनके लिए कला ने खुद चल कर उनके गली-मुहल्‍ले यहां तक कि उनके अपने घर की दीवारों, खिड़कियों और छज्‍जों पर अपना आशियाना बना लिया है. अब हर रोज़ आस-पास के बाशिंदों को एक आर्ट गैलरी से गुज़रने का अहसास होता है. यूं कहिए कि कला अब उनकी जिंदगी का अभिन्‍न हिस्‍सा बन गई है. दिल्‍ली का लोधी कॉलोनी भी कुछ ऐसा ही इलाका है जहां मेहरचंद मार्केट से लेकर खन्‍ना मार्केट तक का हिस्‍सा एक मुकम्‍मल पब्लिक आर्ट गैलरी बन चुका है. सरकारी कर्मचारियों के घरों के बीच की दीवारों पर देशी और विदेशी कलाकारों ने पिछले कुछ बरसों में रंगों से भरी एक अद्भुत दुनिया रच दी है. हर दीवार जैसे कुछ कहती है. हर दीवार जैसे आपको अपने पास रोक लेना चाहती हो. 
2015 में शुरू हुए इस सफर में लोधी कॉलोनी में पिछले साल (2018) में तकरीबन 30 नई दीवारों पर काम हुआ था इस साल मार्च के अंत तक स्‍ट्रीट आर्ट फैस्टिवल, 2019 के खत्‍म होने तक 50 नई रंग-बिरंगी दीवारें कुछ और घरों का हिस्‍सा बन चुकी होंगी. शहर में रंगों के ऐसे अद्भुत उत्‍सव ने मुझे खुद-ब-खुद अपनी ओर खींच लिया. ये पूरा इलाका इतना बड़ा है और दीवारें इतनी अधिक हैं कि एक दिन में सभी को देखा भी नहीं जा सकता. मैं अगले दिन एक बार फिर इन गलियों में था. यकीन मानिए दो दिन की मेहनत के बाद भी कुछ दीवारें मुझसे छूट गईं.

मुझे सबसे ज्‍यादा प्रभावित किया सिंगापुर के आर्टिस्‍ट यिप येव चौंग की कलाकृति ने. फाइनेंस की बैकग्राउंड से आने वाले 50 वर्षीय चौंग ने इस दीवार पर शहर की रोजमर्रा की जिंदगी से उठाए चरित्रों को रचा है जिसमें छज्‍जे पर अखबार पढ़ते सरदार जी, मिठाई की दुकान, गाय, बांसुरी बेचने वाला, दीवारों से लटकाए हुए कालीन, नाई की दुकान जैसे आम दृश्‍य शामिल हैं. और क्‍या खूब कलाकारी की गई है. इस दीवार का हर हिस्‍सा एकदम वास्‍तविक प्रतीत होता है. चौंग की कलाकृतियों की खासियत यह है कि वे देखने वाले को क‍लाकृति का ही हिस्‍सा बन जाने के लिए आमंत्रित करती हैं. अब देखिए न, इस कलाकृति में सी‍ढ़ी और नाई की दुकान इतनी रियल है कि मैं खुद इसका हिस्‍सा बनकर तस्‍वीरों में गुम हो गया. यहां हर रोज तस्‍वीरें खिंचवाने वालों का मजमा लगा रहता है. आर्टिस्‍ट को उनके इन्‍स्‍टाग्राम हैंडल @yipyewchong पर फॉलो किया जा सकता है.
Artist: Yip Yew Chong 
Artist: Yip Yew Chong 
स्‍ट्रीट आर्ट के इन विषयों में पर्यावरण, ट्रांसजेंडर, सांप्रदायिक सौहार्द, महिला सशक्तिकरण, पक्षी, संस्‍कृति, ग्रामीण परिवेश जैसे विषय शामिल हैं. ब्‍लॉक 19 की सुनहरी मछली वाली एक मुराल पिछले वर्षों में हमारे शहरों और नदियों में प्राकृतिक आवासों की भयानक हानि को रेखांकित करती है. इसका कारण प्‍लास्टिक, मानव निर्मित सामग्रियों का जल में प्रवाह और यहां तक कि गोल्‍ड फिशजैसी एलियन प्रजातियों के दखल से नदियों की बायो डायवर्सिटी पर बुरा प्रभाव पड़ना है. ये दीवार खास तौर पर दिल्‍ली की यमुना नदी की समस्‍या को उजागर करती नज़र आती है. इस आर्टिस्‍ट का उनके ट्विटर हैंडर @H11235 पर फॉलो किया जा सकता है.
Artist: H11235
इस बार के स्‍ट्रीट आर्ट फेस्‍टीवल में तैयार की गई कलाकृतियों में से ही एक और वॉल ने मुझे अपनी ओर खूब आकर्षित किया. ये है ब्‍लॉक 12 में जर्मन आर्टिस्‍ट बांड द्वारा दीवार पर किया गया 3डी प्रयोग. ये एक तरह का augmented reality का खेल है. जिसमें देखने पर लगेगा कि दीवार में से ही कुछ आकृतियां बाहर तक उभरी हुई हैं. लेकिन ऐसा है नहीं. वहां तो केवल एक सपाट दीवार ही है. बस नज़र का धोखा है. और इस धोखे में दीवार में मौजूद खिडकियां और दरवाजे सब गुम हुए नज़र आते हैं. बांड स्‍ट्रीट आर्ट की सीमाओं को तोड़ते नज़र आते हैं. उनकी इस अद्भुत रचना के जादू को #VuforiaViewApp  के जरिए देखा जा सकता है. इस एप से इस स्‍ट्रीट आर्ट को देखने पर इसकी आकृतियां दीवार पर मचलती नज़र आएंगी. मानो वो वास्‍तव में दीवार से बाहर निकल रही हैं.   

Artist: @bondtruluv 

Artist: @bondtruluv 
कुछ इसी तरह ब्‍लॉक 9 की एक और दीवार अपने चटख रंगों और आकृतियों के कारण दूर से ही देखने वाले को अपनी ओर आकर्षित करती है. आर्टिस्‍ट @saner_edgar की ये कलाकृति में मैक्सिकन और भारतीय संस्‍कृति के समान पहलुओं को प्रदर्शित करती है. बकौल सेनर, इस चित्र की प्रेरणा उन्‍हें भारतीय दर्शन की उन अवधारणाओं से मिली है जो मैक्सिको तक पहुंची हैं. आध्‍यात्मिक पथ पर चलते हुए आत्‍म-ज्ञान से ज्ञान प्राप्‍त करने और पुनर्जन्‍म की चाह और आत्‍म-सुधार जैसे विषय इस कृति का हिस्‍सा बन गए हैं. बीच की खाली जगह के एक तरफ स्‍त्री और दूसरी तरफ एक पुरुष का चित्र सृष्टि के संतुलन को प्रदर्शित करते हैं. उनके कपडे मैक्सिकन और हिंदू परंपराओं की पहचान कराते हैं और इन दोनों संस्‍कृतियों के बीच एक सेतु की तरह काम कर रहे हैं. सेनर अपनी कलाकृतियों में अकसर मास्‍क का प्रयोग करते हैं जो मैक्सिकन सभ्‍यता का अभिन्‍न अंग है जिसका इस्‍तेमाल पशुओं की आकृति के माध्‍यम से मानव की वास्‍तविक प्रकृति को दर्शाने के लिए किया जाता है.
Artist: @Saner_edgar

Artist: @Saner_edgar

तमाम विदेशी कलाकारों के अलावा यहां कुछ भारतीय कलाकारों ने भी अपनी कलाकृतियों के माध्‍यम से अभिन्‍न छाप छोड़ी है. मुंबई के आर्टिस्‍ट समीर कुलावूर की ब्‍लॉक 17 की एक कलाकृति डिजीटल युग को प्रदर्शित करती है. उन्‍होंने इस चित्र में सोशल मीडिया और लोगों पर इसके प्रभाव को मैक्रो और माइक्रो लेवल पर दर्शाया है.
Artist: Sam_Kulavoor
अरावनी आर्ट प्रोजेक्‍ट ने दिल्‍ली की ट्रांसजेंडर कम्‍युनिटी के साथ समन्‍वय में अपनी पहली मुराल यहां ब्‍लॉक 5 में एन पी सीनियर सेकेंडरी स्‍कूल के सामने तैयार की है. एकता की थीम पर तैयार इस मुराल में उन ट्रांसजेंडर महिलाओं को प्रदर्शित करने की कोशिश की गई है जिनके साथ इस संगठन ने काम किया है. एक दिलचस्‍प बात है कि इस वॉल को तैयार करने में 15 ट्रांसजेंडर महिलाओं ने भी अपना योगदान दिया है.
Artist: Sajid Wazid

Artist: Nikunj 
कला के इन अद्भुत नमूनों को देखते हुए लोधी कॉलोनी की इन गलियों में मेरी मुलाकात अहमदाबाद के आर्टिस्‍ट निकुंज से हुई. निकुंज अभी ब्‍लॉक 5 में एक दीवार पर काम करने  की तैयारी कर रहे हैं. मुझे ये जानने में बहुत दिलचस्‍पी थी कि ऐसे किसी स्‍ट्रीट आर्ट वर्क को तैयार करने में पर्दे के पीछे कौन लोग काम करते हैं और कितना पेंट इस्‍तेमाल होता है और क्‍या-क्‍या साधन जुटाने पड़ते हैं. मेरे इन सवालों का जवाब भी मुझे जल्‍द ही मिल गया. निकुंज के लिए इस दीवार को तैयार करने की जिम्‍मेदारी निभा रहे स्‍ट्रीट आर्ट संगठन के प्रोजेक्‍ट मैनेजर नयनतारा और आरिफ भी उनके साथ साइट पर मौजूद हैं. मेरे पूछने पर नयनतारा ने बताया कि एक दीवार को आर्टिस्‍ट के लिए तैयार करने में 40 लीटर पेंट सिर्फ बेस कलर के लिए इस्‍तेमाल होता है. और इसके बाद आर्टिस्‍ट की थीम और चित्र के हिसाब से बाकी पेंट का इंतजाम किया जाता है. ये सारा पेंट एशियन पेंट्स के द्वारा उपलब्‍ध कराया जा रहा है. ऊंची दीवारों तक पहुंच के लिए क्रेन जैसी मशीन भी आर्टिस्‍ट को मुहैया कराई जाती है. मुझे बताया गया कि इस स्‍ट्रीट आर्ट फैस्टिवल में एक समय में ऐसी चार मशीनें अलग-अलग दीवारों पर काम में जुटी हैं. एक आर्टिस्‍ट के साथ कुछ वॉलंटियर भी उनकी मदद के लिए मौजूद रहते हैं. तो कुछ इस तरह तैयार होती हैं ये स्‍ट्रीट आर्ट.
पर्दे के पीछे के कलाकार : नयनतारा और आरिफ 
एक शहर के बीच रंगों के प्रति दीवानगी को रेखांकित करती वी लव दिल्‍ली’ की दीवार तो जैसे इस आर्ट डिस्ट्रिक का विजिटिंग कार्ड ही बन गई है. इस एक तस्‍वीर की भी लंबी कहानी है. वो कहानी फिर कभी. आप यहां आएं तो इसे देखने से न चूकें. 

इस आर्ट डिस्ट्रिक की कुछ और कृतियों ने मेरे दिल को छू लिया है. वे बार-बार मुझे अपनी ओर आकर्षित करती हैं. कुछ और दिलचस्‍प दीवारें यहां देखें...






पोलिश आर्टिस्‍ट NeSpoon के एम्‍ब्रॉयडरी पैटर्न हमेशा देखने वाले होते हैं लेकिन इस बार यहां बात कुछ अलग तरह से कही गई है. लोधी कॉलोनी के सेमल के लाल फूलों से प्रेरणा लेकर ब्‍लैक एंड व्‍हाइट स्‍कैच को इन चटकीले लाल पीले रंगों से इस तरह भरा है जैसे किसी ने दीवार पर कढ़ाई कर दी हो. इसमें यूरोपियन यूनियन के साथ-साथ ईशा-ए-नूर फाउंडेशन (आगा खां फाउंडेशन की एक पहल) का भी सहयोग नीस्‍पून को मिला है. इस दीवार को अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर लोकार्पित किया गया था.

ब्‍लॉक 14 में आर्टिस्‍ट आरोन @aaronglasson की कृति तो लाजवाब है. दूर से देखने पर सब कुछ एब्‍सट्रेक्‍ट नज़र आता है. मगर एक-एक हिस्‍से को अलग-अलग करके देखने पर कुछ बातें उभर कर सामने दिखने लगती हैं. इस कृति में केले के डंठल को गौर से देखिए. जहां डंठल नहीं बल्कि दो हाथ एक दूसरे को थामे हुए हैं.
Artist: @aaronglasson
St+Art Foundation के सह-संस्‍थापक और कंटेंट डायरेक्‍टर, अक्षत नौरियाल कहते हैं कि, इस साल हमारे कम्‍युनिटी आउटरीच प्रयासों को लोगों से अच्‍छी प्रतिक्रिया मिली है. हमने लगभग 7500 घरों से अखबारों में पेम्‍फलेट आदि के जरिए उनकी प्रतिक्रिया, उनकी रुचियों और लोधी कॉलोनी की कहानियों को जानने के लिए संपर्क किया था. बाद में तमाम वर्कशॉप, परफॉर्मेंस और क्‍यूरेटेड टुर भी आयोजित किए. इस सबके जरिए हम यहां के लोगों के सहयोग के लिए उनका शुक्रिया अदा करना चाहते थे. अक्षत की बात सही थी. इसकी तस्‍दीक यहां की एक कम्‍युनिटी वॉल साथ-साथभी करती है जिसे यहां के स्‍थानीय लोगों ने मिलकर रंगा है. जाहिर है कि ये एक दीवार यहां के लोगों के दिलों में लोधी आर्ट डिस्ट्रिक के प्रति गर्व और स्‍वामित्‍व की भावनाएं जगाने में सफल रही है. उस रोज आर्टिस्‍ट अखलाख अहमद इस दीवार को फाइनल टल देने में मशगूल थे. अखलाख ने बताया कि वे सिर्फ इस दीवार पर लिखे शब्‍दों को सजा रहे हैं, बाकी का पेंट यहां के बच्‍चों और लोगों ने मिलकर किया है. मैंने कई स्‍थानीय लोगों से बात की, लोग इस बात पर एकमत नज़र आए कि इस स्‍ट्रीट आर्ट ने उनकी कॉलानी को एक खूबसूरत शक्‍़ल दी है. उन्‍हें यहां रहना अब पहले से ज्‍यादा अच्‍छा लगता है. नीरस दीवारें अब बोलने लगी हैं और लोग उनके घरों को देखने आने लगे हैं. स्‍ट्रीट आर्ट के जरिए देश के शहर की सूरत बदलने के लिए St+Art का शुक्रिया का हकदार है. 
कम्‍युनिटी वॉल को अंतिम रूप देते अखलाख 
यहां हर एक दीवार की अपनी अलग कहानी है जिसे कोई समझाने वाला चाहिए. वरना यूं ही इन दीवारों के चित्रों को देखकर आधा-अधूरा ही समझ आएगा. सो स्‍ट्रीट आर्ट ऑर्गेनाइजेशन खुद समय-समय पर यहां वॉक आयोजित करता है. इसके अलावा KLoDB (Knowing & Loving Delhi Better) से सुष्मिता सरकार (myunfinishedlife.com) भी यहां वॉक आयोजित करती हैं. सुष्मिता लंबे समय से लोधी कॉलोनी में रह रही हैं. सो वे इस इलाके को बेहतर पहचानती हैं. KLODB दिल्‍ली में नि:शुल्‍क वॉक आयोजित करता है. ये अच्‍छी पहल है. ऐसे ही प्रयास कला तक पहुंचने के लिएअमीर-गरीब की खाई को पाटने में अहम भूमिका निभाते हैं. मैं खुद समय-समय पर वॉक के जरिए यहां की स्‍ट्रीट आर्ट को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा. तो अब वक्‍़त निकालिए और अपने परिवार के साथ इस नायाब दुनिया को देखने के लिए निकल पडि़ए. 

इस लेख का संपादित संस्‍करण प्रतिष्ठित पोर्टल द बेटर इंडिया पर प्रकाशित हुआ है। 

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सौरभ आर्य
सौरभ आर्य, को यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 

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गुरुवार, 28 मार्च 2019

कबाड़ से बना दुनिया का इकलौता वेस्‍ट टू वंडर पार्क | Waste to Wonder Park in Delhi.


कबाड़ से बना दुनिया का इकलौता वेस्‍ट टू वंडर पार्क 

Waste to Wonder Park in Delhi. 

कुछ कर दिखाने का जज्‍़बा हो तो सरकारी एजेंसियां भी कमाल कर दिखाती हैं. ऐसा ही एक कमाल कर दिखाया है दक्षिणी दिल्‍ली नगर निगम (एसडीएमसी) ने. एसडीएमसी ने 150 टन स्‍क्रैप मेटल से दुनिया के सात आश्‍चर्यों के शानदार नमूनों के साथ बेहद खूबसूरत वेस्‍ट टू वंडर पार्क तैयार कर दिया है. ये दुनिया का इकलौता ऐसा पार्क है जहां कबाड़ से सातों आश्‍चर्यों की प्रतिकृतियां तैयार की गई हैं. 

सराय काले खां के नज़दीक राजीव गांधी स्‍मृति वन की जमीन पर बने इस पार्क में भारत के ताज़ महल से लेकर पेरिस का एफिल टावर, पीसा की झुकती मीनार, गीज़ा का ग्रेट पिरामिड, रोम का कोलोजियम, रियो डी जेनेरियो की क्राइस्‍ट द रिडीमर की प्रतिकृति बेहद खूबसूरती से खड़ी हैं. ये सभी कलाकृतियां नगर निगम के कुल 24 स्‍टोरों में बरसों से धूल फांक रहे ऑटोमोबाइल के खराब कलपुर्जों और पंखों, रॉड, आयरन शीट्स, नट-बोल्‍ट, बाइक के हिस्‍सों, बेकार पड़ी सीवर लाइन के टुकड़ों से बनाई गई हैं. कुल 7.5 करोड़ रुपए की लागत से बना यह पार्क अब निगम के लिए आय का जरिया भी बनने जा रहा है.

Waste to Wonder Park in Delhi, वेस्‍ट टू वंडर
वेस्‍ट टू वंडर पार्क

इन दिनों बच्‍चे दिल्‍ली घूमने आए हुए हैं सो हम लोग अपने ही शहर में टूरिस्‍ट बने घूम रहे हैं. इस रविवार की शाम शुरूआत की इसी वंडर पार्क से. बस यही गुनाह कर दिया कि रविवार की शाम कहीं घूमने निकल पड़े. पार्क का उद्घाटन हुए महीना भर भी नहीं हुआ है और इस पार्क के लिए लोगों की दीवानगी का आलम ये है कि रविवार की शाम यहां हज़ारों की संख्‍या में लोग पार्क देखने आ पहुंचे. टिकट के लिए एक अलग लाइन और फिर पार्क में प्रवेश के लिए एक अलग लाइन. एक बार मन किया कि यहां से लौट चलें. मगर फिर दूर से नज़र आते एफिल टावर ने मोह लिया और उस लंबी लाइन का सितम झेल ही लिया. आप लोग अगर दिल्‍ली में रहते हैं तो भूल कर भी शनिवार या रविवार को न जाएं....पार्क कहां भागा जा रहा है. किसी भी वर्किंग डे पर इत्‍मीनान से देखिएगा.

पार्क में प्रवेश करते ही बाईं ओर एक फव्‍वारा है. सेल्‍फी के दीवानों का मजमा यहीं से लगना शुरू हो जाता है. थोड़ा आगे बढ़ते ही सबसे पहले गीज़ा का 18 फुट ऊंचा ग्रेट पिरामिड है. इस पिरामिड में कबाड़ हो चुके ट्रकों से निकली मेटल का प्रयोग किया गया है. मेटल शीट्स से बना ये मॉडल थोड़ा और ऊंचा बनाया गया होता तो और आकर्षक लगता.


The Great Pyramid of Giza at Waste to wonder park in delhi
The Great Pyramid of Giza @ Waste to wonder park

थोड़ा और आगे बढ़ने पर The Leaning Tower of Pisa’ यानि की पीसा की झुकती हुई मीनार नज़र आती है. अब तक अंधेरा होने लगा है और 25 फुट उँची इस मीनार के अंदर जलती रौशनियां इसे और अधिक आकर्षक बना देती हैं. इस मीनारे के गोल दायरे साइकिल की रिम से बने हैं और मीनार के दरवाजे पर टाइपराइटर और ग्रास कटर के हिस्‍से देखे जा सकते हैं. मीनार के चारों तरफ तस्‍वीर लेने वालों का मेला लगा है. कुछ नवविवाहित जोड़े रोमांटिक पोज़ में यहां तस्‍वीरें खिंचवा रहे हैं. दरअसल नगर निगम भी तो यही चाहता है. इस पार्क की संकल्‍पना ही एक एम्‍यूजमेंट पार्क के रूप में की गई है. जहां बच्‍चे, जवां लागों और बुजुर्गों सभी के लिए कुछ न कुछ हो.

Leaning Tower of Pisa at Waste to wonder park in delhi, पीसा की झुकती मीनार
वेस्‍ट टूू वंडर पार्क में पीसा की झुकती मीनार 

दक्षिण दिल्‍ली नगर निगम के कमिश्‍नर श्री पी. के. गोयल कहते हैं कि हमने फिल्‍म बदरी की दुल्‍हनिया में कोटा के वंडर पार्क को देखा था. बस वहीं से इस पार्क की प्रेरणा मिली. लेकिन हमने ये सातों आश्‍चर्य केवल और केवल कबाड़ से बनाए हैं. और अब हम पार्क में प्री-वैडिंग फोटो शूट की भी इजाज़त देने पर विचार कर रहे हैं. हालांकि अभी तक प्रशासन ने इस बारे में कोई सूचना जारी नहीं की है.


वेस्‍ट टू वंडर पार्क में रोम का कोलोसम, Colosseum of Rome @ Waste to wonder park
वेस्‍ट टू वंडर पार्क में रोम का कोलोसम Colosseum of Rome @ Waste to wonder park

Eiffel Tower at Waste to wonder park, New Delhi
Eiffel Tower @ Waste to wonder park

यूं तो ये पार्क सुबह 11 से रात 11 बजे तक खुला रहता है मगर इस पार्क की असल खूबसूरती गहराती रात के साथ निखर कर सामने आती है. पार्क में थोड़ा आगे बढ़ते ही आसमान की गहरी रंगत के साये में चमचमाता एफिल टावर तो बस दिल ही चुरा लेता है. मैंने असल एफिल टावर खुद तो नहीं देखा लेकिन अभी तक जितना तस्‍वीरों में देखा है ये कबाड़ से बना एफिल टावर असल से कम भी नज़र नहीं आता. 

लगभग 15 टन कबाड़ (पैट्रोल टैंक, ऑटोमोबाइट पार्ट्स, क्‍लच प्‍लेट, एंगेल, पार्क की रेलिंग) से बनी कुल 60 फुट की ऊंचाई वाली ये एफिल टावर की प्रतिकृति दर्शकों की पसंदीदा है. यहां से भीड़ बस हटने का ही नाम नहीं लेती है. इस पार्क में मौजूद सातों आश्‍चर्यों में से एफिल टावर ही अकेली ऐसी प्रतिकृति है जिसके नीचे जाकर इसे करीब से देखा जा सकता है या छुआ जा सकता है. 



अन्‍य किसी भी नमूने को छूने पर ही 1000 रुपए का जुर्माना तय किया गया है. इस प्रतिकृति को संदीप पिसालकर और प्रेम कुमार वैश्‍य ने तैयार किया है.  

Eiffel Tower at Waste to wonder park, New Delhi
Eiffel Tower at Waste to wonder park, New Delhi


Christ the Redeemer 

@ Waste to wonder park

स्‍टे्च्‍यू ऑफ लिबर्टी को गौर से देखिएगा. 32 फुट ऊंची इस प्रतिकृति में रिक्‍शा के एंगल, चिल्‍ड्रन पार्क की स्‍लाइड्स, टी-स्‍टाल, बेंचों, इलैक्ट्रिक मेटल वायर का इस्‍तेमाल किया गया है. इसके बाल साइकिल और बाइक की चेन से बनाए गए हैं और मशाल बाइक रिम, मेटल शीट्स और साइकिल की चेन से बनाई गई है. लेडी लिबर्टी ने हाथ में जो किताब पकड़ी हुई है उसे पार्क की बेंचों और मेटल शीट्स से बनाया गया है. है न अजूबा

Statue of Liberty @ Waste to wonder park

और जनाब ताज़ महल (ऊंचाई 20 फुट) की तो बस बात ही मत कीजिए. मुझे असल ताज़महल से खूबसूरत लगा ये कबाड़े से बना ताज़महल. मुझे नहीं पता किन मज़दूरों ने इसे बनाया. मिल जाएं तो उनके हाथ ही चूम लूं.




इस वंडर पार्क की एक और दिलचस्‍प बात है बिजली के मामले में इसका आत्‍मनिर्भर होना. पार्क में 15 किलोवाट सौर ऊर्जा का उत्‍पादन किया जा रहा है और इसके साथ-साथ कुछ बिजली पवन चक्कियों से भी बनाने का इरादा है. पार्क के इस्‍तेमाल के बाद जो बिजली बचेगी उसे ग्रिड में भेज दिया जाएगा जिससे निगम को आय भी होगी. एसडीएमसी की ये पहल तमाम अन्‍य सरकारी संस्‍थाओं के लिए एक नज़ीर है जो अगर चाहें तो कचरे से सोना बना सकते हैं. इससे एक तरफ कचरे का निपटान हो सकेगा और दूसरी ओर शहर की खूबसूरती में भी इजाफा हो सकेगा. तो देर किस बात की है, करा लाइये अपने परिवार को दुनिया के सात आश्‍चर्यों की सैर.


समय: प्रात: 11 बजे से रात्रि 11 बजे तक (सोमवार बंद) 
प्रवेश शुल्‍क: 

आयु
शुल्‍क
0 से 3 वर्ष
नि:शुल्‍क
3 से 12 वर्ष
25 रुपए
12 से 65 वर्ष
50 रुपए
65 वर्ष से अधिक
नि:शुल्‍क

कैसे पहुंचें: नज़दीकी मेट्रो स्‍टेशन हज़रत निजामुद्दीन मेट्रो सटेशन है. यहां से कुछ ही दर मौजूद है ये पार्क. पार्क मिलेनियम पार्क के एंट्री गेट के बहुत निकट है. 

कुछ और तस्‍वीरें वेस्‍ट टू वंडर पार्क से :












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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक (National War Memorial) : एक तीर्थ स्‍थल

राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक (National War Memorial)


देश पर अपने प्राण न्‍यौछावर करने वाले वीर सपूतों के बलिदान के प्रति कृतज्ञ राष्‍ट्र को अंतत: एक राष्‍ट्रीय युद्ध स्‍मारक प्राप्‍त हुआ. 25 फरवरी, 2019 की शाम देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक (National War Memorial) को राष्‍ट्र को समर्पित किया. ये समय का अजब संयोग ही है कि यह स्‍मारक ऐसे समय में बनकर तैयार हुआ है जब कुछ ही दिनों पहले कश्‍मीर में सीआरपीएफ के 40 जवानों पर हुए हमले के बाद देश की सीमाओं पर तनाव बढ़ा हुआ है और देश का जन-मानस एक ओर जहां प्रतिशोध की आग में जल रहा है वहीं अपने बहादुर सपूतों के बलिदान के प्रति अश्रुपूरित श्रृद्धा सुमन अर्पित कर रहा है.

दिल्‍ली में इंडिया गेट के ठीक पीछे की ओर तकरीबन 40 एकड़ क्षेत्र में फैला ये युद्ध स्‍मारक स्‍वयं में अद्भुत है. इस स्‍मारक में 1947-48 (आजादी के तुरंत बाद कश्‍मीर में कबाइली हमला), 1961 (गोवा), 1962 (चीन), 1965, 1971, 1987 (पाकिस्‍तान), 1987-88 (श्री लंका), 1999 (कारगिल) सहित ऑपरेशन रक्षक जैसे तमाम अन्‍य अभियानों में देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्‍त होने वाले योद्धाओं के नाम स्‍वर्णाक्षरों में अंकित किए गए हैं. 

National War Memorial
National War Memorial

क्‍यों बनाए गए हैं चार चक्र: 

चक्रव्‍यूह की संरचना से प्रेरित इस स्‍मारक की डिजाइन में कुल चार चक्र हैं जो सशस्‍त्र सेनाओं के अलग-अलग मूल्‍यों को रेखांकित करते हैं:

National War Memorial
National War Memorial

अमर चक्र (circle of immortality): अमर चक्र में एक 15 मीटर ऊंचा स्‍मारक स्‍तंभ और अमर जवान ज्‍योति है.

वीरता चक्र (circle of bravery): वीरता चक्र में थल सेना, वायु सेना और नौ सेना द्वारा लड़े गए छह प्रमुख युद्धों के दृश्‍य कांसे की धातु से दीवारों पर उकेरे गए हैं. इन्‍हें सुप्रसिद्ध मूर्तिकार श्री राम सुथार द्वारा तैयार किया गया है.

त्‍याग चक्र (circle of sacrifice): त्‍याग चक्र में लगभग 25,942 शहीदों के नाम 1.5 मीटर ऊंचाई की 16 दीवारों पर सुनहरे अक्षरों में अंकित हैं.

रक्षा चक्र (circle of protection): सबसे बाहरी इस सुरक्षा चक्रको 695 पेड़ों से तैयार किया गया है. ये वृक्ष रक्षा करने के लिए खड़े सैनिकों को प्रदर्शित करते हैं.

National War Memorial, राष्‍ट्रीय समय स्‍मारक, दिल्‍ली


National War Memorial, राष्‍ट्रीय समय स्‍मारक, दिल्‍ली

क्‍यों नहीं बन सका अब तक राष्‍ट्रीय युद्ध स्‍मारक:

ऐसा नहीं है कि देश में इससे पहले कोई युद्ध स्‍मारक नहीं था. मगर राष्‍ट्रीय स्‍तर के एक युद्ध स्‍मारक की मांग देश की आजादी के बाद से लगातार उठती रही है. ये जानकर हैरानी ही होती है कि राष्‍ट्रीय युद्ध स्‍मारक की मांग पहली बार 1960 में सशस्‍त्र सेनाओं की ओर से ही उठाई गई थी और इस स्‍मारक को बनकर तैयार होने में 60 बरस लग गए. दरअसल वर्ष 2006 में यूपीए सरकार ने इंडिया गेट के पास एक राष्‍ट्रीय स्‍मारक बनाने का निर्णय लिया. और 20 अक्‍तूबर, 2012 को तत्‍कालीन रक्षा मंत्री श्री ए. के. एंटनी ने एक समारोह में इस स्‍मारक को बनाए जाने की घोषणाा की. लेकिन दुर्भाग्‍यवश ये मामला अफसरशाही के बीच बरसों इधर से उधर होता रहा. फिर 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार में इस विषय पर एक बार फिर काम शुरू हुआ और अब बहुत तेजी से इसका निर्माण किया गया.

National War Memorial, राष्‍ट्रीय समय स्‍मारक, दिल्‍ली

किसने डिजाइन किया राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक: 

ये जानना भी दिलचस्‍प है कि इस स्‍मारक के प्रमुख वास्‍तुकार श्री योगेश चंद्रहसन हैं. दरअसल स्‍मारक के डिजाइन के लिए सरकार ने एक ग्‍लोबल डिजाइन कंपीटीशन के माध्‍यम से लागों से प्रविष्टियां आम‍ंत्रित की थीं. इस प्रतियोगिता में चेन्‍नई की WeBe Design Lab को विजेता घोषित किया गया. इस डिजाइन के बारे में श्री चंद्रहसन कहते हैं- 

पूरी संकल्‍पना इस विचार पर आधारित है कि युद्ध स्‍मारक एक ऐसा स्‍थान होना चाहिए जहां हम मृत्‍यु पर शोक न मनाएं बल्कि सैनिकों के जीवन और उनके बलिदान का सम्‍मान करें.

National War Memorial, राष्‍ट्रीय समय स्‍मारक, दिल्‍ली
National War Memorial

National War Memorial, राष्‍ट्रीय समय स्‍मारक, दिल्‍ली
त्‍याग चक्र के बाहर लगी टच स्‍क्रीन जिस पर शहीदों का विवरण डाल कर उनका स्‍थान देखा जा सकता है

टच स्‍क्रन का क्‍या काम है ?

त्‍याग चक्र के बाहर एक स्‍थान पर एक टच स्‍क्रीन लगी हुई है. इस स्‍क्रीन के पास खड़े जवान से मैंने इसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि इस स्‍क्रीन पर किसी भी शहीद का नाम या उसकी रेजीमेंट या उसका सर्विस नंबर डालकर त्‍याग चक्र में उसके नाम की जगह का पता लगाया जा सकता है. 

ज़रा सोचिए कि देश के सैकड़ों-हज़ारों गांवों, कस्‍बों और शहरों से जब इन हज़ारों शहीदों के परिजन और भावी पीढि़यां यहां आकर अपने भाई, पुत्र पिता, दादा, परदादा का नाम यहां सुनहरे अक्षरों में लिखा देखेंगे तो गर्व से उनका सीना कितना चौड़ा हो जाएगा. इसकी एक झलक मुझे आज भी देखने को मिली. एक सरदार जी एक जगह पर एक शहीद के नाम पर उंगलियां फेर रहे थे और फिर अपने कैमरे से उस पट्टी के साथ एक सेल्‍फी भी ली. ज़रूर कोई संबंध रहा होगा. अभी इस स्‍मारक का उद्घाटन हुए सिर्फ दो दिन हुए हैं इसलिए उद्घाटन समारोह के दौरान फूलों से की गई सजावट यथावत है. लेकिन ये स्‍मारक अपने आप में इतना खूबसूरत है कि आने वाले समय में भी यहां आने वाले लोगों को शहादत का सम्‍मान करने के लिए प्रेरित करता रहेगा. मुझे वो पंक्तियां याद हो आईं जो स्‍मारक के बीच में लगे शिला स्‍मारक के नीचे लिखी गई हैं:

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा'

तस्‍वीर : रक्षा मंत्रालय

National War Memorial, राष्‍ट्रीय समय स्‍मारक, दिल्‍ली

क्‍या बंद हो जाएगी इंडिया गेट की अमर जवान ज्‍योति: 

एक खास बात ये है कि इस शिला स्‍तंभ के भीतर प्रज्‍वलित अमर जवान ज्‍योति के साथ-साथ इंडिया गेट की अमर जवान ज्‍योति भी हमेशा जलती रहेगी. दरअसल इंडिया गेट विश्‍व युद्ध के शहीदों की याद में बनाया गया स्‍मारक था लेकिन अमर जवान ज्‍योति को 1971 के भारत-पाकिस्‍तान के युद्ध के शहीदों की याद में शुरू किया गया था. एक तरह से ये दोनों स्‍मारक एक दूसरे के पूरक ही हैं. इन दोनों को समग्रता में ही देखा जाना चाहिए. राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक के साथ-साथ निकट के प्रिंसेस पार्क में राष्‍ट्रीय समर संग्रहालय भी तैयार किया जा रहा है. कुल 500 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक तथा राष्‍ट्रीय समर संग्रहालय के निर्माण के कार्य को समय पर पूरा करने का दायित्‍व रक्षा मंत्रालय को सौंपा गया है. उम्‍मीद है जल्‍द ही ये संग्रहालय भी तैयार हो जाएगा.

परम योद्धा स्‍थल: 

Param Yoddha Sthal 


21 परम वीर चक्र विजेेताओं की प्रतिमाएं:   

इस स्‍मारक के मुख्‍य परिसर को देखकर जैसे ही हम बाहर निकलते हैं, रास्‍ता हमें सीधे परम योद्धा स्‍थल की ओर ले जाता है. दरअसल, परम योद्धा स्‍थल में कुल 21 परम वीर चक्रविजेताओं की कांसे की अर्द्ध-प्रतिमाएं लगाई गई हैं. हर प्रतिमा के साथ उनके शौर्य की कहानी पास में लगे पत्‍थर बयां कर रहे हैं. हरे-भरे लॉन और पेड़ों के खूबसूरत लैंडस्‍केप के बीच तीन दायरों में इन वीर जवानों की कहानियां आंखों के आगे से गुज़रती हैं तो हमारा सिर गर्व से खुद-ब-खुद उठ जाता है और फिर इन महान सपूतों के बलिदानों के लिए उनके शौर्य के सामने नतमस्‍तक हो जाता है. 




इन परमवीर चक्र विजेताओं में अब्‍दुल हमीद
, मेजर सोमनाथ शर्मा, अरुण खेत्रपाल, मेजर शैतान सिंह के किस्‍से में बचपन से सुनता और पढ़ता आया हूं. परमवीर चक्र विजेता अब्‍दुल हमीद के बारे में सबसे पहले मुझे पापा ने बताया था. वो नाम मैं आज तक नहीं भूला और आज उनके बुत के सामने खड़े होकर अजीब सी अनुभूति हो रही थी. जैसे पापा कहानी सुना रहे हों और मैं सुन रहा हूं. वही अब्‍दुल हमीद जिन्‍होंने 1965 के युद्ध में पाकिस्‍तान के सात पैटन टैंको को उड़ा दिया था. 

स्‍कूल सिलेबस का अनिवार्य हिस्‍सा होनी चाहिएं ये कहानियां:

ऐसी और भी कई कहानियां हैं जो इस परम योद्धा स्‍थल पर आकर जेहन में ताज़ा हो जाती हैं. हमें अपने बच्‍चों को ये कहानियां जरूर सुनानी चाहिएं. उन्‍हें बताना चाहिए कि देश के असली नायक हमारे वीर जवान हैं. मैं कई बार महसूस करता हूं कि शहीदों की कहानियों को तो स्‍कूल के सिलेबस का अनिवार्य हिस्‍सा होना चाहिए. हर क्‍लास में कुछ न कुछ पढ़ाया जाए. और बच्‍चों को ऐसे स्‍मारक अवश्‍य दिखाने चाहिएं. 


आज स्‍मारक को खुले पहला ही दिन था और मैं देख रहा था कि कई स्‍कूलों के बच्‍चे यूनीफॉर्म में अपने शिक्षकों के साथ यहां आए हुए थे. इस स्‍मारक में ड्यूटी पर तैनात फौजी उन बच्‍चों को इन शहीदों के बारे में विस्‍तार से बता भी रहे हैं और उन्‍हें जीवन में अच्‍छे काम करने और अपने देश से प्‍यार करने का मंत्र भी दे रहे हैं.



इस स्‍थान पर लगे कुल 21 बुतों से जुड़ी एक खास बात ये भी है कि इनमें से सूबेदार मेजर (ओनरेरी कैप्‍टन) बाना सिंह (सेवानिृत्‍त), सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव और सूबेदार संजय कुमार आज भी जीवित हैं. सूबेदार मेजर बाना सिंह को तो मैं 26 जनवरी की परेड़ में कई बार सीना तान कर खड़े होते हुए देख चुका हूं. ये लोग देश की धरोहर और अभिमान हैं. येे स्‍मारक किसी तीर्थ स्‍‍थल से कम नहीं. मुझे पूरा यकीन है कि ये राष्‍ट्रीय समर स्‍मारक और परम योद्धा स्‍थल आने वाली पीढियों को हमेशा इन परम योद्धाओं के बलिदान का महत्‍व समझाते रहेंगे.

एंट्री फीस: नि:शुल्‍क
समय : प्रात: 9 से सांय 6.30 (नवंबर से मार्च)
     : प्रात: 9 से सांय 7.30 (अप्रैल से अक्‍तूबर)

कुछ और तस्‍वीरें इस स्‍मारक से- 
















Pic: MOD

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