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गुरुवार, 31 मई 2018

बलबन की क़ब्र | Tomb of Balban: An Ignored Heritage in Delhi



बलबन का मक़बरा
कुछ दिनों पहले जब दिल्‍ली के महरौली आर्कियोलोजिकल पार्क में गयासुद्दीन बलबन की बदहाल कब्र को देखा तो किसी का कहा गया एक शेर याद हो आया
मौत ने ज़माने को ये समा दिखा डाला कैसे कैसे रुस्तम को खाक में मिला डाला,
याद रख सिकन्दर के हौसले तो आली थे जब गया था दुनिया से दोनों  हाथ खाली थे
अब चाहे सिकंदर हो या कोई और सुल्‍तान सभी को एक दिन खाक में मिलना पड़ा. मगर बलबन की क़ब्र आज जिस हाल में है उसे देख कर लगता है कि समय ने उसके साथ कुछ ज्‍यादा ही ज्‍यादती की है. लगता नहीं कि आर्कियोलोजिकल पार्क के उस कौने में बुरी हालत में इस कब्र के भीतर एक समय का बहुत ताकवर सुल्‍तान सोया हुआ है. ये वही सुल्‍तान है जिसे लोग लेट कर सलाम करते थे और उसके ताज और पैरों को चूमा जाता था. मगर आज उसका नाम लेने वाला भी कोई नहीं है. उसके बाद दिल्‍ली के तख्‍़त पर बैठने वालों के बड़े मक़बरे दिल्‍ली की विरासत का हिस्‍सा बन गए मग़र बलबन के हिस्‍से में यही गुमनाम सी जगह आई.
बलबन का मक़बरा
भारतीय-इस्‍लामी वास्‍तुशिल्‍प के एतिहासिक महत्‍व का ये मक़बरा 1287 में महरौली में बनाया गया था. ये अपने आप में बहुत दिलचस्‍प है कि भारत में मेहराबों का प्रयोग पहली बार इसी मक़बरे की दीवारों में किया गया था और यहां तक कि माना जाता है कि गुंबद का प्रयोग भी पहली बार इसी मक़बरे में किया गया था। मगर अब गुंबद के अवशेष भी बाकी नहीं हैं और उस दौर का जो शुरुआती गुंबद अभी भी मौजूद है उसे नज़दीक के कुतुब कॉम्‍पलेक्‍स में 1311 में बने अलाई दरवाजे में देखा जा सकता है। इसलिए भारत में पहले गुंबद की बात चलती है तो इसी अलाई दरवाजे का नाम लिया जाता है. इन गुंबदों की कहानी भी बड़ी दिलचस्‍प है...पहले यहां अच्‍छे कारीगर थे सो ठीक-ठाक गुंबद बनने लगे मगर 14वीं सदी में मुहम्‍मद बिन तुग़लक द्वारा राजधानी को दौलताबाद ले जाने के कारण अच्‍छे कारीगर भी उधर ही चले गए और फिर काफी समय तक कोई उल्‍लेखनीय गुंबद शैली का निर्माण नहीं हुआ. फिर लोधी सल्‍तनत में खूब गुंबद बने और मुग़लिया सल्‍तनत का पहला बड़ा और उल्‍लेखनीय गुंबद 1562 से 1571 के बीच एक पर्शियन वास्‍तुकार द्वारा हुमायूं के मक़बरे में बनाया गया. खैर, फिलहाल बात बलबन की हो रही है तो साहब, आज उसके मक़बरे में देखने लायक ज्‍यादा कुछ नहीं बचा है. बस खंडहरों के बीच वीराने में गुमनाम सी कब्र के इर्द-गिर्द मक़बरे की दीवारों के कुछ अवशेष ही बचे हैं. कुछ इतिहासकारों में तो इस कब्र को लेकर भी मतभेद है. कुछ का मानना है कि ये क़ब्र बलबन की न होकर उसके बड़े बेटे प्रिंस मुहम्‍मद (खान शहीद) की है. मगर इस बात के कोई सबूत नहीं हैं इसलिए अधिकांश इतिहासकार इसे बलबन की ही कब्र मानते हैं. इब्‍नेबतूता ने बलबन की मौत के 50 साल बाद लिखा था- 

“He had built a house which he called Darul Aman. The Sultan was buried in this building and I have visited his tomb”. 

इब्‍नेबतूता की ये टिप्‍प्‍णी भी इस क़ब्र की पहेली को नहीं सुलझा पाई मगर इतना तय कर गई है कि ये मक़बरा बलबन का ही है और यही दारुल अमन है. 

क़ब्र तक पहुंचते-पहुंचते आसमान में घनघोर काले बादल घिर आए थे और बारिश किसी भी वक्‍़त हो सकती थी. भला ये भी कोई वक्‍़त और मौसम हुआ किसी सुल्‍तान से मिलने का. या फिर सुल्‍तान से ऐसे ही मौसम में मिलना लिखा था. अख़बार की दुनिया में काम करने के दिनों से ही मुझे अपने विषय को बेहतर समझने के लिए आस-पास की थाह लेने की आदत पड़ गई है. सबसे बेहतर जानकारियां उस जगह के आस-पास रहने वाले लोग देते हैं. अब यहां इस वीराने में मुझे कौन बलबन के किस्‍से बताता. उस रोज केवल एक शख्‍़स वहां शकरकंदी बेच रहा था. सो उसी से शकरकंदी लेकर टटोलना शुरू कर दिया. उसने बताया कि साहब, यहां अजीब अजीब किस्‍म के लोग आते हैं. कुछ तो कॉलेज के लड़के-लड़कियां तफ़री के लिए आते हैं, शनिवार-इतवार को कुछ प्रोफ़ेसर टाइप लोग भी आते हैं और साहब रात के वक्‍़त भी लोग आते हैं और न जाने क्‍या-क्‍या तंत्र-मंत्र करते हैं. इस जगह पर पैरानॉरमल एक्टिविटी के बारे में तो मैंने सुना था. मगर ये जानना हैरानी भरा था कि सप्‍ताह के कुछ खास दिनों में लोग यहां मन्‍नतें मांगने भी आते हैं. ये जिन्‍नों से दुआएं मांगने का मामला है. इस कहानी के तार इतिहास से भी जुड़े हुए हैं. इतिहासकारों और लोगों का मानना है कि बलबन का ये मक़बरा बलबन का बनाया दार-उल-अमन (Place of Peace/Refuge) है जहां प्रवेश करते ही कर्ज़दार अपने कर्जों से मुक्‍त हो जाते थे. यहां तक कि यदि कोई हत्‍या करके भी इस दार-उल-अमन में आ जाता तो सुल्‍तान उसे बचा लेता था. हमारे देश में तो लोग ऐसे कि़स्‍सों को सिर आंखों पर ले लेते हैं. यही वजह है कि आज भी बहुत से लोग इस दार-उल-अमन में अपने कर्जों से मुक्ति के लिए दुआएं मांगने आते हैं. ऐसे काम के लिए तो लोग पीर-फ़कीरों की मज़ारों पर भी जाया करते हैं फिर ये तो एक सुल्‍तान की सैकड़ों वर्ष पुरानी क़ब्र है. मामला जितना पुराना उतना जानदार. मगर इस क़ब्र के आस-पास के इलाके की न सलीके से देखभाल हो रही है और न ही साफ-सफाई. ये जगह अब प्रेमी जोड़ों के लिए छुप कर इश्‍क़ फ़रमाने के काम आने लगी है. बेहतर ही दिल्‍ली सरकार या पुरातत्‍व विभाग इस ओर थोड़ा ध्‍यान दे और इस सुल्‍तान को उसकी वाजिब इज्‍़ज़त बख्‍़शे.
आखिर कौन था बलबन?
जिसे दुनिया ने गयासुद्दीन बलबन के नाम से जाना उसका असल नाम बहाउद्दीन था और दिल्‍ली सल्‍तन में गुलाम वंश के शासन में 1266 से 1286 तक दिल्‍ली पर राज किया. बलबन वास्‍तव में एक इलाबरी जनताति का तुर्क था जिसे उसके बचपन में मंगोलों ने बगदाद के बाजार में गुलाम के रूप में बेच दिया था. किस्‍मत का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि बलबन भारत आ पहुंचा और सुल्‍तान इल्‍तुतमिश ने उस पर दया करके उसे मोल खरीद लिया. बलबन ने जी लगा कर अपने मालिक की सेवा की और अपनी स्‍वामीभक्ति के परिणामस्‍वरूप सुल्‍तान ने चेहलगन या चालीसा के दल में शामिल कर लिया गया. ये दरअसल 40 दरबारियों का दल था जिसका शासन और प्रशासन में पूरा दखल था. बाद में रजि़या सुल्‍तान के शासन में उसे अमीर-ए-शिकार बनाया गया. शुरुआत में तो बलबन रजिया सुल्‍तान के प्रति वफ़ादार रहा मगर बाद में रजिया सुल्‍तान द्वारा हिंदुओं के ऊपर लगने वाले जजिया कर को ख़त्‍म करने से नाराज होकर दरबारी लोगों का समर्थन किया जिन्‍होंने रजिया को दिल्‍ली के तख्‍़त से उतार दिया. नए सुल्‍तान बहरम शाह ने बलबन की इस मदद का इनाम उसे हांसी और रेवाड़ी का गवर्नर भी बनाकर दिया. सन 1245 में बलबन ने मंगोलों से लोहा लेकर उन्‍हें खदेड़ दिया और अगले ही साल जब महमूद नसीरुद्दीन शाह सुल्‍तान बना तो उसने बलबन को अपना मुख्‍यमंत्री बनाया. 
बलबन ने 20 वर्षों तक सुल्‍तान के दाहिने हाथ के रूप में काम किया और दरबार के भीतर और बाहर के विद्रोहियों को खत्‍म कर दिया. प्रसन्‍न होकर सुल्‍तान ने अपनी बेटी का विवाह बलबन से कर दिया. सुल्‍तान ने बलबन को उलुघ खान के शीर्षक से नवाजा और नायब-ए-मामलिकात या कहिए कि उप-सुल्‍तान बना दिया. इस दौरान बलबन लगातार जंग जीतता रहा और बागियों को खत्‍म करता रहा. इसीलिए सुल्‍तान की मौत के बाद फरवरी 1265 में बलबन ने बिना किसी के विरोध के ताज को संभाला. तब तक चालीसा के लोगों की ताकत बढ़ चुकी थी और वे बलबन से जलने लगे थे. ताज संभालने के बाद सबसे पहले बलबन ने चा‍लीसा के बचे-खुचे लोगों को मौत के घाट उतार दिया और विद्रोह की संभावनाओं को खत्‍म कर दिया. बलबन ने जब तक राज किया पूरी धमक और सख्‍ती से किया.
बलबन ने अपने दरबार को भी दुरुस्‍त किया. बलबन की सख्‍ती का आलम ये था कि कोई उसके दरबार में मुस्‍कुराने की खता भी नहीं कर सकता था. उसने खुफिया विभाग तैयार किया और जासूसों की एक फौज को अपने राज्‍य के तमाम हिस्‍सों में तैनात कर दिया ताकि किसी भी विद्रोह की ख़बर सुल्‍तान को मिलती रहे. रूहेलखंड में विद्रोहियों ने सिर उठाया तो बलबन ने उनके गांवों के सभी पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया. बलबन ने दिल्‍ली में बैठ कर भी बंगाल तक के इलाके को नियंत्रित किया और अपने पुत्र बुगरा खान को बंगाल का गवर्नर बना दिया. फिर 1279 और 1285 में मुगलों के आक्रमण को भी बलबन ने विफल कर दिया मगर इस खेल में बलबन ने अपने बेटे मुहम्‍मद को खो दिया और इसी ग़म ने बलबन को भीतर से तोड़ कर रख दिया और 1287 में उसने दुनिया को अलविदा कह दिया.     
एक सुल्‍तान के तौर पर बलबन ने अपनी काबिलियत को बखूबी साबित किया और सही मायनों में बलबन इल्‍तुतमिश का वारिस था. उसने अपने राज को बेहद बुद्धिमानी और कानून आधारित व्‍यवस्‍था से चलाया. इसीलिए इतिहासकारों ने उसकी प्रशंसा की है. उसका न्याय पक्षपात रहित था और उसका दंड अत्यंत कठोर.  इसीलिए उसकी शासन व्यवस्था को लौह रक्त की व्यवस्था कहकर संबोधित किया जाता है. वास्तव में उस समय ऐसी ही व्यवस्था की आवश्यकता थी.
बलबन के मक़बरे की ओर जाने वाला रास्‍ता











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बुधवार, 24 जनवरी 2018

Indore: A Tale of Cleanest City of India

कहानी सबसे स्‍वच्‍छ शहर इंदौर की
अपने देश में जहां शहरों में गंदगी, कूड़े के ढ़ेर, सड़कों पर बहता नालियों का पानी और सीवरों का जाम होना आम बात हो वहीं इसी देश में एक ऐसा शहर भी है जो वर्ष 2017 में क्‍लीनेस्‍ट सिटी चुना गया और 2018 में भी सबसे स्‍वच्‍छ शहर का खिताब अपने नाम करने के लिए इस वक्‍़त पूरी शिद्दत से जुटा हुआ है। 

स्‍वच्‍छता के लिए एक दीवानगी सी पूरे शहर में नज़र आती है मानो इस शहर के प्रशासन और इसके नागरिकों की जि़ंदगी का सबसे ज़रूरी काम शहर को स्‍वच्‍छ रखना है। आप चाहे चाट-खौमचे के अड्डे छप्‍पन चले जाएं या देर रात गुलज़ार होने वाले सर्राफ़ा की तंग गलियों पर नज़र डालें...मजाल है कि ज़रा भी गंदगी कहीं नज़र आ जाए।

राजवाड़ा के ठीक सामने स्‍वच्‍छता का संदेश
मैंने ख़ुद रात 11 बजे भी सफ़ाई कर्मचारियों को सड़कों को बुहारते और गाडियों को कचरा उठाते देखा है। शहर के हर इलाके में कचरे वाली गाडि़यों के आने का समय तय है। अगर गाड़ी तय वक्‍़त पर नहीं आती है तो ज्‍यादा से ज्‍यादा 15 मिनट इंतज़ार करने के बाद आपको सिर्फ एक नंबर पर मिस कॉल देनी है. इसके बाद नियंत्रण कक्ष खुद आपसे संपर्क करेगा और दूसरी गाड़ी मौक़े पर भेजी जाएगी। कचरा उठाना एक बात है मगर गीले, सूखे और घरेलू जैव कचरे का अलग-अगल वेस्‍ट मैनेजमेंट करना दूसरी। कचरे के प्रबंधन की भी बेहतरीन व्‍यवस्‍था सुनिश्चित की गई है। 

इस तरह निगम प्रशासन ने शहरवासियों को एक मुकम्‍मल इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर मुहैया करवाया है और अब शहरवासी उसकी कद्र करते हुए इस पूरे अभियान को सिर-माथे उठा कर आगे चल रहे हैं। इस पूरी कवायद में बच्‍चों का जुड़ जाना इस अभियान की सार्थकता और इसकी जीवंतता का परियाचक है। लोगों का कहना है कि, ‘साहब अब तो बच्‍चे हमें टोकने लगे हैं कि पापा गन्‍दगी करना बुरी बात है और खुद ही हमारे गिराए हुए पॉलिथीन या लिफ़ाफ़े को उठा लेते हैं

बसें बस एक ही संदेश दे रही हैं इन दिनों 
छप्‍पन का व्‍यस्‍ततम इलाका...मगर गंदगी नदारद है
शहर में सैकड़ों सार्वजनिक शौचालय बनाए गए हैं। मैंने पिछले चार दिनों में किसी को दीवारों पर मूत्र विसर्जन करते नहीं देखा। पूरे शहर में जहां कहीं भी जगह मिली वहीं दीवारों, बाउंड्रियों, खंबों, दुकान के शटरों, बसों, ऑटो और यहां तक कि मंदिरों में भी हर जगह को स्‍वच्‍छता के संदेशों से रंग दिया गया है। शहर में हर सड़क के किनारे अलग-अलग तरह के कचरे के लिए डस्‍टबिन लगे हैं और कार चालकों को सस्‍ते कार डस्‍टबिन भी दिए जा रहे हैं। इसके लिए बाकायदा विक्रय केन्‍द्र भी खोले गए हैं। आप लोकेटर की मदद से नज़दीकी शौचालय ढूंढ सकते हैं और तमाम सुविधाओं के लिए हेल्‍पलाइन नंबर 1969 पर संपर्क कर सकते हैं। मोबाइल एप भी खूब लोकप्रिय हो रहा है। 

प्‍लास्टिक कचरे को रीसाइकल करने की मशीन
रीसाइकल योग्‍य प्‍लास्टिक कचरे को रीसाइक्लिंग मशीनों में डालने पर गिफ्ट वाउचर्स मिलते हैं। हालांकि छप्‍पनके बाज़ार में लगी एक ऐसी मशीन मुझे बंद हालात में मिली। संभव है हाल-फिलहाल में खराब हुई हो। चीजों को दुरुस्‍त रखना अपने-आप में एक चुनौती है। किसी भी व्‍यवस्‍था को शुरू करना आसान है मगर उसे बनाए रखना बहुत कठिन होता है। फिर भी कमोबेश स्थिति बेहतर नज़र आती है। 

कुछ लोग इस कवायद का श्रेय निगम कमिश्‍नर मनीष सिंह को देते हैं तो कुछ लोग इस अभियान की सूत्रधान यहां की महापौर श्रीमती मालिनी गौड़ को मानते हैं। एक महानगर जैसे शहर को लगातार साफ़ रखना यकीनन आसान काम नहीं है। चुनौतियां लगातार सामने आती हैं। इन चुनौतियों में एक चुनौती है धार्मिक जुलूसों आदि में होने वाली गंदगी से निपटना और आयोजकों को सफ़ाई के प्रति संजीदा बनाना। निगम इसके लिए कोई रियायत नहीं बरतता है। कुछ स्‍थानीय मित्रों ने बताया कि अभी हाल में निगम ने एक धार्मिक समुदाय के जुलूस से हुई गंदगी के लिए 50,000 का दंड लगाया तो वहीं दूसरे धार्मिक समुदाय द्वारा जलाशयों को गंदा करने पर मोटा जुर्माना ठोका है। शहर में किसी भी तरह की गंदगी फैलाने वालों को बख्‍शा नहीं जा रहा है। रेहड़ी खौमचे वालों को सख्‍़त हिदायत है। इस तरह इंदौर तमाम शहरों के लिए रोल मॉडल बन सकता है। 




स्‍वच्‍छता के लिए प्रेरित करने का सबसे रोचक अंदाज़ मुझे यहां के खजराना मंदिर में मिला जहां स्‍वयं भगवान की ओर से संदेश दीवारों पर चस्‍पा हैं कि मैं आपका घर गंदा नहीं करता हूं, आप मेरा घर गंदा न करें। बात सीधी सी है और यही बात शहर पर भी लागू होती है। हम अपना घर साफ रखना चाहते हैं तो शहर को क्‍यों गंदा करते हैं ? हम जब पूरे शहर को अपना घर मानेंगे तभी हम शहर को स्‍वच्‍छ रख पाएंगे। अन्‍यथा स्‍वच्‍छता अभियान केवल एक फोटो अपॉर्चुनिटी बन कर रह जाएगा। 
खजराना मंदिर परिसर

इंदौर रहेगा नंबर 1
कैसे चुना जाता है सबसे स्‍वच्‍छ शहर ?
क्‍लीनेस्‍ट शहरों का चयन शहरी विकास मंत्रालयभारत सरकार और केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा प्रकाशित की जाने वाली नेशनल सिटी रेटिंग के आधार पर किया जाता है। स्‍वच्‍छ भारत अभियान सर्वेक्षण 2017 में कुल 500 शहरों को शामिल किया गया है और पूरे देश को पांच जोन में बांट कर हर शहर को कुल 19 मानकों पर परखा गया है। शहरी विकास मंत्रालय द्वारा Quality Council of India को यह सर्वेक्षण करने के लिए अधिकृत किया गया है। इसका सर्वेक्षण का उद्देश्‍य शहरों के बीच प्रतिस्‍पर्धा को बढ़ावा देना और उन्‍हें अपनी स्‍वच्‍छता का स्‍तर जानने का अवसर प्रदान करना है। हर शहर के प्रदर्शन को
·        म्‍युनिसिपल सोलिड वेस्‍ट – झाडू लगाना, कचरे का संग्रहण और ढुलाई
·        म्‍युनिसिपल सोलिड वेस्‍ट – प्रसंस्‍करण और ठोस कचरे का निस्‍तारण
·        खुले में शौच से मुक्‍त होना/ शौचालयों की व्‍यवस्‍था
·        क्षमता निर्माण और इलैक्‍ट्रॉनिक माध्‍यमों से ज्ञान का प्रसार
·        सार्वजनिक और सामु‍दायिक शौचालयों का प्रावधान
·        सूचनाशिक्षा और संचार तथा व्‍यवहारगत परिवर्तन आदि बिन्‍दुओं की कसौटी पर परखा जाता है।

स्‍वच्‍छता सर्वेक्षण 2017 ने इंदौर को सबसे स्‍वच्‍छ शहर चुना है और ये भी आश्‍चर्य की बात है कि मध्‍यप्रदेश का ही एक दूसरा सुंदर शहर भोपाल इस सर्वेक्षण में दूसरे स्‍थान पर रहा है। अब इंदौर अपने खिताब को बचाने के लिए जी-जान से जुटा हुआ है। शहर में हर ओर बस एक ही नारा हैइंदौर फिर बनेगा नंबर 1। ये एक अच्‍छी शुरूआत है। यदि इसी तरह सभी शहर आपस में प्रतिस्‍पर्धा करने लगें तो पूरा देश स्‍वच्‍छ होने में देर नहीं लगेगी। 

ये कार्य केन्‍द्र के स्‍तर पर किया जा रहा है। इसी तरह राज्‍य सरकारों द्वारा भी अपने-अपने स्‍तर पर सबसे स्‍वच्‍छ शहरजिलातहसील और ग्राम पंचायतों को चुना जा सकता है। अगर इंदौर कर सकता है तो बाकी शहर क्‍यों नहीं? वर्ष 2017 के स्‍व्‍च्‍छता सर्वेक्षण में निचले पायदानों पर रहे भोपाल, मैसूरसूरतविशाखापट्टनम इस बार ऊपर आने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।
वर्ष 2017 के शीर्ष 15 स्‍वच्‍छ शहरों में ये शहर शामिल हुए :

स्वच्छता सर्वेक्षण रैंक
शहर
राज्य / संघ शासित प्रदेश
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15




















ये इत्‍तेफाक ही है कि जिन दिनों मैं इंदौर में हूं उन्‍हीं दिनों स्‍वच्‍छता सर्वेक्षण 2018 चल रहा है। हो सकता है कि शहर इन दिनों पहले से ज्‍यादा सतर्क और मुस्‍तैद हो मगर यहां के स्‍थानीय लोगों से बातचीत करने से पता चलता है कि स्‍वच्‍छता अब यहां का वर्ष भर चलने वाला कार्यक्रम बन चुका है और अब धीरे-धीरे ये शहर की संस्‍कृति में घुल-मिल गया है। मेरे इंदौर में आने और शहर छोड़ने तक हर तरफ़ स्‍वच्‍छता अभियान की छाप नज़र आई. मैं इंदौर को 2018 में भी सबसे स्‍वच्‍छ शहर बनने की शुभकामनाएं देता हूं और पाठक मित्रों से आग्रह करूंगा कि मौका मिले तो एक बाद इंदौर जरूर जाएं और कुछ नहीं तो एक स्‍वच्‍छ शहर देखने के लिए ही सही. 

17 अप्रैल, 2018 की अपडेट: 
इंदौर को वर्ष 2018 में भी सबसे स्‍वच्‍छ शहर के रूप में चुुुुना गया है। इंदौर को बहुत ये खिताब बहुत मुबारक :)

कुुछ और तस्‍वीरें इन्‍दौर से:












छप्‍पन की रौनक 


सर्राफ़ा
देर रात 11 बजे भी सफाई जारी है 

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