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गुरुवार, 27 अगस्त 2020

विरासत और कला का अनूठा संगम है माहेश्‍वरी साड़ी । Maheshwari Saree: An incredible mix of Heritage and Art

 विरासत और कला का अनूठा संगम है माहेश्‍वरी साड़ी


मध्‍य प्रदेश में इंदौर से तकरीबन 95 किलोमीटर दूर मौजूद महेश्‍वर न केवल नर्मदा तट पर मौजूद अपने एतिहासिक शिव मंदिर के कारण विख्‍यात है बल्कि अपनी माहेश्‍वरी साड़ियों से भी हैंडलूम की साडियों के कद्रदानों को लुभाता रहा है. कुछ दिनों पहले इंदौर जाना हुआ तो मालवा के इतिहास और संस्‍कृति को और करीब से समझने की तलब वहां से पहले मांडू और फिर महेश्‍वर तक ले गई. यूं सम‍झिए कि मांडू तक आकर अगर कोई बिना महेश्‍वर देखे लौट जाए तो उसने मालवा की आत्‍मा का साक्षात्‍कार नहीं किया.

नर्मदा के तट पर बसा महेश्‍वर पाँचवी सदी से ही हथकरघा बुनाई का केंद्र रहा है और मराठा होल्‍कर के शासन काल में जनवरी 1818 तक मालवा की राजधानी रहा है. ये महेश्‍वर के इतिहास का सुनहरा दौर था. यही वह समय था जब हथकरघा पर माहेश्‍वरी साड़ी अस्तित्‍व में आई. आज भी महेश्‍वर में और खासकर महेश्‍वर के शिव मंदिर के आस-पास छोटे-छोटे घरों से हथकरघों पर माहेश्‍वरी साड़ी को बुनते हुए देखा जा सकता है. रेहवा सोसायटी के बैनर तले आज भी सैकड़ों हथकरघों पर माहेश्‍वरी साड़ी का जादू बुना जा रहा है.

माहेश्‍वरी साड़़ी़ और हथकरघा बुनकर, Handloom weaver of Maheshwari Saree
माहेश्‍वरी साड़़ी़ और हथकरघा बुनकर
(PC: Veera Handlooms, Maheshwar)

अहिल्‍याबाई होल्‍कर के कारण अस्तित्‍व में आई माहेश्‍वरी साड़ी

माहेश्‍वरी साड़ी के अस्तित्‍व में आने के बारे में एक कहानी यहां की फिज़ाओं में तैर रही है. कहानी कहती है कि इंदौर की महारानी अहिल्‍या बाई होल्‍कर के दरबार में कुछ खास मेहमान आने वाले थे सो महारानी ने सूरत से कुछ खास बुनकरों के परिवारों को बुलाकर महेश्‍वर में बसाया और उन्‍हें उन मेहमानों के लिए खास वस्‍त्र तैयार का काम सौंपा. ये मेहमान कौन थे इसका साफ-साफ उल्‍लेख मुझे कहीं नहीं मिला. अलबत्‍ता वहां के एक गाइड ने एक दिलचस्‍प कहानी मुझे सुनाई. इस कहानी के मुताबिक मालवा की महारानी अहिल्‍याबाई (31 मई, 1725 – 13 अगस्‍त, 1795) के पति खांडेराव होल्‍कर की 1754 में कुम्‍हेर के युद्ध में मृत्‍यु के बाद उनके ससुर मल्‍हार राव होल्‍कर ने उन्‍हें सती नहीं होने दिया और अगले 12 वर्ष स्‍वयं इंदौर का राज-काज संभाला.

अहिल्‍याबाई होल्‍कर, Ahilya Bai Holkar
अहिल्‍याबाई होल्‍कर

फिर 1766 में मल्‍हार राव होल्‍कर की मृत्‍यु के बाद मल्‍हार राव के पोते और अहिल्‍याबाई के पुत्र खांडेराव ने गद्दी को संभाला लेकिन पुत्र की भी मृत्‍यु के बाद आखिरकार अहिल्‍याबाई ने शासन अपने हाथों में लिया. अपने शासन काल में उन्‍होंने न केवल महेश्‍वर बल्कि तमाम अन्‍य शहरों में भी घाटों, कुओं, मंदिरों का निर्माण करवाया. यहां तक कि काशी का विश्‍व प्रसिद्ध काशी विश्‍वनाथ का मंदिर भी रानी अहिल्‍याबाई होल्‍कर द्वारा ही बनवाया गया था. उनके शासन काल को महेश्‍वर का स्‍वर्ण-काल माना गया. महेश्‍वर की जनता आज भी अपनी प्रिय रानी को बहुत सम्‍मान से याद करती है और उन्‍हें मॉं साहब कह कर याद करती है. बेशक अहिल्‍याबाई अपने विवेक और कौशल के साथ राज्‍य का संचालन कर रहीं थीं मगर अहिल्‍या चूंकि महिला थीं इसलिए स्‍वाभाविक रूप से आस-पास की रियासतों और मुग़ल शासकों की नज़रें इस राज्‍य पर पड़ने लगीं. अहिल्‍याबाई इस खतरे को साफ देख रहीं थीं.

निस्‍संदेह मालवा इतना शक्तिशाली नहीं था कि इन षड्यंत्रों का मुकाबला कर पाता. इसलिए ऐसे कठिन समय में अहिल्‍याबाई ने अपने भरोसेमंद पड़ौसी राज्‍यों और विश्‍वस्‍त लोगों को एक बहन की तरह रक्षा का अनुरोध किया. उन सभी लोगों ने भी बहन की रक्षा का वायदा किया और मालवा पधारने का कार्यक्रम बनाया. अहिल्‍याबाई ने इस अवसर को अपने पड़ौसियों के साथ अपने संबंधों को सुदृढ़ बनाने के अवसर के रूप में लिया और उन्‍होंने सूरत से खास बुनकरों को महेश्‍वर बुला कर भाईयों के लिए खास तरह की पगड़ी तैयार करने के लिए कहा. बुनकरों ने बेहद खूबसूरत पगड़ियाँ तैयार कीं.

नर्मदा के किनारे महेश्‍वर, Maheshwar in MP
नर्मदा के किनारे महेश्‍वर 

तभी किसी ने महारानी को सलाह दी कि उन्‍हें भाईयों की पत्नियों के लिए भी कुछ उपहार भेजने चाहिएं. महारानी ने काफी सोच-विचार के बाद तय किया वे भाभियों के लिए खास तरह की साड़ियां उपहार में भेजेंगी. बस फिर क्‍या था, बुनकरों को एक बार फिर बुलाया गया और उन्‍हें निदेश दिया गया कि भाभियों के लिए भी बेहद खूबसूरत साड़ियां तैयार की जानी हैं. ऐसी साड़ियां जिनमें महेश्‍वर की आन-बान और शान झलकती हो. बस यहीं से माहेश्‍वरी साड़ी ने जन्‍म लिया.

और यही नहीं, आप कहीं भी मां साहब अहिल्‍या बाई की तस्‍वीर या उनकी प्रतिमा को गौर से देखिएगा, जो सादगी उस देवी की सूरत में नज़र आती है वही सादगी और नफ़ासत माहेश्‍वरी साड़ी में भी आपको नज़र आएगी.

साड़ी में दिखती है महेश्‍वर की झलक

चूंकि साड़ी का नाम महेश्‍वर के नाम पर पड़ा इसलिए स्‍वाभाविक है कि इस साड़ी में महेश्‍वर की झलक अवश्‍य ही होगी. दरअसल माहेश्‍वरी साड़ी की पहचान है इसमें इस्‍तेमाल की गई डिजाइन हैं जो विशेष रूप से महेश्‍वर के विश्‍व-प्रसिद्ध शिव मंदिर और महेश्‍वर किले की दीवारों पर मौजूद विभिन्‍न आकृतियों से ली गई हैं. अगर आप महेश्‍वर किले के भीतर नर्मदा के तट पर स्थित मंदिर परिसर में शिव मंदिर की परिक्रमा करते हुए इसके चारों तरफ बनी आकृतियों पर गौर करेंगे तो आप पाएंगे कि माहेश्‍वरी साड़ी के बुनकरों ने इन डिजाइनों को बहुत प्रमुखता से माहेश्‍वरी साड़ियों में स्‍थान दिया है

माहेश्वरी साड़ी अक्‍सर प्लेन ही होती हैं जबकि इसके बॉर्डर पर फूल, पत्ती, बूटी आदि की सुन्दर डिजाइन होती हैं. इसके बॉर्डर पर लहरिया (wave), नर्मदा (Sacred River), रुई फूल (Cotton flower), ईंट (Brick), चटाई (Matting), और हीरा (Diamond) प्रमुख हैं. पल्लू पर हमेशा दो या तीन रंग की मोटी या पतली धारियां होती हैं. इन साड़ियों की एक विशेषता इसके पल्लू पर की जाने वाली पाँच धारियों की डिजाइन – 2 श्वेत धारियाँ और 3 रंगीन धारियाँ (रंगीन-श्वेत-रंगीन-श्वेत-रंगीन) होती है. माहेश्‍वरी साड़ियों के आम तौर पर चंद्रकला, बैंगनी चंद्रकला, चंद्रतारा, बेली और परेबी नामक प्रकार होते हैं. इनमें से पहली दो प्‍लेन डिजाइन हैं जबकि अंतिम तीन में चेक या धारियां होती हैं.

रुेंहnd) iver)ेशा महेश्‍वर बलिकमूल माहेश्‍वरी साड़ी की एक खासियत और है और वो है इसकी 9 यार्ड की लंबाई और इसके पल्‍लू का रिवर्सिबल होना. पल्‍लू की इन खासियतों की वजह से ही अकेले पल्‍लू को तैयार करने में ही 3-4 दिन लग जाते हैं. वहीं पूरी साड़ी को तैयार करने में 3 से 10 दिन का वक्‍़त लग सकता है. आप इसे दोनों तरफ़ से पहन सकते हैं.

शुरुआत में इस साड़ी को केवल शाही परिवारों, राजे-रजवाड़ों के परिवारों में स्‍थान मिला लेकिन बाद में ये साड़ियाँ आम लोगों की भी प्रिय हो गईं. जहां शुरुआत में माहेश्‍वरी साड़ी को केवल कॉटन से तैयार किया जाता था वहीं अब रेशमी माहेश्‍वरी साड़ियाँ भी महिलाओं की प्रिय हो गई हैं. आजकल कोयंबटूर कॉटन और बेंगलूरू सिल्‍क को मिला कर मनमोहक साड़ियाँ  तैयार की जा रही हैं. शुरुआत में माहेश्‍वरी साडियों को प्राकृतिक रंगों से ही तैयार किया जाता था लेकिन तेज भागते दौर में अब इनमें कृत्रिम रंगों का ही प्रयोग होने लगा है.

 

महेश्‍वर के शिव मंदिर में डिजाइन, Shiv mandir of Maheshwar
महेश्‍वर के शिव मंदिर में डिजाइन

साड़ी के हैं बहुत से क़द्रदान

प्रतिभा राव इंस्‍टाग्राम पर yarnsofsixyards_et_al के नाम से साड़ियों पर केंद्रित एक दिलचस्‍प अकाउंट चला रही हैं. प्रतिभा के पास हिंदुस्‍तान में प्रचलित लगभग हर साड़ी मौजूद है. वो जब-तब इन साड़ियों के बारे में अपने अनुभव साझा करती रही हैं. जब हमने माहेश्‍वरी साड़ी के बारे में प्रतिभा से बात की तो उनका कहना था कि  

Pratibha Rao in Maheshwari Saree
रेहवा से खरीदी माहेश्‍वरी साड़ी में प्रतिभा

इस साड़ी के महीन से रंग, बॉर्डर पर ज़री का ख़ास किस्‍म का काम मुझे बहुत आकर्षित करता है. चटाई बॉर्डर मेरा पसंदीदा है. माहेश्‍वरी साड़ियों की एक ख़ास बात है. अपने रंगों की विविधता और डिजाइन की पेचीदगियों के चलते एक ही साड़ी साधारण और ख़ास दोनों मौकों पर पहनी जा सकती है. इन साड़ियों में नर्मदा की लहरों जैसी पवित्रता है. ऐसा लगता है जैसे नर्मदा घाट की भोर और गोधूली के सुंदर रंगों को संजोए माहेश्‍वरी साड़ियाँ एक बीते शाही कल की रोचक कहानी कहती हैं. संस्‍कृत में नर्मदा का अर्थ है- आनंदमयी, महेश्‍वर के सुंदर घाटों से उपजी ये साड़ियाँ भी इस अर्थ को चरितार्थ करती हैं

सोशल मीडिया और तकनीक ने बुनकरों और क़द्रदानों के बीच की दूरी को जैसे खत्‍म ही कर दिया है. इंस्‍टाग्राम पर ही ज़रा सा सर्च करेंगे तो दर्जनों अच्‍छे बुनकरों के अकाउंट मिल जाएंगे जो अपनी साड़ियों की तस्‍वीरों को यहां प्रस्‍तुत कर ग्राहकों से सीधे आर्डर ले रहे हैं.

रेहवा सोसायटी ने फिर से जिंदा किया इस परंपरा को

वक्‍़त के साथ बुनकर इस काम से दूर होते गए और माहेश्‍वरी साड़ियाँ जैसे गायब ही होती गईं. लेकिन 1979 में होल्‍कर वंश के रिचर्ड होल्‍कर और उनकी पत्‍नी सल्‍ली होल्‍कर ने जब रेहवा सोसायटी (एक गैर लाभकारी संगठन) की स्‍थापना की तो महेश्‍वर की गलियों में एक बार फिर करघे की खट-पट सुनाई देने लगी. कुल 8 करघों और 8 महिला बुनकरों के साथ शुरू हुई इस सोसायटी के साथ बुनकर जुड़ते गए और आज इस सोसायटी के दिल्‍ली और मुंबई में रिटेल आउटलेट हैं. चूंकि सोसायटी नॉन प्रोफिट संगठन है इसलिए इसके लाभ को बुनकरों और स्‍टाफ पर ही खर्च किया जाता है.

Rehwa Society

इन दिनों बुनकर संकट में हैं, इसीलिए रेहवा सोसायटी भी अपनी साइट के माध्‍यम से उनके लिए मदद मांग रही है. जिसमें आप आज किसी बुनकर के लिए फुल वैल्‍यू क्रेडिट खरीद सकते हैं और इस क्रेडिट से बाद में रेहवा की साइट से कपड़े खरीद सकते हैं. हमें ऐसे प्रयासों में अवश्‍य ही मददगार होना चाहिए. 

बहुत मेहनत छुपी है साड़ी की खूबसूरती के पीछे

उस रोज़ इंदौर से महेश्‍वर के लिए निकलते वक्‍़त मैं ये सोच कर निकला था कि इन साड़ियों के बनने की पूरी प्रक्रिया को समझना है. इसीलिए इंदौर में मौजूद बुनकर सेवा केंद्र के अधिकारियों से महेश्‍वर के बुनकरों और हैंडलूम के शो रूम का पता जेब में लेकर निकला था. नर्मदा रिट्रीट में दोपहर का लंच करते हुए श्रवणेकर हैंडलूम के मालिक से बात हुई तो उन्‍होंने दुकान पर आ जाने के लिए कहा. नज़दीक ही थे हम. बस चंद पलों में मैं दर्जनों तरह की माहेश्‍वरी साड़ियों के सामने था. इन साड़ियों के बारे में विस्‍तार से बात हुई. फिर वर्कशॉप भी देखी गई जहां धागों की रंगाई हो रही थी. वहीं कुछ बुनकरों से बात करने पर पता चला कि उनका पूरा परिवार ही साड़ियों की बुनाई के काम से जुड़ा है. ये एक आदमी के बस का काम है भी नहीं. कच्‍चे माल के प्रबंध, धागों की रंगाई, रंगों को तैयार करने, हैंडलूम पर बुनाई से लेकर उनकी बिक्री तक बहुत काम होता है. सरकारी स्‍तर पर तमाम सुविधाओं और योजनाओं के बावजूद बुनकरों का मानना है कि उन्‍हें उनकी मेहनत का वाजिब हक़ नहीं मिल पाता है.

पावरलूम से मिल रही है बड़ी चुनौती

पावरलूम तो हमेशा से ही हैंडलूम के लिए एक स्‍थाई चुनौती बना ही हुआ है. कारीगर जो डिजाइन बड़ी मेहनत से हथकरघा के लिए तैयार करते हैं उन्‍हें पावरलूम का इस्‍तेमाल करने वाली मिलें और कं‍पनियां नकल करके धड़ल्‍ले से तैयार कर रही हैं. 

Maheshwari Saree in Maheshwar, माहेश्‍वरी साड़ी
श्रवणेकर हैंडलूम पर माहेश्‍वरी साड़ी


लेकिन हथकरघा के कद्रदान हमेशा रहे हैं और रहेंगे. शायद इसीलिए स्‍वयं में मालवा के राजसी वैभव, गौरवशाली इतिहास और कारीगरी की विरासत को संभालने वाली माहेश्‍वरी साड़ी आज भी लोगों के बीच प्रिय है. 

REWA SOCIETY की अपील
REWA SOCIETY की अपील (PC: REWA)


छोटे-छोटे ख्‍़वाब पंख फैला रहे हैं

महेश्‍वर में इस समय दर्जनों हैंडलूम ऐसे हैं जो अपने काम को इंटरनेट, ख़ासकर फेसबुक और इंस्‍टाग्राम के ज़रिए दुनिया तक पहुंचा रहे हैैंं. इंस्‍टाग्राम ही उनका शो रूम है जहाँ वे अपनी साड़ियों को प्रदर्शित कर ऑर्डर हासिल कर रहे हैं. महेश्‍वर में ही दो भाई राहुल चौहान और नीरज चौहान लगभग 50 करघों वाला वीरा हैंडलूम चला रहे हैं. वे बताते हैं कि हैंडलूम साडियों का काम उनका पुश्‍तैनी काम है जो 1950 से चला आ रहा है। पहले दादा, फिर पिता और अब हम दो भाई इस परंपरा को संभाल रहे हैं. ये हमारे लिए केवल एक पुश्‍तैनी या परिवार का बिजनेस नहीं है बल्कि हमें लगता है कि हम लोगों के ख्‍़वाबों को बुन रहे हैं. हमारे परिवार के हर सदस्‍य के खून में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के भीतर ये भावना चली आई है इसीलिए परिवार का हर सदस्‍य सपनों की बुनाई के इस काम में अपना योगदान देता है।



महेश्‍वर का शिव मंदिर


माहेश्‍वरी साडि़यों की वर्कशॉप, Colours for Maheshwari Sarees
माहेश्‍वरी साड़ियों की वर्कशॉप 

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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 


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यहां भी आपका स्‍वागत है:

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

स्‍वदेशी आंदोलन की स्‍मृतियों को समर्पित है राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस


स्‍वदेशी आंदोलन की स्‍मृतियों को समर्पित है राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस

National Handlooms Day and Swadeshi Movement


आज हम छठा राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस मना रहे हैं. इस बार #Vocal4Handmade हैशटैग के साथ देश में हाथ से बने कपड़ों यानी कि हथकरघा उत्‍पादों के प्रयोग का आह्वान किया जा रहा है. ये एक तरह से #Vocalforlocal का ही विस्‍तार है. हैंडलूम्‍स पर बने उत्‍पादों और इससे जुड़े उद्योग की ओर विशेष रूप से ध्‍यान देने के लिए भारत सरकार 2015 से हर वर्ष 7 अगस्‍त को राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस का आयोजन करती आ रही है. कितना विचित्र है कि हथकरघा की समृद्ध विरासत वाले देश को आज हथकरघा को जिंदा रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. राष्ट्रीय हथकरघा जनगणना के अनुसार आज देश में लगभग 27.83 परिवार हथकरघा और इससे जुड़े काम-काज से जुड़े हुए हैं और दुनिया का लगभग 85 प्रतिशत हथकरघा वस्‍तुओं का उत्‍पादन भारत में ही होता है. दुनिया का सबसे बेहतर हुनर और कच्‍चा माल देश में उपलब्‍ध है मगर हम फिर भी हथकरघा को उसका उचित सम्‍मान नहीं दे सके.

साड़ियाँ बनाने वाले कारीगरों की उंगलियां जब हथकरघे पर थिरकती हैं तो उसका पसीना और हुनर मिलकर ताने-बाने से जो जादू तैयार करते हैं वो सर चढ़ कर बोलता है. हैंडलूम की साड़ियों के प्रति लोगों की दीवानगी का आलम ये है कि इसके क़द्रदान आज भी कारीगरों को ढ़ूंढ़ते हुए तमाम शहरों की तंग गलियों में घूमते हुए मिल जाएंगे. फिर भी हथकरघा अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष करता नज़र आता है. क्‍या वजह है कि उत्‍तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक बनारसी, कांजीवरम, पैठणी, चंदेरी, तसर सिल्‍क, जामदानी, मंगलागिरी, माहेश्‍वरी, पटोला साड़ियों और कश्‍मीरी शॉल के कद्रदानों के देश में इनके कारीगरों को रोजी-रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है? कहां चूक गए हम अपनी इतनी समृद्ध विरासत को सहेजने में? क्‍या राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस जैसे आयोजनों से निकलेगी कोई राह? और क्‍या संबंध है राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस का हमारे स्‍वतंत्रता आंदोलन से? आइये इन्‍हीं कुछ सवालों के जवाब ढूंढने की कोशि‍श करें इस खास अवसर पर.
 
Handlooms Sareees, हथकरघा साड़ी, कांजीवरम साड़ी
कांजीवरम की हैंडलूम की साड़ियाँ


7 अगस्‍त को ही क्‍यों मनाते हैं राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस?

राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस के लिए 7 अगस्‍त का दिन चुने जाने के पीछे एक एतिहासिक महत्‍व है. दरअसल ये बात सन 1903 की है जब दिसंबर महीने में पूरे देश में ये बात फैल गई कि अंग्रेज सरकार बंगाल का विभाजन करने जा रही है. देश भर में बैठकें होने लगीं और विरोध के स्‍वर उठने लगे. सुरेंद्रनाथ बनर्जी और कृष्‍ण कुमार मिश्र उस समय के अख़बार हितवादी और संजीवनी में ने कई लेख लिखे.
विदेशी कपड़ों का बहिष्‍कार

फिर भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम का वो महत्‍वपूर्ण पड़ाव भी आया जब 7 अगस्‍त, 1905 को कोलकाता के टाउन हाल में स्‍वदेशी आंदोलन शुरू किए जाने और विदेशी वस्‍तुओं के बहिष्‍कार का एलान कर दिया गया. इसके बाद राष्‍ट्रवादी नेताओं ने बंगाल के विभिन्‍न इलाकों का दौरा किया और लोगों से मैनचेस्‍टर में बने कपड़ों का बहिष्‍कार करने का आह्वान किया. और धीरे-धीरे ये आंदोलन पूरे देश में फैल गया. जगह-जगह विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाने लगी. इस समय महात्‍मा गांधी ने स्‍वदेशी वस्‍त्र तैयार करने का मंत्र देकर इस आंदोलन को बहुआयामी दिशा प्रदान कर दी थी. घर-घर चरखे चलने लगे और लोग खादी के कपड़े पहनने लगे. 

जेल में चरखा चलाते महात्‍मा गांधी
जेल में चरखा चलाते महात्‍मा गांधी

बेशक स्‍वदेशी आंदोलन बंगाल का विभाजन नहीं रोक पाया मगर इसके दूरगामी परिणाम रहे. लोग कपड़ों के मामले में आत्‍मनिर्भर होने लगे, लोगों को रोजगार मिलने लगा और विदेशी माल के आयात में कमी होने लगी. अंग्रेज सरकार बौखलाने लगी और इस आंदोलन का दमन करना शुरू कर दिया. इससे लोगों में राष्‍ट्रीयता की भावना पनपने लगी जिसने स्‍वतंत्रता आंदोलन में आम जनमानस को उठती राष्‍ट्रीयता की लहर से जुड़ने और सीधे तौर पर भागीदार बनने का एक बहाना दे दिया. जुलाई 1903 में सरस्‍वती पत्रिका मेंं महावीर प्रसाद द्विवेेदी की एक कविता प्रकाशित हुुुुई थी : 

विदेशी वस्त्र हम क्यों ले रहे हैं?

वृथा धन देश का क्यों दे रहे हैं?

न सूझै है अरे भारत भिखारी!

गई है हाय तेरी बुद्धि मारी!

हजारों लोग भूखों मर रहे हैं;

पड़े वे आज या कल कर रहे हैं।

इधर तू मंजु मलमल ढ़ूढता है!

न इससे और बढ़कर मूढ़ता है।

महा अन्याय हाहा हो रहा है;

कहैं क्या नहीं जाता कुछ कहा है।

मरैं असग़ार बिसेसर और काली;

भरैं घर ग्राण्ट ग्राहम और राली।

स्वदेशी वस्त्र की हमको बड़ाई,

विदेशी लाट ने भी है सुनाई।

न तिस पर भी हमे जो लाज आवै,

किया क्या हाय रे जगदीश! जावै।

न काशी और चन्देरी हमारी;

न ढाका, नागपुर नगरी बिचारी।

गयी है नष्ट हो; जो देश भाई!

दया उनकी तुम्हें कुछ भी न आई।

अकेला एक लुधियाना हमारा;

चला सकता अभी है काम सारा।

फिरैं, तिस पर, भला, जो और के द्वार;

हमें, फिर, क्यों नहीं सौ बार धिक्कार?

स्वदेशी वस्त्र का स्वीकार कीजै,

विनय इतना हमारा मान लीजै।

शपथ करके विदेशी वस्त्रा त्यागो;

न जावो पास, उससे दूर भागो।

अरे भाई! अरे प्यारे! सुनो बात,

स्वदेशी वस्त्र से शोभित करो गात।

वृथा क्यों फूंकते हो देश का दाम,

करो मत और अपना नाम बदनाम!


क्‍यों बदहाल हो गई हथकरघा की दुनिया ?

1947 में देश आजाद हुआ. 80 के दशक तक तो सब ठीक-ठाक रहा. एक तरह से हथकरघा ने सुनहरा दौर देखा. लेकिन सन 1985 के बाद सूत व कपास की कीमतों में खूब तेजी आने लगी और हैंडलूम के कारोबार सिमटने पर मजबूर हो गए. उधर धीरे-धीरे देश विदेशी बाज़ारों के लिए खुलने लगा तो नए विदेशी उत्‍पादों के सामने एक बार फिर हथकरघा उद्योग चरमराने लगा. ये सब अचानक नहीं हुआ....सब बहुत आहिस्‍ता, आहिस्‍ता. सबने जैसे हाथ छोड़ दिया हथकरघा का. हथकरघा के बुनकर हुनरमंद होने के बावजूद अपने वाजिब मेहनताने के लिए भी तरसने लगे.

पूरे परिवार केे दिन भर खटने के बाद भी यदि कारीगरों को उनकी मेहनत से घर का चूल्‍हा-चौका ठीक से चलाने लायक आमदनी न हो तो कोई इस पेशे में कब तक बना रहेगा. सो, धीरे-धीरे लोग इस काम को छोड़ते गए और ज्‍यादा बदहाली आज से पिछले दसेक सालों के दौरान देखने में आई. अब देश में लोगों को और तमाम तरह के काम मिलने लगे जहां दिन की मजदूरी इस काम से ज्‍यादा थी. 

हाल के सालों में भी नोटबंदी कहर बन कर टूटी इन कारीगरों पर. हाथ से मुंह तक सीमित रहने वाले हज़ारों कारीगर एक बार फिर मजबूर हो गए. यहां तक की बुनकरी से जुड़े लोगों ने ये पुश्‍तैनी काम छोड़़ रिक्‍शा चलाना तक मुनासिब समझा. अब एक बार फिर कोरोना महामारी कारीगरों की कमर तोड़ रही है. 

मैं देश के तमाम इलाकों में बुनकरों से मिला हूँ उनमें से अधिकांश का कहना है कि उनके बच्‍चे अब ये काम नहीं करना चाहते क्‍योंकि यहाॅँ अब इज्‍़ज़त की रोटी कमाना मुश्किल हो चला है. 
हैंडलूम के लिए धागे
हैंडलूम के लिए धागे

लोगों का मोहभंग क्‍यों हुआ हथकरघा उत्‍पादों से ?

हथकरघा उद्योग की माली हालत के बीच अव्‍वल तो अच्‍छे उत्‍पाद मिलने मुश्किल हो गए. दूसरे इन उत्‍पादों की ऊँची कीमतें इन्‍हें आम आदमी की पहुंच से बाहर करने लगीं. और तीसरा सबसे बड़ा कारण गुणवत्‍ता के लिए हॉलमार्क जैसी किसी व्‍यवस्‍था के अभाव में असली और नकली उत्‍पादों में फ़र्क करना बड़ा मुश्किल होता गया. बाज़ार में हैंडलूम प्रोडक्‍ट्स के नाम पर बिकने वाले कपड़ों की हालत ये है कि आप अलसी और नकली को आसानी से पहचान ही नहीं सकते. अब ऐसे में कौन मंहगे कपड़े खरीद कर ठगा जाना पसंद करेगा. और कहीं असल उत्‍पाद मिल भी रहे थे तो उसका लाभांश कारीगरों तक ही नहीं पहुंच पाता था. सब मिडिल मैन की जेब के हवाले. 

एक और बड़ी समस्‍या पावरलूम से हैंडलूम को मिलने वाली चुनौती थी. कारीगर मेहनत से जो डिजाइन हथकरघा उत्‍पादों के लिए तैयार करते, पावरलूम वाले उसकी नकल कर धडल्‍ले से हूबहू वैसे ही उत्‍पाद बहुत कम समय में तैयार कर देते. अच्‍छे प्रोडक्‍ट न मिलने के चलते धीरे-धीरे लोगों का भी हथकरघा से मोभंग होता गया. कुछ निजी उद्यमियों और कंपनियों ने ज़रूर अपने स्‍तर पर हथकरघा को बढ़ावा देने की कोशिश की लेकिन राष्‍ट्रीय स्‍तर पर इस दिशा में एक आंदोलन जैसा कुछ नहीं था.

राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस ने बदलनी शुरू की कहानी

Handloom Mark, हथकरघा मार्क
हैंडलूम मार्क...गुणवत्‍ता का आश्‍वासन
2015 में जब सरकार ने पहले राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत की तो कहानी बदलनी शुरू हो गई. इस पहले ही आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय हथकरघा या कहिए कि इंडिया हैंडलूम ब्रांड की शुरुआत की. उधर असली हैंडलूम उत्‍पादों की पहचान में ग्राहकों की सहूलियत के लिए हैंडलूम मार्क भी अब प्रचलन में है. ये मार्क अब ग्राहकों को इस बात की तसल्‍ली देता है कि उत्‍पाद 100 प्रतिशत असली है.
 

प्रधानमंत्री जी का कहना था कि हथकरघा गरीबी से लड़ने में एक अस्त्र साबित हो सकता है, उसी तरह जैसे स्वतंत्रता के संघर्ष में स्वदेशी आंदोलन था. प्रधानमंत्री जी का कहना था कि खादी और हथकरघा उत्पाद भी वही उत्साह प्रदान करते हैं, जैसा कि मां के प्रेम से प्राप्त होता है.
इंडिया हैंडलूम ब्रांड का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री
इंडिया हैंडलूम ब्रांड की शुरुआत करते प्रधानमंत्री 

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने 2015 में पहले राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत करते हुए कहा था कि सभी परिवार घर में कम से कम एक खादी और एक हथकरघा का उत्पाद जरूर रखें. प्रधानमंत्री ने पांच एफ: फार्म टू फाइबर, फाइबर टू फैब्रिक, फैब्रिक टू फैशन और फैशन टू फॉरेन का मंत्र दिया जो हथकरघा के पुनर्रुद्धार के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. तमाम अवसरों पर प्रधानमंत्री और वस्‍त्र मंत्री स्‍वयं हथकरघा पर बने कपड़ों में नज़र आने लगे और इस सबका आम लोगों पर काफी असर हुआ. राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत के साथ ही हर वर्ष इस आयोजन के साथ हथकरघा उद्योग में नए प्राण फूंकने का प्रयास होता रहा है. 

आपको याद होगा कि ऐसे ही एक राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस पर वस्‍त्र मंत्री श्रीमती स्‍मृति ज़ूबिन इरानी ने #Iwearhandlooms शीर्षक से एक हैशटैग चलाया जिसे जनता ने हाथों-हाथ लिया. बड़े-बड़े सेलेब्रिटी इस आह्वान पर उनके साथ जुड़े और सोशल मीडिया हैंडलूम प्रोडक्‍ट्स के चित्रों से भर गया. हथकरघा साडि़यां एक बार फिर से चर्चा में थीं. कारीगरों को भी सरकारी स्‍तर पर तमाम तरह की इमदाद और बुनकर सेवा केंद्रों के जरिए सहूलियतें दी जानी शुरू हुईं जिनमें हर साल इजाफ़ा ही हो रहा है.

आम आदमी की पहुंच होगी तभी फलेगी-फूलेगी ताने-बाने की दुनिया


इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हथकरघा उत्‍पाद अपनी क्‍वालिटी और उनमें लगी मेहनत की वजह से पावरलूम या सिंथेटिक उत्‍पादों की तुलना में मंहगे होते हैं. इसी वजह से ये आम आदमी की ज़िंदगी का हिस्‍सा नहीं बन पाते हैं. जब तक हैंडलूम उत्‍पाद आम आदमी की पहुंच में नहीं होंगे तब तक हम कारीगरों की आय में वृद्धि या इस उद्योग के विकास की परिकल्‍पना नहीं कर सकते.

मैं पिछले साल कांचीपुरम के एक शो रूम में मां के लिए कुछ हैंडलूम साड़ियाँ देख रहा था. साड़ियों की कीमतें यकीनन बजट पर भारी पड़ती नज़र आ रही थीं. मगर साड़ियों की ख़ूबसूरती को देख हिम्‍मत कर एक दो साड़ियाँ ले लीं. यही हर मध्‍यवर्गीय घर की कहानी है. कीमती साड़ियाँ कभी-कभी ही ली जाती हैं. इनकी लागत थोड़ी और कम हो सके तो ये आम आदमी के बीच और भी अधिक लोकप्रिय हो सकेंगी. 

Handlooms Sareees, हथकरघा साड़ी, कांजीवरम साड़ी
कांचीपुरम में कांजीवरम साड़ियाँ 

इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना अभी बाकी है. इसके लिए हैंडलूम कलस्‍टरों के पास कच्‍चे माल खासकर धागों की सहज और सस्‍ती उपलब्‍धता, सस्‍ती दरों पर कर्ज की उपलब्‍धता और हथकरघा उत्‍पादों की मार्केटिंग सुविधाएं बहुत ज़रूरी हैं. यही नहीं, बनुकरों का स्किल अपग्रेडेशन और प्रशिक्षण भी महत्‍वपूर्ण पक्ष हैं.

कुछ संजीदा सरकारी प्रयासों से उम्‍मीद

राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस,2020 के अवसर पर सरकार ने #Vocal4Handmade के तहत कई नई पहलों की घोषणा की है जिससे आने वाले वक्‍़त में यकीनन हमारे बुनकरों और हथकरघा उद्योग से जुड़े उद्यमियों को कुछ ठोस मदद मिल पाने की उम्‍मीद की जा सकती है:
  • राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर वस्‍त्र मंत्रालय आज क्राफ्ट हैंडलूम विलेज नामक एक पहल शुरू कर रहा है, इसके तहत महत्वपूर्ण पर्यटन सर्किट पर देश के चुनिंदा हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट पॉकेट्स में क्राफ्ट विलेज विकसित किया जाएगा.
  • हैंडलूम क्षेत्र में डिजाइन उन्मुख उत्कृष्टता बनाने के लिए निफ्ट ने 28 डिजाइन और संसाधन केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई है, वर्तमान में 9 डीआरसी वाराणसी, अहमदाबाद, श्रीनगर, दिल्ली, मुंबई, गुवाहाटी, भुवनेश्वर, कांचीपुरम और जयपुर में काम कर रहे हैं.
  • बुनकरों की आय को बढ़ाने के उद्देश्य से, सरकारी ई-मार्केट प्लेस (GeM) पोर्टल पर 35 लाख हथकरघा श्रमिकों द्वारा प्रदर्शनियों और विपणन कार्यक्रमों के बदले में विपणन के वैकल्पिक साधनों की दिशा में बुनकरों को प्रोत्साहित किया जा रहा है.
  • GeM पर सक्रिय रूप से काम करने वाले श्रमिक अपने माल को विभिन्न सरकारी विभागों को अब सीधे बेच सकते हैं. वर्तमान में 4196 बुनकर जुलाई 2020 तक GeM पोर्टल पर आ चुके हैं.
  • प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारतआह्वान की दिशा में, हैंडलूम एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ने देश के विभिन्न कोनों से हैंडलूम बुनकरों और निर्यातकों को  अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने का प्रयास किया है.
  • हथकरघा उत्पादों को एक सामूहिक पहचान प्रदान करने के उद्देश्य से, पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के लिए हैंडलूम मार्क योजना को डिजिटल किया जा रहा है.
  • हैंडलूम मार्क योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आज वीवर ऐप, उपभोक्ता ऐप व एडमिन ऐप लॉन्च किए गए, साथ ही कार्यान्वयन प्रक्रिया को पूरी तरह से डिजिटाइज़ करने और सेक्टर से संबंधित उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने के लिए एक बैकेंड वेब पोर्टल भी स्थापित किया गया है.
  • हमारे बुनकरों और कारीगरों को सीधे मार्केटिंग लिंकेज देने के उद्देश्य से @TexMinIndia, NeGD के साथ मिलकर एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है.
  • वाराणसी में दीन दयाल हस्तकला संकुल को वाराणसी के हथकरघा की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने, हथकरघा उत्पादों को विकसित करने और बढ़ावा देने के लिए 22 सितंबर 2017 को माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा उद्घाटन किया गया.


आज राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री जी ने देश के लोगों का आह्वान करते हुए कहा है कि हमें देश को सशक्‍त बनाने के लिए देश में बनी वस्‍तुओं का उपयोग करना ही होगा और अपने देश में बने सामानों का प्रचार-प्रसार भी करना होगा. इसमें कोई दो राय नहीं. 

अधिकांश लोग हथकरघा उत्‍पादों के बारे में जानते ही नहीं हैं. इन्‍हें लेकर उनके मन में तमाम तरह के संशय भी हैं. हम सभी का दायित्‍व है कि हम सब मिलकर हथकरघा उत्‍पादों को न केवल स्‍वयं बढ़ावा दें बल्कि औरों को भी इन्‍हें खरीदने और पहनने के लिए प्रेरित करें. सब मिलकर इस दिशा में कार्य करेंगे तभी हम अपनी इस अनूठी विरासत को बचाने में कामयाब हो सकेंगे. तभी इस तरह के दिवस भी सार्थक हो सकेंगे अन्‍यथा ये महज औपचारिका बनकर रह जाएंगे और हमारी आंखों के सामने से हमारी बेशकीमती विरासत मिट जाएगी.

National handlooms Day, Ministry of Textiles ad
वस्‍त्र मंत्रालय का विज्ञापन 

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सौरभ आर्य
सौरभ आर्यको यात्राएं बहुत प्रिय हैं क्‍योंकि यात्राएं ईश्‍वर की सबसे अनुपम कृति मनुष्‍य और इस खूबसूरत क़ायनात को समझने का सबसे बेहतर अवसर उपलब्‍ध कराती हैं. अंग्रेजी साहित्‍य में एम. ए. और एम. फिल. की शिक्षा के साथ-साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से पत्रकारिता और लेखन का शौक रखने वाले सौरभ देश के अधिकांश हिस्‍सों की यात्राएं कर चुके हैं. इन दिनों अपने ब्‍लॉग www.yayavaree.com के अलावा विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. 

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