यायावरी yayavaree: Shillong
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सोमवार, 16 जुलाई 2018

A Road Trip to Cherapunjee

चेरापूंजी: एक सफ़र बादलों के घर तक

A Road Trip to Cherapunjee

दूर तक अकेले चले गए खूबसूरत मनमौजी से रास्‍तों के दूसरे सिरों पर मौजूद मंजिलें भी कम दिलकश नहीं होती हैं. मगर मुझ पर इन हसीन रास्‍तों का जादू हमेशा से मंजिलों के तिलिस्‍म से ज्‍यादा सर चढ़ कर बोला है. ऐसे हसीन रास्‍तों पर एक लंबी रोड़ ट्रिप के आनंद को शब्‍दों में बयां नहीं किया जा सकता. 

देश के उत्‍तर-पूर्व में मेघालय एक ऐसा ही राज्‍य है जहां अमूमन हर बड़ी मंजिल ऐसे ही रेशमी रास्‍तों से बुनी हुई है. मेघालय की राजधानी शिलांग से किसी भी दिशा में चले जाइए हर ओर प्रकृति के नायाब नज़ारे या आश्‍चर्य हमारा इंतज़ार करते हैं. यूं तो पूरा मेघालय ही बादलों का घर है. मगर इस बादलों के घर में चेरापूंजी एक ऐसी जगह है जिस पर बादल खासकर मेहरबान रहे हैं और वहां तक पहुंचने के मखमली और सुपाड़ी से महकते हुए रास्‍ते बस दिल ही चुरा लेते हैं. 

अब शिलांग तक आएं और चेरापूंजी देखे बिना लौट जाएं ये संभव नहीं था. सो मेघालय की यात्रा में चेरापूंजी खुद-ब-खुद शामिल हो गया और जुलाई की एक सुबह हम शिलांग से चेरापूंजी की डगर निकल पड़े थे. मगर पिछली पोस्‍ट Mawlennong: Cleanest Village of Aisa में मैंने आपको बताया था कि चेरापूंजी के रास्‍ते पर बादलों की धमाचौकड़ी के बीच हम रास्‍ता भटक गए और बांग्‍लादेश की सीमा से सटे मायलेन्‍नोंग जा पहुंचे.
चेरापूंजी के हसीन रास्‍ते

रास्‍ते जो सीधे बादलों के घर जाते हैं

वो मोड़ जहां से हम रास्‍ता भटके 
अच्‍छा ही हुआ जो हम रास्‍ता भटक गए. इसके दो लाभ हुए. एक तो एशिया के सबसे सुंदर गांव को देखने का अवसर मिल गया और दूसरा दिन के समय चेरापूंजी में भयंकर बारिश में फंसने से बच गए. 

दरअसल जिस वक्‍़त हम गलती से मायलेन्‍नोंग के रास्‍ते पर बढ़ रहे थे उस वक्‍़त चेरापूंजी में भयकंर बारिश हो रही थी और बारिश में चेरापूंजी में आप कुछ नहीं देख सकते. ऐसा लगता है जैसे समंदर मे तूफान उठा हो और किसी तिलिस्‍मी जादू से हर चीज ढ़क दी गई हो. तमाम खूबसूरत वॉटर फॉल्‍स पल भर में धुंध और बादलों में गायब हो जाते हैं.

बादलों में गुम चेरापूंजी के खजाने 


उस रोज हमने जितना वक्‍़त मायलेन्‍नोंग में बिताया उतने समय चेरापूंजी में बादल जमकर बरसते रहे. यहां ढ़ाई-तीन घंटे गुज़ार कर हम फिर से चेरापूंजी की डगर पर थे. मायलेन्‍नोंग से चेरापूंजी का रास्‍ता उसी तिराहे से होकर जाता था जहां से हम रास्‍ता भटके थे. सो एक बार फिर 50 किलोमीटर वापिस आकर लैटलिंगकोट के उस मोड़ तक लौट कर आए और अब चेरापूंजी की ओर रथ मोड़ दिया. 

अब यहां से चेरापूंजी कुल 30 किलोमीटर दूर था. ये 30 किलोमीटर का सफ़र अब तक की सड़क यात्राओं में सबसे खूबसूरत सफ़र था. हल्‍की बारिश के पानी में नहा कर सड़क का रंग एकदम गहरा काला हो गया था. उधर सड़क के दोनों ओर दूर तक दिखाई देते घास के मैदान और खेत जैसे भीगी सी हरी चादर ओढ़ कर आराम फरमा रहे हों. पूरा रास्‍ता हसीन नज़ारों से भरा. 

मैंने ऐसे दिलफ़रेब रास्‍ते कभी नहीं देखे. हम शिलांग जैसे शहर की चहल-पहल से बहुत दूर निकल आए थे और पूरे रास्‍ते में कहीं-कहीं ही कुछ घर या छोटे-छोटे गांव नज़र आ रहे थे. अब तक बारिश ने हवा में मीठी ठंड घोल दी थी जो हड्डियों तक पहुंच कर भूख को जगाने लगी. मायलेन्‍नोंग से ये सोच कर जल्‍दी निकल थे कि चेरापूंजी के रास्‍ते में कहीं रुक कर चाय सुड़की जाएगी. मगर यहां तो दूर-दूर तक चाय का नामो-निशां ही नहीं था. कहीं कोई होटल नहीं, कोई ढ़ाबा नहीं. 

कई किलोमीटर चले आने के बाद सड़क पर दूर एक गांव का छोटा सा बाजार दिखने लगा तो चाय की आस से आंखों में चमक आ गई. मगर जैसे-जैसे गाड़ी उन दुकानों के नज़दीक आई तो उन दुकानों की हकीकत साफ़ होती गई. वहां कोई चाय की दुकानें नहीं थीं. यहां दुकानों के बाहर सुअर उल्‍टे लटके थे. यहां स्‍थानीय खासी समुदाय के लोग सब कुछ खाते हैं. एक-दो नहीं कोई दस दुकानें रही होंगी. पोर्क की गंध को शिलांग में भी बर्दाश्‍त नहीं हुई थी. घनघोर वेजिटेरियन आदमी के साथ ये सबसे बड़ी दिक्‍क्‍त है. बस यहां तो गाड़ी को ब्रेक लगाना भी मुनासिब नहीं था सो और तेज रफ्तार से आगे की ओर भाग चले.

ओरेंज रूट्स
साथ में चल रहे एक परिचित ने बताया कि वो कुछ साल पहले भी इस तरफ आए थे तो कहीं कुछ खाने को नहीं मिला था. वेजिटेरियन खाने की किल्‍लत तो शिलांग में भी कम नहीं थी. इसलिए इस दूर-दराज के इलाके में तो कल्‍पना की ही जा सकती है. कुछ लोगों ने पहले ही आगाह किया था कि चेरापूंजी में कुछ नहीं मिलेगा. मगर ये नहीं बताया था कि रास्‍ते में चाय भी नसीब नहीं होगी.

मगर शायद हमारी किस्‍मत हम पर मेहरबान थी. किस्मत बुलंद हो तो जंगल में भी छप्पन भोग मिल सकते हैं. सो हमें भी मिल गए. सोहरा से तकरीबन 3 से 4 किलोमीटर पहले 'ऑरेन्ज रूट्स' नाम से एक वेजिटेरिअन रेस्तरां है. ये मेघालय पर्यटन विभाग और चेरापूंजी हॉलीडे रिजॉर्ट की पब्लिक प्राइवेट पार्ट‍नरशिप में चल रहा है. 

यहां टोकन काउंटर से लेकर किचिन, वेट्रेस और प्रबंधन में एकाध पुरुष को छोड़कर पूरा स्‍टाफ महिलाओं का है. जिस आदर और प्रेमभाव से यहां महिलाएं अपने पारंपरिक परिधान जिंकरसिया पहले हुए भोजन परोसती हैं और थोड़ा और खाने का आग्रह करती हैं...ऐसा कहीं नहीं देखा. तो आप नोट कर लीजिए, इस तरफ आएं तो ऑरेंज रूट्ससे बेहतर कोई विकल्‍प नहीं.

अभी और भी बहुत कुछ मिलेगा थाली में 

इससे पहले कि बातों में मैं भूल जाऊं, बताता चलूं कि अब चेरापूंजी असल नाम सोहरा ही था और ब्रिटिशर्स ने इसे छुराकहना शुरू किया और धीरे-धीरे ये चेरापूंजी हो गया. चेरापूंजी का मतलब है Land of Oranges. मगर अब इसका नाम फिर से सोहरा कर दिया गया है. 

तकरीबन डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद जब शाम 4 बजे हम चेरापूंजी पहुंचे तो बारिश एकदम चरम पर थी. बारिश का ये रौद्र रूप देख कर बड़ी निराशा हुई. हमारे साथ चल रहे लोगों ने बताया कि यहां ऐसा ही होता है और कई बार लोगों को बिना कुछ देखे ही खाली हाथ लौटना पड़ता है. शायद इसीलिए अब बहुत से टूरिस्‍ट यहां एक रात रुकने का प्रोग्राम बना कर ही आते हैं. ताकि 24 घंटे में कम से कम एक बार मौसम के साफ़ होते ही चेरापूंजी की खूबसूरती का आनंद ले सकें. मगर हमें शाम तक वापिस लौटना था. ले दे कर यही कोई तीन-चार घंटे हाथ में थे. 

इधर जोरों की भूख लगी थी और किस्‍मत से एक वेज रेस्‍तरां मिल गया तकरीबन एक घंटे बाद बारिश धीमी होने पर हमने आगे बढ़ने का फैसला किया. यहां से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्‍प्रेड ईगल फॉलतक पहुंचते-पहुंचते धुंध छंट चुकी थी और हल्‍की धूप कुछ इस तरह चमकी जैसे किसी ने ऊपर से आउट ऑफ द वे जाकर ये नज़ारा दिखाने का प्रबंध किया हो. सभी ने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया और सभी धड़ाधड़ उस खूबसूरत नज़ारे को कैमरे में कैद करने लगे. 

तभी ड्राइवर ने चेतावनी दी कि मौसम की ये मेहरबानी ज्‍यादा देर के लिए नहीं है. इसलिए जो करना है ज्‍यादा से ज्‍यादा एक घंटा है. हमने ड्राइवर से कहा कि सिंह साहब, अब चेरापूंजी आपके भरोसे है. बस फिर क्‍या था. उन ऊबड़-खाबड़ और सांप जैसे घुमावदार रास्‍तों पर दौड़ते हुए हमने रास्‍ते में पड़ने वाली हर साइट पर छापा सा डालते हुए आगे बढ़ना जारी रखा. और एक-डेढ़ घंटे में तमाम वाटर-फॉल्‍स और मौसमई गुफाओं को भी देखा डाला. तब जाकर बेचैन दिल को करार आया. 
सेवन सिस्‍टर्स फॉल 
यहां मौसमई गुफाओं से तकरीबन 1 किलोमीटर आगे बेहद खूबसूरत सेवन सिस्‍टर्स फॉल है जिसे स्‍थानीय लोग Nohsngithiang Falls  के नाम से जानते हैं. सेवन सिस्‍टर्स फॉल का नाम इसलिए पड़ा क्‍योंकि ये इसकी धाराएं सात हिस्‍सों में बटी हैं. ये झरना 315 मीटर (1033 फुट) की ऊंचाई से गिरता है और इसकी औसत चौड़ाई 70 मीटर है. इसी वजह से ये देश के सबसे लंबे वॉटरफॉल्‍स (One of the tallest Waterfalls in India) में से एक है. इसी तरह सोहरा में Nohkalikai Falls ऐसा ही एक खूबरसतर वॉटरफॉल है. इसे Tallest Plunge Water Fall in India के रूप में भी जाना जाता है. 

नोहकालिकाई फॉल           स्‍त्रोत: शटरस्‍टॉक

नोहकालिकाई फॉल के बारे में एक लोककथा बहुत दिलचस्‍प है. खासी में नोहकालिकाई का मतलब है का लिकाई का कूदना. इस कथा के अनुसार झरने से ऊपर रांगजाइरतेह (Rangjyrteh) गांव में लिका नाम की एक महिला को अपने पति की मृत्‍यु के बाद दूसरी शादी करनी पड़ी. अपनी नवजात बच्‍ची के साथ का लिकाई (खासी समुदाय में स्त्रियों के नाम के आगे का लगाया जाता है) बड़ी मुश्किल से अपनी जिंदगी काट रही थी. आखिरकार उसे सामान ढ़ाेेेने का काम करना पड़ा. अपने काम की वजह से उसे सारा दिन घर से बाहर रहना पड़ता और घर लौटने पर उसका ज्‍यादातर वक्‍़त अपनी बच्‍ची के साथ गुज़रता. 

इस सबके बीच का लिकाई अपने दूसरे पति को ज्‍यादा वक्‍़त नहीं दे पाती थी. बस इसी बात की जलन में एक दिन पति ने मासूम बच्‍ची को मार डाला और उसके मांस को पका कर हड्डियों को इधर-उधर फेंक दिया. का लिकाई काम से घर लौटी तो बच्‍ची को घर पर न पाकर उसे खूब ढूंढ़ा. दिन भर की थकान से निढ़ाल का लिकाई ने खाना खाकर फिर से बच्‍ची को ढूंढ़ने का फैसला किया. खाना खानेे के बाद का लिकाई सुपाड़ी खाती थी. उस दिन भी जब का लिकाई सुपाड़ी काटने बैठी तो वहां पड़ी एक छोटी सी उंगली को देख कर सारा माज़रा समझ गई कि उसकी गैर-मौजूदगी में उसके पति ने क्‍या किया था. का लिकाई के गुस्‍से और दुख की कोई इंतहा नहीं थी और हाथ में कुल्‍हाड़ी लेकर इधर-उधर दौड़ने लगी. दौड़ते-दौड़ते पठार पर पहुंच गई और इसी दुख में झरने से नीचे छलांग लगा दी. जहां से का लिकाई ने छलांग लगाई थी उसी जगह को आज नोहकालिकाई के नाम से जाना जाता है. आज भी वो झरना जैसे का लिकाई के दुख को बयां कर रहा है।   
अच्‍छा, एक दिलचस्‍प बात चेरापूंजी के बारे में ये है कि बचपन से किताबों में सबसे ज्‍यादा वर्षा वाले स्‍थान के रूप में पढ़ते-पढ़ते हमारे दिलो-दिमाग में चेरापूंजी की छवि ऐसी बन गई है मानो यहां हर समय बरसात ही होती रहती हो और बारह मासों ये इलाका पानी से लबालब रहता हो. मगर हैरतंगेज तथ्‍य ये है कि यहां सर्दियों में सूखा पड़ता है और पानी की भारी किल्‍लत हो जाती है. यहां तक कि लोगों को बहुत दूर-दूर से पानी लेकर आना पड़ता है. दरअसल सबसे ज्‍यादा बारिश का फलसफा ये है कि यहां बारिश लगातार न होकर भारी मात्रा में होती है. इसलिए कम समय में भी औसत वर्षा के रिकॉर्ड टूट जाते हैं. ऐसा असल में चेरापूंजी के खासी पहाडियों के दक्षिणी पठार पर होने की वजह से होता है. इसकी स्थिति कुछ इस तरह है कि बादल यहां पहाड़ों के बीच आकर फंस जाते हैं और जमकर बरसते हैं. इतनी तेज बारिश का एक नुकसान ये भी है कि यहां की मिट्टी पानी के तेज बहाव में बांग्‍लादेश के मैदानों की ओर बह जाती है और खेती संभव नहीं हो पाती है. अब इसे चेरापूंजी का दुर्भाग्‍य ही कहा जाएगा कि जिस बारिश के लिए पूरी दुनिया में लोग तरसते हैं वही बारिश यहां हालातों को नाजुक बना देती है.

बारिश के मामले में चेरापूंजी के कुछ अद्भुत रिकॉर्ड हैं। 450 इंच (11,430 मिलीमीटर) के विश्‍व के उच्‍चतम औसत वार्षिक वर्षा स्‍तर के अतिरिक्‍त विश्‍व में किसी भी स्‍थान पर किसी एक वर्ष में सबसे ज्‍यादा वर्षा का रिकॉर्ड भी चेरापूंजी के ही नाम है. यहां अगस्‍त 1860 से जुलाई, 1861 के दौरान 1,042 इंच (26,467 मिलीमीटर) की वर्षा दर्ज की गई थी। यहीं नहीं, जुलाई 1861 में किसी एक महीने में सबसे ज्‍यादा वर्षा का रिकॉर्ड (366 इंच – 9296 मिलीमीटर) भी चेरापूंजी ने ही बनाया. 

हालांकि अब पिछले कुछ वर्षों से सबसे ज्‍यादा वर्षा चेरापूंजी की बजाय यहां से 80 किलोमीटर दूर मॉसिनराम में होने लगी है. लेकिन अभी भी चेरापूंजी ही हमारी स्‍मृतियों में धरती पर सबसे ज्‍यादा वर्षा वाले स्‍थान के रूप में बस चुका है. यहां केवल सबसे ज्‍यादा बारिश ही नहीं बल्कि यहां के अद्भुत झरने बरसों से देश-दुनिया के पर्यटकों का मन मोहते रहे हैं.

यहां दर्जनों वॉटर फाल हैं जिन्‍हें जुलाई के बाद देखने का अपना आनंद है. एक रोड़ ट्रिप का असली मजा यही है कि गाड़ी से कुछ-कुछ किलोमीटर पर मौजूद स्‍थानों का भी तसल्‍ली से आनंद लिया जा सकता है. यदि ज्‍यादा वक्‍़त न हो तो चेरापूंजी के लिए आधा दिन भी बहुत है. हम आधे दिन में जितना देख सके उतना पहली यात्रा के लिए काफी था. चेरापूंजी की पहली यात्रा की स्‍मृतियां मेघालय की स्‍मृतियों के कोलाज में चटख रंगों के साथ हमेशा जीवंत रखेंगी.

चेरापूंजी कैसे पहुंचें: 
चेरापूंजी पहुंचने के लिए शिलांग पहुंचना होगा और शिलांग पहुंचने के लिए गुवाहाटी. गुवाहाटी सड़क, रेल और हवाई मार्ग तीनों से जुड़ा है. यूं तो शिलांग तक भी हवाई सेवा है मगर उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसलिए बेहतर होगा गुवाहाटी तक की फ्लाइट जी जाए. अब गुवाहाटी से शिलांग तीन-साढ़े तीन घंटे का सड़क का सफ़र है (रास्‍ता एकदम शानदार है). शिलांग से चेरापूंजी कुल 54 किलोमीटर दूर है.

कब आएं चेरापूंजी:
चेरापूंजी आने का सबसे बेेेेहतर समय सितंबर से अप्रैल तक का है.  


कुछ और तस्‍वीरें इस यादगार सफ़र से ...






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बुधवार, 4 जुलाई 2018

Mawlennong: Cleanest Village of Aisa


एशिया का क्‍लीनेस्‍ट विलेज: मायलेन्‍नोंग

ये जुलाई का बरसातों का मौसम था और बरसात की शुरूआती झडि़यों के बाद उत्‍तर से पूरब तक धरती का तन और मन दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। यही वह समय था जब पहले से हरी-भरी पूर्वोत्‍तर की दुनिया और भी ज्‍यादा मनमोहक लगने लगी थी।  मैं कुछ मित्रों के साथ गुवाहाटी, शिलांग और चेरापूंजी की यात्रा पर था। दो तीन दिन गुवाहाटी और शिलांग में गुजारने के बाद उस रोज हम शिलांग से निकले तो थे चेरापूंजी के लिए मगर सड़क पर बादलों और बारिश ने ऐसा घेरा कि कुछ नहीं दिखा और जहां लैटलिंगकोट नाम की जगह (शिलांग से लगभग 27 किलोमीटर) से चेरापूंजी के लिए कट लेना था वहां गलती से बाईं ओर कट ले लिया मायलेन्‍नोंग का। इस राह पर तकरीबन 10 किलोमीटर आगे आकर गूगल मैप ने बताया कि हम चेरापूंजी की बजाए मायलेन्‍नोंग की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। अब जब गलत राह पकड़ ही ली...तो यही सही। वैसे मेघालय यात्रा का जब प्रोग्राम बन रहा था तो मायलेन्‍नोंग (Mawlennong) को व्‍यस्‍त कार्यक्रम में शामिल करना लगभग असंभव दिख रहा था और मैं भी मन ही मन मान चुका था कि इस बार मायलेन्‍नोंग जाना नहीं हो पाएगा। पर शायद डेस्टिनी को वहीं भेजना मंजूर था। क्योंकि आप किस वक़्त कहां होंगे ये शायद पहले से तय है। या फिर वो कहते हैं न कि 'आप किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलवाने में जुट जाती है'। अब एक घुमक्‍कड़़ को और क्‍या चाहिए, मन की मुराद पूरी हो गई। मायलेन्‍नोंग को आज Asia’s Cleanest Village के नाम से जाना जाता है और इसे "गॉड्स ओन विलेज" भी कहा जाता है। बांग्लादेश बॉर्डर पर ये गज़ब का गांव है।
मायलेन्‍नोंग की ओर आखिरी डगर

हसीन रास्‍ते जो मंजिलों से भी ज्‍यादा खूबसूरत हैं 
शिलांग से मायलेन्नोंग का 80 किलोमीटर का पूरा रास्ता बादलों की अठखेलियों के बीच ठुमकता मचलता सा चला जाता है। उस रोज भी घनघोर काले बादल अचानक सड़क पर गाड़ी के आगे कूद कर सामने से ही धप्पा बोल रहे थे। गहरी धुंध, बरसात और काले बादलों के बीच से हम लगभग रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे। गाड़ी में चल रहा गीत जैसे ठीक इसी वक्‍़त के लिए लिखा गया था:

बादल झुके झुके से हैं
रस्ते रुके रुके से हैं

क्या तेरी मर्ज़ी है मेघा
घर हमको जाने न देगा
आगे है बरसात, पीछे है तूफ़ान
मौसम बेईमान, कहाँ चले हम तुम
चक दुम दुम...


अब तक इस रास्ते पर आगे बढ़ते हुए एक वक्त लगने लगा कि हम जिस रास्ते पर चल रहे हैं वो डगर कहीं जाती भी है या नहीं। दूर-दूर तक सुनसान रास्ते और जंगल। मायलेन्नोंग से तकरीबन 17 किलोमीटर पहले आखिर एक खूबसूरत से साइनबोर्ड पर नज़र पड़ती है जो बताता है कि गॉड्स ओन गार्डन मायलेन्‍नोंग वहां से दाईं ओर 17 किलोमीटर दूर है। आखिर ये सफर भी पूरा करके हम मायलेन्नोंग पहुंचते हैं। बांग्लांदेश बॉर्डर से सटा एक छोटा सा बेहद खूबसूरत गांव। गांव में खासी समुदाय के लगभग 95 परिवार हैं, और ज्या‍दा से ज्यादा 500 लोग। खासी समुदाय की परंपराओं के मुताबिक दुनिया का ये कोना पूरी तरह महिलाओं का किंगडम है। मतलब कि मातृसत्तात्मक व्यवस्था।

मायलेन्‍नोंग में एक चाय की दुकान...मगर दुकान की कमान
महिला के हाथ में है 
दुनिया की आधी आबादी पितृ सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के चक्रव्यूह को भेदने में दिन-रात खटते हुए जिस बेहतर स्थिति के यूटोपिया की कल्पना करती है वैसा मातृ सत्तात्मक समाज शिलांग के आस-पास के इलाकों और विशेषकर मायलेन्‍नोंग में खासी जनजातीय समाज की वास्तविकता है। यहां औरत जात की हुकूमत है। मेघालय की मैट्रीलीनियल सोसायटी दुनिया की इक्‍का–दुक्‍का शेष बची मातृसत्तात्मक व्यवस्थाओं में से एक है और समाजविज्ञानियों और सैलानियों के लिए आश्चर्य का विषय है। यहां महिला ही परिवार की मुखिया मानी जाती है। हां, बच्चों के मामा परिवार के फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, शादी के बाद दुल्हन पराये घर नहीं जाती बल्कि दूल्हा घर लाती है। कोई दहेज नहीं, कोई दुल्‍हन की प्रताड़ना नहीं। यहां तक कि बेटी शादी के बाद भी अपनी मां के सरनेम को ही अपने सरनेम के तौर पर प्रयोग करती है और परिवार की संपत्ति सबसे छोटी बेटी के नाम ट्रांसफर होती है। Khasi Custom of Lineage Act of 1997 के अनुसार यदि परिवार में कोई बेटी न हो तो भी संपत्ति परिवार के पुत्रों के नाम नहीं होगी। इसके लिए किसी अन्‍य परिवार से लड़की को गोद लिया जाएगा और वह उस संपत्ति की मालकिन बनेगी। इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इस इलाके में आमतौर पर पुरूषों के पास कोई संपत्ति नहीं है। दिलचस्‍प बात ये है कि इस व्‍यवस्‍था के चलते पुरूषों को काम-काज के लिए बैंक से लोन नहीं मिल पाते क्‍योंकि उनके पास गिरवी रखने के लिए कोई संपत्ति ही नहीं है। शायद इसी वजह से यहां का पुरुष समाज अब इस सदियों पुरानी परंपरा से असंतुष्‍ट नज़र आता है। मगर परंपराएं टूटना इतना आसान नहीं होता। यही वजह है कि तमाम प्रतिरोधों और विद्रोही स्‍वरों के बावजूद ये परंपरा आज भी बदस्‍तूर जारी है। शायद इसीलिए यहां बेटी को वंश चलाने वाला माना जाता है और बेटी के जन्म पर खुशियां मनाई जाती हैं और 'खोवाई' नाम से एक आयोजन होता है जिसमें मिलने-जुलने और जान-पहचान वालों को खाने पर बुलाया जाता है। मैट्रिलिनियल सोसाइटी का ये दस्तूर अमीर-गरीब सभी तबकों में समान रूप से देखा जा सकता है। काम-काज के अधिकांश क्षेत्रों में आपको महिलाएं ही नज़र आएंगी। मातृसत्तात्मक व्यवस्था का ये इकलौता केन्द्र आज दुनिया भर के लिए आश्चर्यमिश्रित हर्ष का विषय है और पूरी दुनिया को संदेश दे रहा है कि दुनिया कुछ इस तरह भी चलाई जा सकती है।

कचरे के लिए बांंस के कूड़ेदान
फिलहाल यहां मुद्दा क्लीनेस्ट विलेज का है। तो हुआ यूं कि 2003 में एक ट्रैवल मैग्जीन ने इस गांव को क्लीनेस्ट विलेज ऑफ एशिया घोषित किया। बस तभी दुनिया की नज़र इस गांव पर पड़ी और आज ये गांव मेघालय के टूरिस्ट मैप पर खास स्थान ले चुका है। हालांकि अभी भी इसके बारे में दूर-दराज के टूरिस्ट को ज्यादा जानकारी नहीं है। हां नई और खास जगहों की तलाश में भटकती आत्माएं ऐसी जगहों पर पहुंच ही जाती हैं। खैर, गांव वाकई साफ-सुथरा है। हर घर के बाहर बांस से बने डस्टबीन लगे हैं जिनके कचरे को हर रोज इकट्ठा करके एक बड़े गड्ढे में डाला जाता है जहां बाद में उसके खाद बनने पर उसे काम में लिया जाता है। इस गांव तक भी मनरेगा जैसी योजनाएं पहुंची हैं। यहां के ड्रेनेज सिस्टम का काम मनरेगा के अंतर्गत ही किया गया है। गांव में लोगों ने यहां आने वाले पर्यटकों के लिए छोटे-छोटे टी-स्टॉल और रेस्‍तरां खोल कर आजीविका के कुछ और साधन पैदा कर लिए हैं। गांव देखते देखते ज़रा सा अंदर ही बढ़ा होउंगा कि अचानक मोबाइल पर एक मैसेज आ टपका “Welcome to Bangladesh ! Tariff in Bangladesh on any network: Call to Bangladesh: Rs 70/min, to India/any other country: Rs140/min, incoming: Rs 70/min, SMS outgoing: Rs15, Data: Rs5/10 Kb” ये मैसेज देखते ही होश उड़ चुके थे...ज़ाहिर था कि मोबाइल नेटवर्क के हिसाब से मैं बांग्लादेश में था। मैंने ज़रा गौर किया तो कुछेक फर्लांग पर ही बांग्‍लादेश के खुले मैदान नज़र आ रहे थे। सबसे पहले तो मोबाइल का सेल्युलर डाटा ऑफ किया और वहीं से बांग्लादेश को अलविदा कह कर उल्टे पांव लौट लिया।

बांग्‍लादेश की सीमा से सटा गांव का इलाका  

लिविंग रूट ब्रिज
यहां से थोड़ी दूर पर ही प्रकृति का एक और बेजोड़ अजूबा लिंविंग रूट ब्रिज के रूप में देखने को मिलेगा। रबर के पेड़ की जड़ों से सालों-साल तक गुथ कर बना ये लिविंग रूट ब्रिज बहते धारे के ऊपर से दूसरी ओर पहुंचने के लिए बायोइंजीनियरिंग का एक खूबसूरत करिश्‍मा है। कुछ लोगों का मानना है कि इस रूट ब्रिज की उम्र तकरीबन एक हजार वर्ष है। गांव में ही कुछ और आकर्षण के केन्‍द्र हैं जिनमें सबसे खास है ट्री होम। ये बांस से पेड़ के ऊपर 80 से 90 फुट की ऊंचाई पर बनाया गया छोटा सा घर है जिसमें गांव के जीवन का आनंद लेने के इच्‍छुक पर्यटक रात को भी ठहर सकते हैं। गांव के लोग बड़े प्रेम और आतिथ्‍य भाव के साथ पर्यटकों का स्‍वागत करते हैं। इसी तरह के कुछ और बांस के स्‍काई वे (पेड़ पर चढ़ने के लिए बांस से बनी सीढि़यां) यहां पर्यटकों को प्रकृति के अद्भुत नज़ारों का लुत्‍फ देते हैं जहां से न केवल गांव की अनुपम छटा दिखती है बल्कि गांव के उस पार बांग्‍लादेश के लंबे चौड़े मैदान साफ दिखाई देते हैं।

छोटे. मगर खूबसूरत घर. हर घर का अलग शौचालय 
इस गांव में निर्मल गांव अभियान के तहत हर घर के लिए अलग शौचालय है। हर चार कदम पर आईडीएफसी बैंक के सौजन्य से सोलर स्ट्रीट लाइटिंग सिस्टम लगा है। जानकर आश्चर्य होगा मगर सच है कि गांव का लिट्रेसी रेट 100 परसेंट है। गांव में 3 स्कूल हैं और बच्चों को अभी से गांव को सुंदर बनाए रखने के सबक स्कूल में सिखाए जा रहे हैं। गांव के लोग हर रोज सुबह मिलकर पूरे गांव के सफाई करते हैं और गांव के बच्‍चे भी बड़ों की देखा-देखी साफ-सफाई के काम में उनका हाथ बंटाते हैं। गांव में कूड़ा-कर्कट फैलाने पर द लॉ ऑफ विलेज के अनुसार फाइन लगाया जाता है। कुल मिलाकर एक मुकम्मल आदर्श ग्राम। ये जगह तमाम बड़े-बड़े स्वच्‍छता अभियानों के नाटकों से दूर स्वच्छता की एक जीती जागती मिसाल है और साबित करती है कि यदि स्‍थानीय प्रशासन जिम्‍मेदार हो और नागरिक स्‍वच्‍छता में अपना योगदान दें तो कोई भी जगह सुंदर बन सकती है। कहना ही होगा कि मायलेन्‍नोंग दुनिया की उन चंद खूबसूरत जगहों में से एक है जिन्‍हें एक बार अवश्‍य देखा जाना चाहिए।

अगली पोस्‍ट में हम चेरापूंजी की ओर चलेंगे तब तक कुछ और तस्‍वीरें इस खूबसूरत गांव से... 
लिविंग रूट ब्रिज

हर तरफ सिर्फ एक ही रंग


काश मैं भी बच्‍चा बन जाऊं और इसी गांव में खूब खेलूं 

मुझे भी एक घर चाहिए यहां 


मनरेगा का जादू  

नोट: मेघालय की यह यात्रा जुलाई, 2015 में की गई थी। 

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गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

एक बरस, छह यात्राएं और छह बरस की जिंदगी

एक यायावर मन जब साल के आखिरी दिन कलैंडर के पन्‍नों पर नज़र डालता है...तो उसे तारीखें नहीं बल्कि यात्राओं की मधुर स्‍मृतियां और हजारों छोटे-बड़े अनुभवों के मोती नज़र आते हैं. वक्‍़त तो यूं भी गुज़र ही जाता है....मगर गुज़रता हुआ वक्‍़त य‍दि हमारे दुनिया को देखने के नज़रिए को बदलता चले तो बात ही कुछ और होती है. मेरा मानना है कि जब हम यात्रा में होते हैं तो हर एक दिन में एक बरस का अनुभव जीते हैं. जिंदगी तो वैसे भी बहुत छोटी होती है...इसलिए जल्‍दी से जल्‍दी और ज्‍यादा से ज्‍यादा से ज्‍यादा सिर्फ यात्राओं के जरिए ही जिया जा सकता है. कहते हैं न जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए....तो साहब बड़ी करने का सबसे अच्‍छा बहाना हैं यात्राएं.

नए साल के स्‍वागत का जश्‍न क्रिसमस से ही शुरू हो जाता है तो पिछले क्रिसमस से इस क्रिसमस के दौरान देश के चारों कौनों में खूब घुमक्‍कड़ी हुई. पिछले क्रिसमस पर जब घुमक्‍कड़ी की तलब हुई तो अर्धांगिनी के साथ बैग उठा कर शिमला के लिए निकल पड़े.

पहली यात्रा – शिमला
शिमला क्रिसमस में और भी हसीन हो जाता है. क्रिसमस और नए साल के स्‍वागत का इससे बढि़या ठिकाना शायद ही कोई और हो. जब किसी अजीज का साथ हो तो, शिमला के माल रोड़ पर ठंड में भीगी उन शामों की चहलकदमी दुनिया की सबसे खूबसूरत शाम हो जाती है. रिज पर रात में चमकते चर्च के आस-पास मन बार बार खींच ले जाता. हमने तीन दिन जी भर कर शिमला में घुमक्‍कड़ी की. शिमला समझौते की एेतिहासिक जगह वाइस रीगल लॉज को तस्‍वीरों से बार-बार छू कर देखना अनुपम अनुभव था. कुफरी की पहाडि़यों पर की गई मस्‍ती ताउम्र यादों की संदूक में सहेज कर रख ली है. यात्रा के आखिरी सिरे पर शिमला टॉय ट्रेन आइसिंग ऑन केक ही थी. जंगल के उन हसीन घुमावदार रास्‍तों पर मचलती इठलाती उस ट्रेन की सवारी से बेहतर और क्‍या हो सकता था. बचपन से जिस ट्रेन की सवारी की ख्‍वाहिश मन में सपने की तरह पलती रही वो शादी के बाद इस दूसरी यात्रा में बड़ी खूबसूरती से पूरी हुई. हमने तीन दिन में कम से कम तीन बरस की जिंदगी को जिया. 

दूसरी यात्रा- कालिम्‍पोंग, दार्जिलिंग और नेपाल (काकरवित्‍ता बार्डर)

कालिंपोंग का नाम एकाध बार उड़ते-उड़ते ही सुना था. मार्च के आखिरी सप्‍ताह में संयोग बना सो कालिम्‍पोंग जा पहुंचे. पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग से 3 घंटे की दूरी पर ये नैसर्गिेक सुंदरता से भरा एकदम शांत पर्यटक स्‍थल है. ये जगह टूरिस्ट मैप पर अभी भी ख़ास जगह नहीं बना पाई है. इसकी अपनी वजहात हैं...अव्वल तो कालिम्पोंग में कोई बड़ा टूरिस्ट अट्रेक्शन नहीं है और दूसरा यहां से दार्जिलिंग कुल 41 किलोमीटर है तो गंगटोक 64 किलोमीटर. इसलिए गंगटोक और दार्जिलिंग आने वालों के लिए कालिम्पोंग को यात्रा में शामिल करना मुनासिब नहीं रह जाता. यहां दरअसल वही आता है जो सुकून की तलाश में है या जो पूरी फुर्सत अपने हाथ में लेकर निकला है. यहां जिंदगी बहुत आहिस्‍ता से आगे बढ़ती देखी जा सकती है. 

कालिम्‍पोंग आएं और दार्जिंलिंग न जाएं ऐसा कैसे हो सकता है. आखिर दार्जिलिंग टॉय ट्रेन जो बुला रही थी. यहां देश के सबसे ऊंचे रेलवे स्‍टेशन घूम से दार्जिलिंग तक टॉय ट्रेन में सवारी की गई. दार्जिलिंग की टॉय ट्रेन शिमला की टॉय ट्रेन से उलट शहर के बीचों बीच चलती है.हां, पहले इसका ट्रेक न्‍यू जलपाई गुड़ी से दार्जिलिंग तक था सो जंगल भी रास्‍ते में थे...मगर अब केवल शहर में सड़कों के किनारे और बीचों बीच टॉय ट्रेन का मजा लिया जाता है. दार्जिंलिंग के चाय के बागान, और खूबसूरत रास्‍तों के लिए शब्‍द कम पड़ जाते हैं. इस दौरान सीलिगुडी होते हुए काकरवित्‍ता बॉर्डर से नेपाल में प्रवेश किया. वहां के बाजार में छिट-पुट चीजें खरीद और चहलकदमी कर लौट आए. नेपाल और भारत के अधिकतर बॉर्डर पोरस ही हैं.



तीसरी यात्रा – मुंबई


धनकुबेरों की नगरी मुंबई की भी ये मेरी पहली यात्रा थी. चार दिन की इस यात्रा में मुंबई और खासकर मध्‍य और दक्षिणी मुंबई को तफ्सील से देखा और महसूस किया. समंदर के किनारे ये शहर एक आज़ाद ख्याल शहर नज़र आता है. मरीन ड्राइव में तो जैसे कोई सम्मोहन है...हर कोई बस खिंचा चला आता है....और शाम के वक़्त लाइटों के जलते ही मरीन ड्राइव जैसे नौलखा हार पहन लेता है. इसी नौलखे हार के साये में जवां दिल समंदर के किनारे अपने इश्‍क की कहानियां लिखते नज़र आते हैं. मुम्बई में कदम रखते ही मुम्बई के खास जायके की खोज शुरू हो गई थी. लगभग सबका मानना था कि जितनी विविधता दिल्ली के जायके में है उतनी मुम्बई में नहीं. प्राइमरी रिसर्च के बाद वड़ा-पाव और जलेबी-फाफड़ा को शॉर्ट लिस्ट किया गया. दो दिन तक जब होटल के पचासों आयटम में भी वड़ा-पाव नज़र नहीं आया तो होटल स्टाफ से पूछा. अब ताज होटल में वड़ा-पाव क्यों नहीं मिलता इसका जवाब तब मिला जब तीसरे दिन मुम्बई की सड़कों पर वड़ा-पाव को खोजा गया. वड़ा-पाव की ख़्वाहिश तो हमारी पूरी हुई मगर जलेबी-फाफड़ा नहीं मिल सका. खैर, अगली बार सही...छूटने वाली चीजें फिर से आने का मोह बनाये रखती हैं.

चौथी यात्रा – गुवाहाटी-शिलांग-मायलेन्‍नोंग और चेरापूंजी
जुलाई में पूर्वोत्‍तर का दौरा रहा. यहां दो दिन गुवाहाटी और दो दिन की शिलांग यात्रा में आस-पास के चुनींदा आकर्षणों के मोहपाश में हम मायलेन्‍नोंग और चेरापूंजी तक जा पहुंचे. इस यात्रा में ब्रह्मपुत्र नदी में क्रूज पर ढ़लते सूरज को देखना, शिलांग के रास्‍ते में रुक-रुक कर शायद देश के सबसे बेहतरीन पाइनेप्‍पल को चखते चलना, शिलांग और चेरापूंजी के तमाम झरनों, एशिया के क्‍लीनेस्‍ट विलेज मायलेन्‍नोंग के लिविंग रूट ब्रिज को देखना और इस गांव की स्‍वच्‍छता की कहानी को समझना अद्भुत अनुभव रहा. सैकड़ो छोटे-छोटे अनुभव और भी रहे ...उनपर फिर कभी.



पांचवी यात्रा- बनारस और सारनाथ
यहां दुनिया के सबसे पुराने शहर वाराणसी या बनारस या फिर कहिये कि काशी के तमाम रंग और मिज़ाज़ देखे. गुज़रते वक़्त के साथ भले ही शहर के नाम बदलते गए मगर ज़रा गौर से देखिए इस शहर को तो एक साथ तीन शहर नज़र आएंगे. वो यूं कि हर नाम एक अलहदा अंदाज़ को बयां करता है और वो अंदाज़ और मिज़ाज आज भी यहां की फ़िज़ा में तारी है. फाइव स्टार होटल, एयरपोर्ट और आधुनिक मॉल वाला शहर किसी भी अन्य भारतीय शहर से कदमताल मिलाता नज़र आता है जिसमें फैशन भी है और मॉडर्निटी बस शहर को कंट्रोल में लेने को आतुर है. पर ज़रा चश्मा बदलिये तो पुराना बनारस अपने पान, बनारसी साड़ियों, मारवाड़ियों, बंगालियों, विधवाओं, पतली गलियों, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, अचारों, धर्मशालाओं, वेश्याओं और आज भी चोरी-छिपे चलने वाले मुजरों के साथ साफ़-साफ़ दिखाई देता है. और साहब काशी देखना है तो ज़रा घाटों की तरफ़ निकलिए...यहां काशी विश्वनाथ हैं, पंडों पुजारियों का आधिपत्य है, घनघोर कर्मकाण्ड है, गंगा स्नान है, गंगा की आरती है, तिलक-छापा है और हिन्दू धर्म के रक्षक हैं...मठ और मठाधीश हैं. और इन सबके घालमेल से जो बनता है वो है एक अल्हड़, मदमस्त, बेफिक्र वाराणसी जहां ट्रैफ़िक सेंस गई तेल लेने, मोटर साइकिल और कार कैसे नहीं चलानी चाहिए ये यहां के गोदौलिया चौराहे पर देख लीजिये, पर यहां ऐसे ही चलती हैं...चलती क्या हैं जहां दो-चार इंच जगह दिखी वहां घुसेड़ी जाती हैं और कोई ससुर ठुके तो ठुके अपनी बला से, 'हर-हर महादेव' के जय घोष से स्नान और 'भोसड़ी के' तकिया कलाम से तर्क-वितर्क और विमर्श. ज्ञानी लोग सही कह गए हैं :
"रांड, सांड, सीढ़ी और सन्यासी,
इनसे बचे तो सेबे कासी..."

काशी के अस्सी घाट पर सुबह-ए-बनारस. दशाश्वमेध घाट पर शाम के समय तो गंगा आरती होती ही थी मगर अब यहां अस्सी पर भी सुबह के समय गंगा की आरती होने लगी है. दोनों आरतियों का अलग अनुभव है. गंगा के उस पार आरती के बीच जब सूर्योदय होता है तो सब कुछ भव्य और दिव्य हो जाता है. लगता है अभी-अभी नींद से जागी गंगा से सीधा संवाद हो रहा है.

छठी यात्रा – मैसूर- ऊटी
नवंबर आते-आते संयोग मैसूर ले गया. मैसूर, महलों की नगरी. वाडियार राजाओं से लेकर तमाम धनकुबेरों के महल. इतिहास चप्‍पे चप्‍पे पर बिखरा हुआ. मैसूर पाक नाम की मिठाई देसी घी से बनी शायद अकेली ऐसी मिठाई है जो घनघोर घी में बनी होने के बावजूद मन को भाती है और मुंह में मिश्री सी घुल जाती है. इस बार बैंगलूरू से मैसूर के रास्‍ते पर मद्दूर वड़ा से चांस एनकाउंटर हो गया. नारियल चटनी के साथ परोसे जाने वाली गज़ब डेलीकेसी है. वैक्‍स म्‍यूजियम, मां चामुंडा देवी के मंदिर के अलावा, कृष्‍णा सागर डैम, वृन्‍दावन गार्डन में लाइट एवं साउंड कार्यक्रम कभी न भूलने वाले अनुभव हैं. हम ऊटी से सिर्फ 4 घंटे की ड्राइव दूर थे तो भला कैसे छोड़ सकते थे. एक सुबह अंधेरे ही उठ कर दौड़ लिए ऊटी के लिए. दिन भर ऊटी में तफरी के बाद ऊटी की टॉय ट्रेन की सवारी का कुन्‍नूर तक आनंद लिया गया. और इसी के साथ एक वर्ष के अंदर ही वर्ल्‍ड हैरीटेज साइट में शामिल तीनों टॉय ट्रेन (शिमला, दार्जिलिंग और नीलगिरी) का मेरा अनुभव भी पूरा हुआ. 


मैसूर से लौटते समय टीपू सुल्‍तान की राजधानी श्रीरंगापट्टनम में वो जगह भी देखी जहां जंग के दौरान टीपू सुल्‍तान का शरीर पाया गया. इतिहास अब पत्‍थरों की जुबानी अपनी कहानी कह रहा है।


समय और संयोग बहुत बलवान होते हैं. यात्राओं के मामले में भी कुछ ऐसा ही है. हम किस समय कहां होंगे शायद पहले से ही तय रहता है. मगर हम कहां जान पाते हैं. इसीलिए मन तो बस बार-बार कहीं दूर उड़ चलना चाहता है....नई दिशाओं में नई मंजिलों की ओर. मेरी यात्राओं के लिए वर्ष 2015 शानदार रहा. अब देखते हैं 2016 की पोटली में कौन सी नई मंजिलें और नए अनुभव छिपे हुए हैं. हां, इससे पहले की 2016 के पन्‍ने पलटने शुरू हों....जनवरी में हम चार घुमक्‍कड़ मित्र भोपाल और आस-पास के इलाकों की घुमक्‍कड़ी पर निकलने के कार्यक्रम को अंतिम रूप दे रहे हैं. तो नया साल आप सब को बहुत बहुत मुबारक हो. तारीखों की सरहद के परे नए साल में यात्राओं के साथ मुलाकातें होती रहेंगी. अलविदा !
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