यायावरी yayavaree: Heritage
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शनिवार, 13 अप्रैल 2019

100 बरस बाद भी एक माफ़ी के इंतज़ार में है जलियांवाला बाग | Jalianwala Bagh.


कुछ घटनाएं देश की सामूहिक चेतना पर अमिट प्रभाव छोड़ जाती हैं. जलियांवाला बाग का नरसंहार भी एक ऐसी ही घटना थी जिसने न केवल पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया था बल्कि पूरी दुनिया के सामने ब्रिटिश हुकूमत के निकृष्‍टतम रूप को उजागर कर दिया था. समय का पहिया घूम कर 13 अप्रैल, 2019 को ठीक सौ साल बाद उसी जगह आ पहुंचा है जहां इस दर्दनाक घटना ने स्‍वतंत्रता संग्राम की दिशा और दशा दोनों को बदल कर रख दिया था. अमृतसर में अब तक बहुत कुछ बदल चुका है मगर जलियांवाला बाग (Jallianwala bagh) की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान बाकी हैं जो इतिहास की इस वीभत्‍स घटना की गवाही दे रहे हैं. मैंने आज से तकरीबन तीन साल पहले पहली बार जलियांवाला बाग को देखा और महसूस किया था. इत्‍तेफ़ाक से चंद रोज़ पहले एक बार फिर अमृतसर आना हुआ और मैं जलियांवाला बाग से लगती एक गली के होटल में ठहरा था. उस रोज़ भी अमृतसर में नींद जल्‍दी खुल गई तो सुबह की सैर के लिए मैं जलियांवाला बाग ही आ पहुंचा. बाग में घूमते हुए ही मुझे अचानक इस बात का ख्‍़याल आया कि इस 13 अप्रैल को इस घटना को ठीक 100 बरस हो जाएंगे. मैं अचानक से उस घटना को और करीब से महसूस करने लगा था.
Statue of Shaheed Udham Singh at Jallianwala Bagh
दरअसल जलियांवाला बाग की घटना को समझने के लिए हमें आज से 100 साल पहले उन दिनों अमृतसर और इसके आस-पास के इलाके में घट रही घटनाओं को समझना पड़ेगा. ये वो वक्‍़त था जब गांधी जी चंपारन, अहमदाबाद और खेड़ा में अपने सफल सत्‍याग्रह से उत्‍साहित थे और फरवरी, 1919 में उन्‍होंने अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रस्‍तावित रॉलेट एक्‍ट के खिलाफ देशव्‍यापी विरोध का आवाहन किया था. रॉलेट बिल वास्‍तव में आतंकवादी घटनाओं पर रोक लगाने की आड़ में भारतीयों की नागरिक स्‍वतंत्रता पर बंदिशें लगाने वाला कानून था और चुने हुए प्रतिनिधियों के विरोध के बावजूद जल्‍दबाज़ी में विधान परिषद में प्रस्‍तुत कर दिया गया था. पूरे देश को सरकार की ये हिमाक़त भारतीय जनता का अपमान लग रही थी और ये भी एक ऐसे वक्‍़त में जब विश्‍व युद्ध की समाप्ति के बाद यहां की जनता ब्रिटिश सरकार से कुछ संवैधानिक रिआयतों की उम्‍मीद कर रही थी. राजनेताओं के विरोध के संवैधानिक तौर-तरीके विफल हुए तो गांधी जी ने सत्‍याग्रह का प्रस्‍ताव रखा. इस प्रस्‍ताव का होम रूल लीग के लोगों ने समर्थन किया और गांधी जी के साथ आ गए. अब रातों रात होम रूल लीग के लोगों से संपर्क साधा जाने लगा और तय किया गया कि एक राष्‍ट्रव्‍यापी हड़ताल की जाएगी और उपवास और प्रार्थनाएं की जाएंगी. और ये भी तय किया गया कि कुछ खास कानूनों के विरोध में सविनय अवज्ञा भी की जाएगी. सत्‍याग्रह के लिए 6 अप्रैल का दिन तय किया गया मगर देश में इससे पहले ही आंदोलन छिड़ गया और जगह-जगह हिंसा भी होने लगी. पंजाब तो पहले ही अंग्रेजी जुल्‍मों का शिकार था. अमृतसर और लाहौर में विरोध बहुत तीखा हुआ जिसने ब्रिटिश सरकार को डरा दिया. गांधी जी ने खुद पंजाब जाकर इस आग को शांत करने की कोशिश की लेकिन सरकार ने गांधी जी को जबरन मुंबई भेज दिया. वहां पहले ही आग लगी थी सो उन्‍होंने वहीं रहकर लोगों को शांत करने का फैसला किया.

पंजाब के हालात लगातार बिगड़ रहे थे और अमृतसर में 10 अप्रैल को दो राष्‍ट्रीय नेताओं डाॅ. सत्‍यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के बाद टाउन हॉल और पोस्‍ट ऑफिस पर हमला किया गया, टेलीग्राफ की लाइनें काट दी गईं और कुछ यूरोपियन लोगों पर भी हमला हुआ. अब सरकार ने फौज़ को बुलाया और शहर की कमान जनरल डायर के हाथों में सौंप दी गई. कुछ इतिहासकार बताते हैं कि जनरल डायर ने शहर भर के लिए तकरीबन 21 आदेश जारी किए थे जिसमें एक जगह चार से ज्‍यादा लोगों का इकट्ठा न होना भी शामिल था लेकिन ये आदेश लोगों तक ठीक से नहीं पहुंचे. 13 अप्रैल को रविवार के दिन ही डायर ने किसी भी तरह की सभा के आयोजन को भी प्रतिबंधित करने का आदेश जारी किया लेकिन ये आदेश भी लोगों तक नहीं पहुंच सका. हर बार की तरह बैसाखी के दिन (13 अप्रैल) अमृतसर के आस-पास के इलाकों से लोग बैसाखी मनाने अमृतसर आ पहुंचे और अपने नेताओं की गिरफ्तारी के प्रति विरोध जताने के लिए जलियांवाला बाग में बुलाई गई एक शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभा में शरीक़ होने लगे.
जलियांवाला तब. स्‍त्रोत: विकीपीडिया 

दीवारों पर लगे गोलियों के निशान
जलियांवाला बाग असल में एक 6 से 7 एकड़ का खुला मैदान था जिसके चारों तरफ तकरीबन 10 फुट ऊंची दीवारें थीं. इस बाग में प्रवेश के लिए चार-पांच रास्‍ते थे लेकिन ज्‍यादातर पर ताला लगा हुआ था. बीच में एक कुआं और एक समाधी. उस रोज़ अमृतसर में व्‍यापारियों का पशुओं की खरीद एक मेला भी लगा हुआ था जो दोपहर दो बजे तक खत्‍म हो गया. लोग रास्‍ते में जलियांवाला से होकर गुज़रने लगे. हजारों लोग पास ही हरमंदिर साहब से दर्शन करके लौटते हुए यहां आ पहुंचे. उधर जनरल डायर को लगा कि लोग उसके आदेश की जानबूझकर अवमानना कर रहे हैं. डायर ने बाग के ऊपर से हवाई जहाज भेज कर पता लगाया कि यहां तकरीबन 6,000 लोग जमा हो चुके हैं. बाद में हंटर कमीशन ने ये आंकड़ा 20,000 तक बताया था. बस फिर क्‍या था जनरल डायर ने 29वें गोरखा, 54सिख और 59सिंध राइफल्‍स के 303 ली एनफील्‍ड राइफलों वाले कुल 90 सिख, बलूची और राजपूत जवानों के साथ जलियांवाला बाग में प्रवेश किया और बाग में प्रवेश और निकलने के एक मात्र रास्‍ते को घेर कर निहत्‍थे लोगों पर पूरे दस मिनट तक गोलियां बरसाईं. जनरल ने लोगों को बाग खाली करने की कोई चेतावनी भी नहीं दी. बाद में खुद डायर ने अपने बयान में कुबूला था कि उसका मक़सद बाग को खाली करना नहीं बल्कि हिंदुस्‍तानियों को सबक सिखाना था. गोलियां तब तक चलती रहीं जब तक असलाह खत्‍म नहीं हो गया. लोग जिधर जान बचाने के लिए भागते उधर ही गोलियां बरसाई जातीं. बच्चों, बूढ़े और जवान सबकी लाशें बिछने लगीं. कुछ ही लोग दीवार फांद पाए. ऐसे ही कुछ लोगों ने बाद में वहां का मंज़र बयां किया. लोग जान बचाने के लिए कुंए में भी कूद गए. बाद में उस कुंए से 120 लाशें निकलीं. जो लोग गोलियों से जख्‍़मी हुए वे बाद में भी बाग से बाहर नहीं निकल सके. क्योंकि रात में पूरे शहर में करफ्यू लगा दिया गया था. शहर का पानी और लाइट काट दिए गए. सरकार ने एलान कर दिया था कि जो लोग बाग़ में थे उन्होंने सरकार से गद्दारी की है. अब लोग कैसे बताते कि उनका कौन सगा-सम्बन्धी बाग में मर रहा है. उधर लोगों को बाग में जाने की मनाही थी सो घायलों को भी बाहर नहीं निकाला जा सका. इससे मरने वालों की संख्या में और इज़ाफ़ा हुआ. लोग मरते रहे और बेरहम डायर तमाशा देखता रहा. बताया जाता है कि डायर मशीनगन जैसे हथियारों से लैस दो मोटर गाडियां भी साथ लाया था जो बाग के संकरे रास्‍ते के कारण अंदर नहीं पहुंच सकीं. खुद जनरल डायर के बयान के मुताबिक उस रोज़ जलियांवाला में 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. उस समय की ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार कुल 379 लोग मारे गए और लगभग 1100 लोग जख्‍़मी हुए जबकि इंडियन नेशनल कांग्रेस ने मरने वालों की संख्‍या लगभग 1,000 और जख्मियों की संख्‍या 1500 बताई थी. इस नृशंसता ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था और उधर लंदन में हाउस ऑफ लॉर्ड्स से शुरूआत में जनरल डायर को मिली तारीफ़ ने आग में घी का काम किया और इस आक्रोश की परिणति 1920-22 के असहयोग आंदोलन में हुई.
जहां से लोगों पर गोलियां चलाई गईं  

लेकिन जुलाई, 1920 में हाउस ऑफ कॉमन्‍स ने जनरल डायर की निंदा की और उसे जबरन सेवानिवृत कराया गया. रबिंद्रनाथ टैगोर इस हत्‍याकांड से इतने व्‍यथित हुए कि उन्‍होंने अपनी नाइटहुड की उपाधी लौटाते हुए लिखा कि "such mass murderers aren't worthy of giving any title to anyone". इस हत्‍याकांड के तीन महीने बाद जुलाई, 1919 में अधिकारियों ने मरने वाले लोगों की ठीक पहचान के लिए स्‍थानीय लोगों की मदद मांगी. लेकिन इन हालातों में कौन सच बताता. ऐसे में मरने वालों के संबंधियों की पहचान जाहिर होने का खतरा था. उधर पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर ने जनरल डायर की करतूत का समर्थन किया और शाबासी दी.

इस घटना के बाद भारतीयों ने अपने-अपने तरीकों से ब्रिटिश सरकार को चोट पहुंचानी शुरू कर दी. ब्रिटिश सरकार के तमाम चहेतों ने सरकार से अपना नाता तोड़ लिया और दूसरी तरफ क्रांतिकारी इस हत्‍याकांड का बदला लेने की योजना बनाने लगे. इस हत्‍याकांड के गवाह और इस घटना में खुद जख्‍़मी होने वाले सुनाम के रहने वाले उधम सिंह के दिल में ये आग बरसों धधकती रही. जनरल डायर की 1927 में मृत्‍यु हो चुकी थी. उधम सिंह का मानना था कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे पंजाब का तत्‍कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर ही है. सो उधम सिंह मौके की तलाश करते रहे और अपने इरादे को अमलीजामा पहनाने के लिए लंदन तक जा पहुंचे. आखिरकार, 13 मार्च, 1940 को ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्‍सटन हॉल में गोली मार कर माइकल ओ डायर की हत्‍या कर दी. इस घटना के बाद का घटनाक्रम भी बड़ा दिलचस्‍प था. दुनिया भर के अखबारों ने इस घटना को छापा और ऊधम सिंह के कृत्‍य को उचित ठहराया. ऊधम सिंह को 31 जुलाई, 1940 को फांसी दे दी गई. उस समय पंडित नेहरू और गांधी जी ने इस हत्‍याकांड की निंदा की. लेकिन बाद में 1952 में पंडित जवाहर लाल नेहरू (तत्‍कालीन प्रधानमंत्री) ने ऊधम सिंह को शहीद का दर्जा दिया और कहा,
‘I salute Shaheed-i-Azam Udham Singh with reverence who had kissed the noose so that we may be free’

आज इस घटना को 100 वर्ष बीत गए हैं लेकिन हिंदुस्‍तान की जनता के दिलों में ये ज़ख्म आज भी ताज़ा है. जिन परिवारों के लोग इस घटना में शहीद हो गए वो कैसे इसे भुला सकते हैं. अबकी अमृतसर यात्रा में मैंने जलियांवाला बाग में एक परिवर्तन देखा था. बाग के मुख्‍य द्वार के नज़दीक जिस दीवार पर जलियांवाला बाग लिखा होता था वहां अब शहीद उधम सिंह की प्रतिमा भी लगाई गई है. शहीद उधम सिंह के बिना जलियांवाला का इतिहास अधूरा ही था. उधर इस घटना के बाद से लगातार ये मांग उठती रही है कि ब्रिटिश सरकार इस घटना के लिए आधिकारिक रूप से माफ़ी मांगे. लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ है. हांलाकि 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा था,

"A deeply shameful event in British history, one that Winston Churchill rightly described at that time as monstrous. We must never forget what happened here and we must ensure that the UK stands up for the right of peaceful protests”

लेकिन माफी शब्‍द यहां भी नहीं था. इस हत्‍याकांड के 100वें वर्ष में ये घटना एक बार फिर हमारे जख्‍मों को कुरेद रही है और दुनिया भर से लंदन पर इस घटना के लिए माफी मांगने का दबाव बनाया जा रहा है,  लेकिन ब्रिटिश सरकार शायद अभी तक इस घटना के लिए अपने दोष को स्‍वीकार नहीं करना चाहती. वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे का ताज़ा बयान आ चुका है,
“The tragedy of Jallianwala Bagh in 1919 is a shameful scar on British Indian history. As her majesty the Queen said before visiting Jallianwala Bagh in 1997, it is a distressing example of our past history with India”

इस बयान पर सिर्फ अफसोस किया जा सकता है. ब्रिटेन की माफी से इतिहास तो नहीं बदल जाएगा. लेकिन इतना ज़़रूर है कि हमारे जख्‍़म कुछ हद तक भर जाएंगे. जन अधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली ब्रिटेन की सरकार को जलियांवाला हत्‍याकांड के सौ वें वर्ष में आधिकारिक रूप से माफी मांगने का ये अवसर नहीं गंवाना चाहिए. 







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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 


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#Amritsar #jalianwalabagh #baisakhi #100yearsofjalianwala 

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

जोधुपर से जैसलमेर: एक यादगार रोड ट्रिप | Jodhpur to Jaisalmer.

जोधुपर से जैसलमेर: एक यादगार रोड ट्रिप

Jodhpur to Jaisalmer


उतरती जनवरी के साथ ही उत्‍तर भारत की फिज़ा में नरमाई घुलने लगी है। सुबह अब चुभती नहीं बल्कि गुलाबी ठंड चेहरे को नर्म और मखमली हाथों से छूकर दिन की शुरूआत कराती है। इससे पहले कि मौसम का मिजाज सूरज की तपिश से लाल हो, मैंने रंगीले राजस्‍थान के एक रंगीले हिस्‍से से मुलाक़ात तय कर ली थी। यों समझिए कि 15 फरवरी तक के ये दिन मौसम की आखिरी मौहल्‍लत हैं जोधपुर-जैसलमेर जैसे गर्म मिजाज़ इलाकों की नज़ाक़त से भरी मेहमाननवाज़ी का आनंद लेने के लिए। 

किसी काम के सिलसिले में जोधपुर आना हुआ। हुआ कुछ यूं कि तीन दिन की इस यात्रा में दो दिन जोधपुर में ही निपट गए। इधर जैसलमेर के लिए ले दे कर केवल एक दिन बचा था। एक घुमक्‍कड़ को अगर एक दिन मिल जाए तो वो पूरी दुनिया नाप देना चाहता है। कुछ ऐसा ही हाल अपना भी था। अब एक दिन में जोधपुर से जैसलमेर तक आने-जाने में लगभग 600 किलोमीटर का सफर तय कर उसी दिन वापिस जोधपुर लौटना आसान काम तो कतई नहीं था। इस तूफानी दौरे के लिए तो बढि़या सारथी की जरूरत थी। तभी ख्‍याल आया भरोसेमंद सवारी कार रेंटल सर्विस का और जोधपुर से जैसलमेर के लिए झटपट ऑनलाइन कैब बुक कर डाली

इस बार इत्‍तेफ़ाक से मेरे एक मित्र भी मेरे साथ थे जो खुद राजस्‍थान से हैं और घुमक्‍कड़ी का शौक रखते हैं। अब दो घुमक्‍कड़ मिल जाएं तो हौसला दोगुना नहीं चार गुना हो जाता है। हम तैयार थे। गूगल मैप बता रहा था कि जोधपुर से जैसलमेर तकरीबन 277 किलोमीटर पड़ेगा। 

अब जब हम जैसलमेर तक हिम्‍मत कर ही रहे थे तो दिल जैसलमेर से तकरीबन 40 किलोमीटर आगे सम में रेत के धोरों पर ढ़लते सूरज को देखने के लिए भी मचल उठा। ड्राइवर से बात की तो वह हमारे हौंसले देखकर हंस पड़ा और बोला कि सब दिखा दूंगा, लेकिन आपको सुबह 5 बजे से पहले जोधपुर छोड़ना होगा। 

मोटा-मोटा अंदाजा लगाया तो साफ हो गया कि हम सम सैंड ड्यून्‍स (Sam Sand Dunes) तक की यात्रा निपटा कर रात 10-11 बजे तक जोधपुर लौट सकते हैं। हमने उसका हुक्‍म सर आंखों पर लिया और कुछ घंटों की नींद भरने के बाद अगली सुबह ठीक 5.15 पर सफर शुरू कर दिया।

जैसे ही जैसलमेर की राह पकड़ी, एक चमचमाते हुए शानदार नेशनल हाइवे नंबर 125 ने हमारा स्‍वागत किया। ड्राइवर ने बताया कि राजस्‍थान में सड़कों का जाल बहुत अच्‍छा है और खासकर यहां हाइवे बहुत अच्‍छी हालत में हैं। जैसलमेर को जाने वाला ये हाइवे सामरिक दृष्टि से भी बहुत महत्‍वपूर्ण है। जोधपुर से जैसलमेर तक बीच-बीच में इस हाइवे के दोनों ओर फौजी ठिकाने बने हुए हैं मगर कहां कितनी फौज और साजो-सामान मौजूद है इसका पता नहीं लगाया जा सकता। कुछ निशान हैं सड़क के किनारे जिन्‍हें सिर्फ फौज के लोग ही समझ सकते हैं। इस पूरे इलाके पर फौज की अच्‍छी पकड़ थी इस बात की तस्‍दीक हाइवे से लगातार गुज़रने वाले फौजी ट्रक कर रहे थे।

जोधपुर छोड़े हमें कोई दो घण्‍टे हो आए थे और चाय की तलब और जोर मारने लगी थी। दरअसल चाय तो बहाना है गाड़ी में पड़े शरीर को सीधा करने, हड्डियों को थोड़ा पैम्‍पर करने और इस बहाने ड्राइवर को थोड़ा सुस्‍ताने का मौका देने का। और इससे भी ज्‍यादा किसी रोड ट्रिप के बीच कहीं ठहर कर सफ़र के रोमांच को चाय की चुस्‍की में महसूस करने का। 

हाइवे के एक ओर अलसाया सा ढ़ाबा नज़र आ रहा था। गूगल मैप नज़र डाली तो कोई धीरपुरा नाम की जगह थी। बस यहीं पहला पड़ाव डाला गया। उस अंधेरे हम चाय के तलबगारों के आने से ही ढ़ाबे में काम करने वालों की नींद टूटी। बड़ी खुशी-खुशी चाय तैयार की गई। कड़क अदरक वाली चाय ने ठंड की सुरसुरी को तुरंत दूर कर दिया और उधर सूरज की किरणें बस अंगडाई लेती हुई दि‍खने लगी थीं।
कुछ यूं कदमताल करते मिले रेत के टीले  

हाइवे पर जहां-जहां काम चल रहा था। कुछ ही देर में सड़क के बाईं ओर रेत के टीलों ने हमारे साथ चलना शुरू कर दिया। दूर कहीं पवनचक्कियां भी झूमती नज़र आ रही थीं। यूं ही चलते-चलते हम यात्रा के पहले पड़ाव पोकरण आ पहुंचे। यहां से हमें एक और मित्र को अपने साथ लेना था। पोकरण तो आप जानते ही होंगे। यहीं भारत ने दो परमाणु परीक्षण किए थे। पहला 1974 में जिसका कोड नेम स्‍माइलिंग बुद्धा था और दूसरा 1998 में ऑपरेशन शक्ति। 

मगर इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि न्‍यूक्लियर टेस्‍ट की वास्‍तविक जगह दरअसल पोकरण नहीं बल्कि यहां से तकरीबन 26 किलोमीटर दूर एक जगह खेतोलाई है। कुछ ही देर में हम पोकरण गांव में अपने मित्र के घर पर थे। झटपट चाय-नाश्‍ते ने धीमी पड़ती बैटरी में प्राण फूंक दिए और हम हम तीन लोग आगे के सफर पर निकल पड़े। लेकिन इस तीसरे साथी ने सड़क पर आते ही यात्रा में एक और पड़ाव राम देवरा जोड़ दिया।


पोकरण जैसे गांवों में भी कलात्‍मकता अभी जिंदा है

पोकरण के घरों की छत पर 

रोड ट्रिप का यही सबसे बड़ा आनंद है कि इसमें आप जब जी चाहे परिवर्तन कर सकते हैं। अब हवाई या रेल यात्रा में ये सुख कहां। बस फिर क्‍या था पोकरण से जैसलमेर की सड़क पर आगे-बढ़ते हम अचानक बाईं ओर राम देवरा की ओर निकल लिए। 

राम देवरा दरअसल हिंदुओं और मुस्लिमों के आराध्‍य संत बाबा रामदेव की स्‍थली है और न केवल राजस्‍थान बल्कि आस-पास के सभी राज्‍यों से हजारों की संख्‍या में उनके भक्‍त यहां आते हैं। यहां शायद सावन के महीने में कोई मेला लगता है। लोगों का कहना है कि मेले के वक्‍़त यहां हाइवे पर आधी सड़क पैदल चलने वाले भक्‍तों से भर जाती है और मंदिर में भी दर्शन करना आसान नहीं होता है। मगर उस दिन वहां कोई भीड़ नहीं थी। हमने बड़े सुकून से दर्शन किए और थोड़ी देर मंदिर परिसर के शांत माहौल में बिताए और फिर वापिस अपने सफ़र पर लौट लिए।


जैसलमेर की ओर जाने वाली सड़क एक बार फिर दोनों तरफ के वीरान इलाके को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। आगे चलकर ये सड़क कुछ दिलचस्‍प नाम वाले गांवों से होकर गुज़री। जैसे कि एक गांव का नाम चाचा था तो एक दूसरे गांव का नाम लाठी था। भला लाठी भी कोई नाम होता है गांव का। अब होता है तभी तो था। 

लाठी पार करते ही सड़क के एक ओर ऊंटों का जैसे कोई मेला लगा था। हमने गाड़ी रोक ली और इस ऊंटों के इस जमघट को निहारने लगे। ऊंटों के एक बुजुर्ग मालिक से पूछा कि ये लश्‍कर आखिर कहां जा रहा है तो उन्‍होंने बताया कि वे इन ऊंटों को बेचने के लिए ले जा रहे हैं। कुछ खरीदार इसी जगह पर आकर भी ऊंट खरीद कर ले जाते हैं। जैसे दिल्‍ली जैसे इलाकों में लोग अपने घर में गाडियों को संपत्ति की तरह देखते हैं ठीक वैसे ही राजस्‍थान के इस इलाके में ऊंट लोगों के लिए संपत्ति से कम नहीं।



जैसलमेर वॉर म्‍यूजियम 












उन बुज़ुर्गो से विदा लेकर हम एक बार फिर तेज रफ्तार से जैसलमेर की ओर बढ़ने लगे। तभी अचानक मेरी नज़र दाईं ओर एक बड़े कॉम्‍पलेक्‍स पर पड़ी। इसके मुख्‍य द्वार पर लगे बोर्ड पर लिखा था जैसलमेर वॉर म्‍यूजियम। मैंने एकदम से ड्राइवर को रुकने के लिए कहा। ड्राइवर ने बताया कि ये म्‍यूजियम अभी दो एक साल पहले ही बना है और हमें जरूर देखना चाहिए। सुबह जोधपुर छोड़ते वक्‍़त तय किया गया था कि हम बिना रुके सीधे जैसलमेर ही पहुंचेंगे और यहां एक के बाद एक पड़ाव जुड़ते चले जा रहे थे। ड्राइवर ने मन पढ़ लिया और बोला कि अभी हमारे पास समय है आप 20 मिनट में इसे देख सकते हैं। 

बस अगले 20 मिनटों में इस म्‍यूजियम में भारत-पाकिस्‍तान के तमाम युद्धों से जुड़े तथ्‍यों, जवानों की वीर-गाथाओं, युद्ध में जब्‍त किए गए पाकिस्‍तानी टैंकों, युद्धक विमानों, ट्रकों के साथ-साथ परमवीर चक्र और महावीर चक्र विजेताओं के स्‍टेच्‍यू को निहारते हुए गुजरे। तो ठीक 20 मिनट बाद हम एक बार फिर सड़क पर फर्राटा भर रहे थे। जैसलमेर अब बस 12 किलोमीटर ही दूर था मगर एक विशाल रेगिस्‍तान के बीच सांप की तरह बलखाती सड़क हमें तेजी से अपनी मंजिल की ओर लिए जा रही थी।


मगर सैकड़ों किलोमीटर के रेगिस्‍तान को पीछे छोड़ आने के बाद इस वीराने को देख-देख कर मन में एक सवाल उठने लगा कि जोधपुर जैसे बड़े शहर से इतनी दूर रेगिस्‍तान के बीच जैसलमेर नाम की कोई जगह है भी तो वह इस हजारों मील के वीराने में कैसे बसी हुई है? जवाब बड़ा दिलचस्‍प है। 

दरअसल जैसलमेर सदियों से चीन से तुर्की और इटली को जोड़ने वाले 2000 साल पुराने सिल्‍क रूट पर बसा एक शहर रहा है। लगभग 400 साल पहले व्‍यापारियों और यात्रियों ने मध्‍य एशिया में पामीर के पहाड़ों की बजाय इस थार मरुस्‍थल के बीच से होकर गुज़रना ज्‍यादा बेहरत समझा। इसीलिए जैसलमेर के आस-पास तमाम कारणों से उजड़ गए कुलधरा, खाबा और कनोई जैसे इलाकों के अवशेष इस बात की गवाही देते हैं कि ये इलाका यात्रियों का पसंदीदा पड़ाव हुआ करता था। मगर अब आजादी के बाद तो सरकार और फौज ने पाकिस्‍तान बॉर्डर के निकट एक शहर को बसाए रखना तमाम कारणों से जरूरी समझा है। 

सरकार बेहिसाब पैसा यहां के विकास के लिए खर्च करती है। मगर फिर भी जिंदगी इतनी आसान नहीं है। जिंदगी की जरूरत की चीजें यहां तक पहुंचते-पहुंचते मंहगी हो जाती हैं। पर्यटन इस इलाके के लोगों की जीवन-रेखा है और अक्‍तूबर से लेकर फरवरी के आखिर तक का वक्‍़त यहां का सीजन है। इसके बाद तो जैसलमेर की जमीन बस आग ही उगलती है। इसीलिए यहां फरवरी की शुरूआत में आयोजित होने वाले मरू महोत्‍सव ने इंटरनेशनल टूरिस्‍ट मैप पर इस इलाके की पहचान कायम कर दी है।

ड्राइवर से बातें चलती रहीं और सफर अब और दिलचस्‍प हो चला था। असल में रोड ट्रिप में अगर ड्राइवर इलाके की जानकारी रखता हो तो आप कम समय में ही इलाके के इतिहास, भूगोल और संस्‍कृति की नब्‍ज़ पकड़ लेते हैं। इस आउटस्‍टेशन कार रेंटल सर्विस के बारे में दोस्‍तों से काफी तारीफ सुन चुका था कि ये एक सस्‍ती और भरोसेमंद कार रेंटल सर्विस है और ड्राइवर के साथ अब तक के सफर ने इस कार सेवा को चुनने के मेरे फैसले को सही साबित कर दिया था। 

बातों-बातों में ही हम जैसलमेर के नज़दीक आ पहुंचे। कई किलोमीटर दूर से ही जैसलमेर फोर्ट या कहिए कि सोनार किला नज़र आने लगा। लगा कि दो-चार मिनट में ही हम फोर्ट के सामने होंगे। लेकिन अभी कहां। रोड ट्रिप आपको हर कदम पर न चौंकाए और छकाए तो रोड ट्रिप काहे की। हम जैसलमेर शहर में प्रवेश करते, इससे पहले ही गड़ीसर लेक ने अपनी ओर खींच लिया।

गड़ीसर लेक दरअसल जैसलमेर के पहले शासक राजा रावल जैसल द्वारा बनवाई गई झील है जिसका बाद में महाराजा ग‍डीसीसार ने पुननिर्माण और जीर्णोद्धार करवाया। यहां के सूर्योदय और सूर्यास्‍त के नज़ारे हमेशा यादों में बस जाते हैं। इस लेक से बाहर निकले तो पेट में चूहे दौड़ने लगे। गाड़ी को सीधे बाजार में मचान नाम के रेस्‍तरां के बाहर रोका। पहली मंजिल पर बने इस रेस्‍तरां में बैठकर तसल्‍ली से गोल्‍डन फोर्ट को निहारते हुए भोजन किया गया। उस दोपहर और फोर्ट के उस दिलकश नजारे को कभी नहीं भुलाया जा सकता।

गडीसर झील 

गडीसर झील

गोल्‍डन फोर्ट का प्रवेश द्वार
अब तक घड़ी में दोपहर का डेढ़ बज चुका था। अब शुरू हुआ जैसलमेर किले को भीतर से समझने का सिलसिला। अगले दो-ढ़ाई घंटे हमने पूरे किले का करीब से जाना और समझा। इसके बाद बारी आई पटवों की हवेलियों की। हर चीज अपने आप में पूरा इतिहास समेटे हुए है। उन हवेलियों में की गई बारीक कारीगरी तो बस मन ही मोह लेती है और पहली ही नज़र में हैरान कर देती है। 

किले से बाहर निकले तो रावणहत्‍था पर फिल्‍मी गीतों की तान पीछे तक चली आईं। उस मधुर स्‍वर लहरी के बीच हम सड़क पर आए तो पाया कि सूर्यास्‍त में अभी देर है। सड़क पर हम जहां खड़े थे वहां से एक रास्‍ता बाईं ओर कुलधरा तक जाता था। समय हाथ में था तो हम भी कुलधरा की ओर हो लिए। अब जब यहां तक आ ही गए हैं तो कुलधरा से भी मिल लेते हैं। 

कुलधरा के किस्‍से तो हम सभी सुनते ही आए हैं। अगली पोस्‍टों में इन जगहों के बारे में विस्‍तार से बात करूंगा मगर यहां संक्षेप में बताता चलूं कि कुलधरा के बारे में लोगों का मानना है कि कुलधरा वो बदकिस्‍मत गांव है जहां के बाशिंदों यानि कि पालिवाल ब्राह्मणों को वहां के दीवान सालिम सिंह के जुल्‍मों से तंग आकर इसे रातों- रात खाली करना पड़ा था। और उन्‍होंने ही इस गांव को शाप दिया था कि जैसे हम अपने गांव और घरों में नहीं रह पा रहे हैं इसी तरह कोई भी यहां नहीं बस पाएगा। बस तभी से भुतहे किस्‍से और कहानियां कुलधरा को जब-तब हमारे सामने लेकर आते रहते हैं।


सूर्यास्‍त में अब मुश्किल से आधा घंटा बचा था। और आधे घंटे बाद हम सम के उन मनमोहक रेत के टीलों के ऊपर थे जहां से ढ़लते को सूरज को देखने के लिए देश और विदेशों के सैलानी पहले से मजमा लगाए बैठे थे। हमने थोड़ी देर ऊंटों की सवारी की और फिर दिन भर की थकान उतारने के लिए खुद को रेत के हवाले कर दिया। रेत जितनी जल्‍दी गर्म होती है उतनी ही जल्‍दी ठंडी भी। रेत में पैर धंसाए हम देर तक वहां बैठे रहे और सामने सूरज किसी सुनहरी तश्‍तरी की तरह रेत में उतरता हुआ दिखने लगा।

ये नज़ारा अद्भुत था। दूर कहीं टैंटों से गीत-संगीत की आवाजें आने लगीं। वहां रात के उत्‍सव की तैयारियां जोर पकड़ रही थीं और उधर हमारी कार हमें वापिस जोधपुर ले जाने के लिए रेत के टीलों के उस पार हमारा इंतज़ार कर रही थी। बस, उन ढ़लती किरणों के बीच हम जैसलमेर को अलविदा कह कर तेजी से अपनी मंजिल की ओर बढ़ चले। जोधुपर-जैसलमेर की ये रोड ट्रिप मुझे ताउम्र याद रहेगी। आप अपनी अगली रोड ट्रिप पर कहां जा रहे हैं ?

रामदेवरा बाबा के मंदिर में दीनाराम भील के साथ...इनकी मूंछें कमाल की हैं. हैं कि नहीं ?


सोने सा चमकता ....सोनार किला

सम में रेत के धोरों पर ढ़लता सूरज



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शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

Agrasen ki Baoli: An Interesting Heritage of Delhi

अग्रसेन की बावली
समय के साथ-साथ जब शहर विस्‍तार के लिए अपनी बाहें फैला रहे होते हैं तो उसी वक्‍़त उनकी पुरानी सीमाओं के भीतर भी उनका स्‍वरूप लगातार परिवर्तित होता रहता है. शहर बार-बार करवटें लेते हैं और यही वजह है कि कुछ बरसों बाद कुछ इलाकों को पहचान पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. बनने और बिगड़ने की इसी प्रकिया में तमाम विरासतें या तो जमींदोज हो जाती हैं या फिर जैसे-तैसे अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष करती नज़र आती हैं. दिल्‍ली तो यूं भी बार-बार बसाई और उजाड़ी गई. एक समय में दिल्‍ली की तमाम बावडि़यां जो बेहद खुले इलाकों में बनाई गई थीं आज उनके चारों तहफ शहर न केवल उग आया है बल्कि उन्‍हें अपनी बाहों में इतना कस के खड़ा है कि ये विरासतें खुल कर सांस भी नहीं ले पा रही हैं. ऐसी ही एक विरासत है अग्रसेन की बावली. बावली को हिंदी में बावड़ी, मराठी में बारव, गुजराती में वाव, कन्‍नड़ में कल्‍याणी या पुष्‍करणी कहा जाता है.

कस्‍तूरबा गांधी मार्ग के नजदीक हेली रोड पर मौजूद 14वीं सदी की इस बावली के लिए पिछले कुछ सालों में लोगों की दिलचस्‍पी और दीवानगी बढ़ती गई है. हो भी क्‍यों न ? "झूम बराबर झूम" फिल्‍म का गीत बोल न हल्‍के-हल्‍केतो सभी को याद होगा ही. गुलज़ार के गीत पर राहत फतेह अली खान और महालक्ष्‍मी अय्यर की आवाज ने एक जादुई माहौल रच डाला था और इस जादू को मुकम्‍मल बनाया चांदनी रात के आगोश में डूबी अग्रसेन की बावलीके दृश्‍यों ने. कुछ ऐसा ही तिलिस्‍म फिल्‍म पी.के.ने भी रचा. पीके यानी कि आमिर खान का ठिकाना थी ये बावली. बस फिर क्‍या था...यहीं से इस बावड़ी के प्रति लोगों की दिलचस्‍पी दीवानगी में बदल गई. जिन्‍हें इस विरासत की कोई जानकारी नहीं थी वे भी तस्‍वीरों और तफ़री की चाह में यहां तक आने लगे. अब आलम ये है कि साल के बारहों महीनों यहां आने वालों, खासतौर पर युवाओं का मजमा लगा रहता है.

केजी मार्ग से हेली रोड पर मुडते ही दाईं ओर हेली लेन है बस इसी पतली सी सड़क के दूसरे छोर पर छिपी है ये बावड़ी. मैं कई बार कस्‍तूरबा गांधी मार्ग से गुज़रा मगर इस बावड़ी का कोई अंदाजा नहीं था. उन लाल बलुआ अनगढ़ पत्‍थरों से बनी ये ऐतिहासिक बावड़ी अपने अतीत के गौरव को बखूबी बयान कर रही है. ये अपने आप में आश्‍चर्य की बात है कि बरसों तक इस इलाके में काम कर चुके अधिकांश लोग भी इस तक पहुंचने का ठीक रास्‍ता नहीं बता पाते हैं. बावली तक वही पहुंच पाते हैं जिन्‍हें वास्‍तव में बावली से मोह है. वरना बावली उन पतली गलियों में छुपी बैठी है. इस बावली में नीचे की ओर उतरते हुए तीन स्‍तर बने हुए हैं जिनमें हर स्‍तर पर बैठने के लिए स्‍थान बनाए गए हैं. यकीन मानिए बावड़ी का पानी बेशक सूख गया हो मगर आज भी तपती गरमी में इसकी निचली सीढि़यों पर बैठने के सुकून का कोई जवाब नहीं.

आज भले ही हमें बावडियां एक अनावश्‍यक चीज दिखाई देती हों मगर पुराने समय में लोगों को इनका महत्‍व पता था. इसलिए बड़े-बड़े राजा महाराजाओं ने अपनी जनता के लिए कुएं और बावडियों का निर्माण दिल खोल कर कराया. पाटन की रानी की वाव, अडालज और दादा हरी की वाव जैसी देश की तमाम बावडियां तो अपने कलात्‍मक सौंदर्य के लिए विश्‍व-विख्‍यात हैं. यही वजह है कि 100 रुपए के नए नोट के पीछे गुजरात के पाटन में स्थित रानी की वावको स्‍थान दिया गया है. उस समय बावड़ियाँ समाज के लोगों के मिलने का स्‍थान भी थीं. खासकर महिलाएं यहां बैठकर अपने दुख-सुख साझा किया करती थीं. इसी तरह देश के अन्‍य इलाकों में भी तमाम बावडियां अपने साथ अपने समय के समृद्ध सांस्‍कृतिक इतिहास की गवाही दे रही हैं. 

माना जाता है कि इस बावड़ी का निर्माण महाभारत काल में हुआ था और बाद में अग्रवाल समाज ने इसका जीर्णोद्धार कराया था. बावली की बनावट इसके तुग़लक (1321-1414) और लोदी काल (1451-1526) अर्थात 13 वीं से 16वीं शताब्‍दी के दौरान का होने की ओर इशारा करती है. 108 सीढि़यों वाली ये बावली उत्‍तर से दक्षिण तक 60 मीटर लंबी और 15 मीटर चौड़ी है. बावली के उत्‍तरी सिरे पर 7.8 मीटर व्‍यास वाला एक कुआ है जो पानी से भरने पर एक शाफ्ट से बावली को भी पानी से भर देता था. एक खास बात जो मैंने यहां महसूस की वो ये थी कि वावली में नीचे उतरने के लिए बनाई गई सीढ़ी में इस्‍तेमाल किए गए पत्‍थरों का आकार एक समान नहीं है और सीढि़यों की ऊंचाई आम तौर पर बनाई जाने वाली सीढियों की ऊंचाई से ज्‍यादा है. अब इसकी वजह एक ही हो सकती है कि उस वक्‍़त इस इलाके में रहने वाले लोग आमतौर पर लंबे कद के थे. अलबत्‍ता इस बारे में मुझे कहीं पढ़ने को नहीं मिला. बावली का पानी सूख चुका है मगर आज भी इसका अधिकांश हिस्‍सा पहले की तरह कायम है. एक वक्‍़त था जब यहां लोग तैराकी सीखने के लिए आया करते थे. मगर अब यह जगह दिल्‍ली की भुतहा जगहों में शुमार हो चुकी है. रात के वक्‍़त इस तरफ़ कम ही लोग आते हैं और बावली को लेकर तमाम तरह के किस्‍से कहानियां लोगों की जुबान पर हैं. कुछ लोगों का कहना है कि इस बावली में तमाम लोगों ने कूद कर अपनी जान दी हैं सो बावली में भूत या आत्‍माएं अन्‍य लोगों को इसमें कूदने के लिए आवाजें देते हैं. कुछ जगहें सुनी-सुनाई बातों के आधार पर भी बदनाम हो जाती हैं. क्‍योंकि बावली में आत्‍महत्‍या करने का अभी तक सिर्फ एक ही मामला प्रकाश में आया है.

बावली की पश्‍चिम दिशा में तीन प्रवेश द्वारों वाली एक मस्जिद है जो अब पूरी तरह से खंडहर हो चुकी है और वक्‍़त के थपेड़ों के आगे कितने दिन और टिक पाएगी कहना मुश्किल है. मैंने उस रोज इस मस्जिद की दीवारों को देखा तो आभास हुआ कि अपने निर्माण काल में ये छोटी सी मस्जिद बहुत खूबसूरत रही होगी. इसकी छत व्‍हेल मछली जैसी दिखाई पड़ती है और अंदर से इसकी आकृति किसी चैत्‍य की तरह लगती है. मुझे सबसे ज्‍यादा इसके खंबों पर पदक अलंकरण जैसी आकृतियों ने आकर्षित किया. उन पर क्‍या लिखा है ये तो मैं नहीं समझ पाया. ये बावली उग्रसेन की बावली है या अग्रसेन की बावली इस बात का भी कोई साफ़-साफ़ अंदाज़ा नहीं लग पाता है. बावली के बाहर लगे आधिकारिक पत्‍थर पर इसका नाम उग्रसेन की बावली खुदा हुआ है. जबकि राष्‍ट्रीय अभिलेखागार के रिकॉर्ड में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए नक्‍़शों में इसका नाम ऊजर सेन की बावली पाया गया है. इसी नक्‍़शे में अग्रसेन की बावली के नज़दीक ही उत्‍तर-पश्चिम में एक और बावली को दिखाया गया है मगर 1911 में भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्‍ली हो जाने और दिल्‍ली को नए सिरे से बसाए जाने के दौरान हुए निर्माण कार्यों में संभवत: यह बावड़ी गायब हो गई.

इस बावड़ी के साथ एक और दिलचस्‍प किस्‍सा जुड़ा हुआ है। आपने प्रसिद्ध फोटोग्राफर रघु राय का 1971 में खींचा गया वो ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फोटो Diving into Ugrasen Ki Baoli, a 14th century monumentअवश्‍य ही देखा होगा जिसमें बावड़ी ऊपर तक लबालब भरी हुई है और एक लड़का बावड़ी में छलांग लगा रहा है। लोकप्रिय लेखक सैम मिलर ने 2008 में प्रकाशित हुई अपनी किताब Delhi: Adventures in a Megacity में इस फोटो से जुड़े एक किस्‍से के बारे में लिखा है. दरअसल इस फोटो के खींचे जाने के 26 साल बाद जब वो इस बावड़ी के देखने के लिए आए तो इस पर ताला लगा हुआ था. और एक गार्ड ने आकर अनमने ढंग से इसे खोला. मिलर रघु राय के फोटो को हजारों बार देख चुके थे. सो जिज्ञासावश उन्‍होंने वही फोटो उस गार्ड को दिखा कर पूछा कि क्‍या उसने ये फोटो देखा है. गार्ड के जवाब ने मिलर को हैरान कर दिया. दरअसल रघु राय के फोटो में बावड़ी में छलांग लगाने वाला लड़का वो गार्ड बाग सिंह खुद ही था. सबूत के तौर पर बाग सिंह ने अपनी जेब से रघु राय का वही फोटो निकाल कर दिखा दिया जो किसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. अब मिलर ने आज के बाग सिंह का एक फोटो खींचा जो उनकी पुस्‍तक में प्रकाशित हुआ है. जैसा कि तस्‍वीर से साबित होता है कि 1970 तक बावली में खूब पानी हुआ करता था मगर बाद में इस इलाके में कंक्रीट का जंगल उग आने से पानी सूखता गया और बावली की हालत खराब होती गई. रघु राय के फोटो और आज के बावली के फोटो की तुलना से एक बात और साफ होती है कि 1970 के बाद पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने बावड़ी का बखूबी जीर्णोद्धार किया है. रघु राय के फोटो में टूटे और जर्जर हालत में नज़र आ रहे हिस्‍से अब अच्‍छी हालत में हैं.

ये मेरे लिए भी बहुत अजीब था कि मेरे बहुत नज़दीक‍ होने के बावजूद मुझे इस धरोहर तक पहुंचने में कई बरस लग गए. अक्‍सर ऐसा ही होता है. हम अपने आस-पास की चीजों को हमेशा हल्‍के में लेते हैं कि कभी भी देख आएंगे मगर ये कभी भीकभी नहीं आता है. या फिर बरसों बाद जब कभी मौका लगता है तो हम पाते हैं कि वहां चीजें अब वैसी नहीं रह गई हैं जैसी बरसों पहले हुआ करती थीं. आज के शिमला, मनाली और मूसरी जैसे शहर आज से महज 10-15 बरस पहले ऐसे नहीं थे. कुछ ऐसा ही हमारी विरासतों के साथ भी होता है. सदियों पुरानी ये विरासतें हर गुज़रते दिन के साथ ढ़ल रही हैं. हर रोज़ उनकी उम्र घट रही है. तमाम संरक्षण के प्रयासों के बावजूद हम लंबे वक्‍़त तक इन सबकों बचा कर नहीं रख पाएंगे. एक और बात है जब लोग अपनी विरासतों के प्रति उदासीन हो जाते है और इन्‍हें देखने नहीं जाते हैं तो सरकारें और प्रशासन भी इनके रख-रखाव में दिलचस्‍पी नहीं लेते हैं. तमाम विरासतों के आस-पास चरसिए और गंजेडियों के अड्डों को जमते हम सभी ने देखा है. इस सबके लिए हम लोग भी जिम्‍मेदार हैं. हम अपने बच्‍चों से अपनी विरासतों के बारे में शायद ही कभी बात करते हैं या उन्‍हें वहां घुमाने ले जाते हैं. इसलिए यदि हमें अपनी विरासतों से मुहब्‍बत है तो जितना जल्‍दी हो सके इन्‍हें देख आना चाहिए. कौन जाने आज से 10-15 बरस बाद ये मिट्टी में मिल चुकी हों.

समय: सुबह 7 से शाम 6 बजे तक
प्रवेश : नि:शुल्‍क
जंतर मंतर : 1.5 किलोमीटर
इंडिया गेट: 2 किलोमीटर












सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 

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